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📖 लंबी सूरह — छोटे भागों में बांटी गई (55 आयत)
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ٱقۡتَرَبَتِ ٱلسَّاعَةُ وَٱنشَقَّ ٱلۡقَمَرُ  ۝١
Iqtarabatis Saa`atu wsan shaqqal qamar
क़यामत क़रीब आ गयी और चाँद दो टुकड़े हो गया
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وَإِن يَرَوۡاْ ءَايَةً يُعۡرِضُواْ وَيَقُولُواْ سِحۡرٌ مُّسۡتَمِرٌّ  ۝٢
Wa iny yaraw aayatany yu`ridoo wa yaqooloo sihrum mustamirr
और अगर ये कुफ्फ़ार कोई मौजिज़ा देखते हैं, तो मुँह फेर लेते हैं, और कहते हैं कि ये तो बड़ा ज़बरदस्त जादू है
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54:3 🔁 0/5
وَكَذَّبُواْ وَٱتَّبَعُوٓاْ أَهۡوَآءَهُمۡۚ وَكُلُّ أَمۡرٍ مُّسۡتَقِرٌّ  ۝٣
Wa kazzaboo wattaba`ooo ahwaaa`ahum; wa kullu amrim mustaqirr
और उन लोगों ने झुठलाया और अपनी नफ़सियानी ख्वाहिशों की पैरवी की, और हर काम का वक्त मुक़र्रर है
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54:4 🔁 0/5
وَلَقَدۡ جَآءَهُم مِّنَ ٱلۡأَنۢبَآءِ مَا فِيهِ مُزۡدَجَرٌ  ۝٤
Wa laqad jaaa`ahum minal ambaaa`i maa feehi muzdajar
और उनके पास तो वह हालात पहुँच चुके हैं जिनमें काफी तम्बीह थीं
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54:5 🔁 0/5
حِكۡمَةُۢ بَٰلِغَةٌۖ فَمَا تُغۡنِ ٱلنُّذُرُ  ۝٥
Hikmatum baalighatun famaa tughnin nuzur
और इन्तेहा दर्जे की दानाई मगर (उनको तो) डराना कुछ फ़ायदा नहीं देता
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54:6 🔁 0/5
فَتَوَلَّ عَنۡهُمۡۘ يَوۡمَ يَدۡعُ ٱلدَّاعِ إِلَىٰ شَيۡءٍ نُّكُرٍ  ۝٦
Fatawalla `anhum; yawma yad`ud daa`i ilaa shai `in nukur
तो (ऐ रसूल) तुम भी उनसे किनाराकश रहो, जिस दिन एक बुलाने वाला (इसराफ़ील) एक अजनबी और नागवार चीज़ की तरफ़ बुलाएगा
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54:7 🔁 0/5
خُشَّعًا أَبۡصَٰرُهُمۡ يَخۡرُجُونَ مِنَ ٱلۡأَجۡدَاثِ كَأَنَّهُمۡ جَرَادٌ مُّنتَشِرٌ  ۝٧
khushsha`an absaaruhum yakrujoona minal ajdaasi ka annahum jaraadum muntashir
तो (निदामत से) ऑंखें नीचे किए हुए कब्रों से निकल पड़ेंगे गोया वह फैली हुई टिड्डियाँ हैं
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54:8 🔁 0/5
مُّهۡطِعِينَ إِلَى ٱلدَّاعِۖ يَقُولُ ٱلۡكَٰفِرُونَ هَٰذَا يَوۡمٌ عَسِرٌ  ۝٨
Muhti`eena ilad daa`i yaqoolul kafiroona haazaa yawmun `asir
(और) बुलाने वाले की तरफ गर्दनें बढ़ाए दौड़ते जाते होंगे, कुफ्फ़ार कहेंगे ये तो बड़ा सख्त दिन है
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54:9 🔁 0/5
۞ كَذَّبَتۡ قَبۡلَهُمۡ قَوۡمُ نُوحٍ فَكَذَّبُواْ عَبۡدَنَا وَقَالُواْ مَجۡنُونٌ وَٱزۡدُجِرَ  ۝٩
Kazzabat qablahum qawmu Noohin fakazzaboo `abdanaa wa qaaloo majnoo nunw wazdujir
इनसे पहले नूह की क़ौम ने भी झुठलाया था, तो उन्होने हमारे (ख़ास) बन्दे (नूह) को झुठलाया, और कहने लगे ये तो दीवाना है
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54:10 🔁 0/5
فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنِّي مَغۡلُوبٌ فَٱنتَصِرۡ  ۝١٠
Fada`aa Rabbahooo annee maghloobun fantasir
और उनको झिड़कियाँ भी दी गयीं, तो उन्होंने अपने परवरदिगार से दुआ की कि (बारे इलाहा मैं) इनके मुक़ाबले में कमज़ोर हूँ
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54:11 🔁 0/5
فَفَتَحۡنَآ أَبۡوَٰبَ ٱلسَّمَآءِ بِمَآءٍ مُّنۡهَمِرٍ  ۝١١
Fafatahnaaa abwaabas sa maaa`i bimaa`im munhamir
तो अब तू ही (इनसे) बदला ले तो हमने मूसलाधार पानी से आसमान के दरवाज़े खोल दिए
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54:12 🔁 0/5
وَفَجَّرۡنَا ٱلۡأَرۡضَ عُيُونًا فَٱلۡتَقَى ٱلۡمَآءُ عَلَىٰٓ أَمۡرٍ قَدۡ قُدِرَ  ۝١٢
Wa fajjamal arda `uyoonan faltaqal maaa`u `alaaa amrin qad qudir
और ज़मीन से चश्में जारी कर दिए, तो एक काम के लिए जो मुक़र्रर हो चुका था (दोनों) पानी मिलकर एक हो गया
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54:13 🔁 0/5
وَحَمَلۡنَٰهُ عَلَىٰ ذَاتِ أَلۡوَٰحٍ وَدُسُرٍ  ۝١٣
Wa hamalnaahu `alaa zaati alwaahinw wa dusur
और हमने एक कश्ती पर जो तख्तों और कीलों से तैयार की गयी थी सवार किया
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54:14 🔁 0/5
تَجۡرِي بِأَعۡيُنِنَا جَزَآءً لِّمَن كَانَ كُفِرَ  ۝١٤
Tajree bi a`yuninaa jazaaa `al liman kaana kufir
और वह हमारी निगरानी में चल रही थी (ये) उस शख़्श (नूह) का बदला लेने के लिए जिसको लोग न मानते थे
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54:15 🔁 0/5
وَلَقَد تَّرَكۡنَٰهَآ ءَايَةً فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝١٥
Wa laqat taraknaahaad aayatan fahal mim muddakir
और हमने उसको एक इबरत बना कर छोड़ा तो कोई है जो इबरत हासिल करे
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فَكَيۡفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝١٦
Fakaifa kaana `azaabee wa nuzur
तो (उनको) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
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54:17 🔁 0/5
وَلَقَدۡ يَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝١٧
Wa laqad yassamal Quraana liz zikri fahal mimmuddakir
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया है तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
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54:18 🔁 0/5
كَذَّبَتۡ عَادٌ فَكَيۡفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝١٨
Kazzabat `Aadun fakaifa kaana `azaabee wa nuzur
आद (की क़ौम ने) (अपने पैग़म्बर) को झुठलाया तो (उनका) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था,
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54:19 🔁 0/5
إِنَّآ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ رِيحًا صَرۡصَرًا فِي يَوۡمِ نَحۡسٍ مُّسۡتَمِرٍّ  ۝١٩
Innaa arsalnaa `alaihim reehan sarsaran fee Yawmi nahsim mustamirr
हमने उन पर बहुत सख्त मनहूस दिन में बड़े ज़न्नाटे की ऑंधी चलायी
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تَنزِعُ ٱلنَّاسَ كَأَنَّهُمۡ أَعۡجَازُ نَخۡلٍ مُّنقَعِرٍ  ۝٢٠
Tanzi;un naasa ka anna huma`jaazu nakhlim munqa`ir
जो लोगों को (अपनी जगह से) इस तरह उखाड़ फेकती थी गोया वह उखड़े हुए खजूर के तने हैं
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54:21 🔁 0/5
فَكَيۡفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝٢١
Fakaifa kaana `azaabee wa nuzur
तो (उनको) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
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54:22 🔁 0/5
وَلَقَدۡ يَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝٢٢
Wa laqad yassamal Quraana liz zikri fahal mim muddakir
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया, तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
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كَذَّبَتۡ ثَمُودُ بِٱلنُّذُرِ  ۝٢٣
Kazzabat Samoodu binnuzur
(क़ौम) समूद ने डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
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54:24 🔁 0/5
فَقَالُوٓاْ أَبَشَرًا مِّنَّا وَٰحِدًا نَّتَّبِعُهُۥٓ إِنَّآ إِذًا لَّفِي ضَلَٰلٍ وَسُعُرٍ  ۝٢٤
Faqaalooo a-basharam minnaa waahidan nattabi`uhooo innaa izal lafee dalaalinw wa su`ur
तो कहने लगे कि भला एक आदमी की जो हम ही में से हो उसकी पैरवीं करें ऐसा करें तो गुमराही और दीवानगी में पड़ गए
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أَءُلۡقِيَ ٱلذِّكۡرُ عَلَيۡهِ مِنۢ بَيۡنِنَا بَلۡ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٌ  ۝٢٥
A-ulqiyaz zikru `alaihi mim baininaa bal huwa kazzaabun ashir
क्या हम सबमें बस उसी पर वही नाज़िल हुई है (नहीं) बल्कि ये तो बड़ा झूठा तअल्ली करने वाला है
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سَيَعۡلَمُونَ غَدًا مَّنِ ٱلۡكَذَّابُ ٱلۡأَشِرُ  ۝٢٦
Sa-ya`lamoona ghadam manil kazzaabul ashir
उनको अनक़रीब कल ही मालूम हो जाएगा कि कौन बड़ा झूठा तकब्बुर करने वाला है
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إِنَّا مُرۡسِلُواْ ٱلنَّاقَةِ فِتۡنَةً لَّهُمۡ فَٱرۡتَقِبۡهُمۡ وَٱصۡطَبِرۡ  ۝٢٧
Innaa mursilun naaqati fitnatal lahum fartaqibhum wastabir
(ऐ सालेह) हम उनकी आज़माइश के लिए ऊँटनी भेजने वाले हैं तो तुम उनको देखते रहो और (थोड़ा) सब्र करो
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وَنَبِّئۡهُمۡ أَنَّ ٱلۡمَآءَ قِسۡمَةُۢ بَيۡنَهُمۡۖ كُلُّ شِرۡبٍ مُّحۡتَضَرٌ  ۝٢٨
Wa nabbi`hum annal maaa`a qismatum bainahum kullu shirbim muhtadar
और उनको ख़बर कर दो कि उनमें पानी की बारी मुक़र्रर कर दी गयी है हर (बारी वाले को अपनी) बारी पर हाज़िर होना चाहिए
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54:29 🔁 0/5
فَنَادَوۡاْ صَاحِبَهُمۡ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ  ۝٢٩
Fanaadaw saahibahum fata`aataa fa`aqar
तो उन लोगों ने अपने रफीक़ (क़ेदार) को बुलाया तो उसने पकड़ कर (ऊँटनी की) कूंचे काट डालीं
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54:30 🔁 0/5
فَكَيۡفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝٣٠
Fakaifa kaana `azaabee wa nuzur
तो (देखो) मेरा अज़ाब और डराना कैसा था
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54:31 🔁 0/5
إِنَّآ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ صَيۡحَةً وَٰحِدَةً فَكَانُواْ كَهَشِيمِ ٱلۡمُحۡتَظِرِ  ۝٣١
Innaaa arsalnaa `alaihim saihatanw waahidatan fakaano kahasheemil muhtazir
हमने उन पर एक सख्त चिंघाड़ (का अज़ाब) भेज दिया तो वह बाड़े वालो के सूखे हुए चूर चूर भूसे की तरह हो गए
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54:32 🔁 0/5
وَلَقَدۡ يَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝٣٢
Wa laqad yassarnal quraana liz zikri fahal mim muddakir
और हमने क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया है तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
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54:33 🔁 0/5
كَذَّبَتۡ قَوۡمُ لُوطِۭ بِٱلنُّذُرِ  ۝٣٣
Kazzabat qawmu lootim binnuzur
लूत की क़ौम ने भी डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
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إِنَّآ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِمۡ حَاصِبًا إِلَّآ ءَالَ لُوطٍۖ نَّجَّيۡنَٰهُم بِسَحَرٍ  ۝٣٤
Innaa arsalnaa `alaihim haasiban illaaa aala Loot najjainaahum bisahar
तो हमने उन पर कंकर भरी हवा चलाई मगर लूत के लड़के बाले को हमने उनको अपने फज़ल व करम से पिछले ही को बचा लिया
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54:35 🔁 0/5
نِّعۡمَةً مِّنۡ عِندِنَاۚ كَذَٰلِكَ نَجۡزِي مَن شَكَرَ  ۝٣٥
Ni`matam min `indinaa; kazaalika najzee man shakar
हम शुक्र करने वालों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं
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54:36 🔁 0/5
وَلَقَدۡ أَنذَرَهُم بَطۡشَتَنَا فَتَمَارَوۡاْ بِٱلنُّذُرِ  ۝٣٦
Wa laqad anzarahum batshatanaa fatamaaraw binnuzur
और लूत ने उनको हमारी पकड़ से भी डराया था मगर उन लोगों ने डराते ही में शक़ किया
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54:37 🔁 0/5
وَلَقَدۡ رَٰوَدُوهُ عَن ضَيۡفِهِۦ فَطَمَسۡنَآ أَعۡيُنَهُمۡ فَذُوقُواْ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝٣٧
Wa laqad raawadoohu `andaifee fatamasnaaa a`yunahum fazooqoo `azaabee wa nuzur
और उनसे उनके मेहमान (फ़रिश्ते) के बारे में नाजायज़ मतलब की ख्वाहिश की तो हमने उनकी ऑंखें अन्धी कर दीं तो मेरे अज़ाब और डराने का मज़ा चखो
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وَلَقَدۡ صَبَّحَهُم بُكۡرَةً عَذَابٌ مُّسۡتَقِرٌّ  ۝٣٨
Wa laqad sabbahahum bukratan `azaabum mustaqirr
और सुबह सवेरे ही उन पर अज़ाब आ गया जो किसी तरह टल ही नहीं सकता था
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فَذُوقُواْ عَذَابِي وَنُذُرِ  ۝٣٩
Fazooqoo `azaabee wa nuzur
तो मेरे अज़ाब और डराने के (पड़े) मज़े चखो
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وَلَقَدۡ يَسَّرۡنَا ٱلۡقُرۡءَانَ لِلذِّكۡرِ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝٤٠
Wa laqad yassarnal Quraana liz zikri fahal mim muddakir
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
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وَلَقَدۡ جَآءَ ءَالَ فِرۡعَوۡنَ ٱلنُّذُرُ  ۝٤١
Wa laqad jaaa`a Aala Fir`awnan nuzur
और फिरऔन के पास भी डराने वाले (पैग़म्बर) आए
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كَذَّبُواْ بِـَٔايَٰتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذۡنَٰهُمۡ أَخۡذَ عَزِيزٍ مُّقۡتَدِرٍ  ۝٤٢
Kazzaboo bi Aayaatinaa kullihaa fa akhaznaahum akhza `azeezim muqtadir
तो उन लोगों ने हमारी कुल निशानियों को झुठलाया तो हमने उनको इस तरह सख्त पकड़ा जिस तरह एक ज़बरदस्त साहिबे क़ुदरत पकड़ा करता है
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أَكُفَّارُكُمۡ خَيۡرٌ مِّنۡ أُوْلَٰٓئِكُمۡ أَمۡ لَكُم بَرَآءَةٌ فِي ٱلزُّبُرِ  ۝٤٣
Akuffaarukum khairum min ulaaa`ikum am lakum baraaa`atun fiz Zubur
(ऐ अहले मक्का) क्या उन लोगों से भी तुम्हारे कुफ्फार बढ़ कर हैं या तुम्हारे वास्ते (पहली) किताबों में माफी (लिखी हुई) है
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أَمۡ يَقُولُونَ نَحۡنُ جَمِيعٌ مُّنتَصِرٌ  ۝٤٤
Am yaqooloona nahnu jamee`um muntasir
क्या ये लोग कहते हैं कि हम बहुत क़वी जमाअत हैं
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سَيُهۡزَمُ ٱلۡجَمۡعُ وَيُوَلُّونَ ٱلدُّبُرَ  ۝٤٥
Sa yuhzamul jam`u wa yuwalloonad dubur
अनक़रीब ही ये जमाअत शिकस्त खाएगी और ये लोग पीठ फेर कर भाग जाएँगे
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بَلِ ٱلسَّاعَةُ مَوۡعِدُهُمۡ وَٱلسَّاعَةُ أَدۡهَىٰ وَأَمَرُّ  ۝٤٦
Balis Saa`atu maw`iduhum was Saa`atu adhaa wa amarr
बात ये है कि इनके वायदे का वक्त क़यामत है और क़यामत बड़ी सख्त और बड़ी तल्ख़ (चीज़) है
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إِنَّ ٱلۡمُجۡرِمِينَ فِي ضَلَٰلٍ وَسُعُرٍ  ۝٤٧
Innal mujrimeena fee dalaalinw wa su`ur
बेशक गुनाहगार लोग गुमराही और दीवानगी में (मुब्तिला) हैं
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يَوۡمَ يُسۡحَبُونَ فِي ٱلنَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمۡ ذُوقُواْ مَسَّ سَقَرَ  ۝٤٨
Yawma yushaboona fin Naari`alaa wujoohimim zooqoo massa saqar
उस रोज़ ये लोग अपने अपने मुँह के बल (जहन्नुम की) आग में घसीटे जाएँगे (और उनसे कहा जाएगा) अब जहन्नुम की आग का मज़ा चखो
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إِنَّا كُلَّ شَيۡءٍ خَلَقۡنَٰهُ بِقَدَرٍ  ۝٤٩
Innaa kulla shai`in khalaqnaahu biqadar
बेशक हमने हर चीज़ एक मुक़र्रर अन्दाज़ से पैदा की है
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وَمَآ أَمۡرُنَآ إِلَّا وَٰحِدَةٌ كَلَمۡحِۭ بِٱلۡبَصَرِ  ۝٥٠
Wa maaa amrunaaa illaa waahidatun kalamhim bilbasar
और हमारा हुक्म तो बस ऑंख के झपकने की तरह एक बात होती है
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وَلَقَدۡ أَهۡلَكۡنَآ أَشۡيَاعَكُمۡ فَهَلۡ مِن مُّدَّكِرٍ  ۝٥١
Wa laqad ahlaknaaa ashyaa`akum fahal mim muddakir
और हम तुम्हारे हम मशरबो को हलाक कर चुके हैं तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
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وَكُلُّ شَيۡءٍ فَعَلُوهُ فِي ٱلزُّبُرِ  ۝٥٢
Wa kullu shai`in fa`aloohu fiz Zubur
और अगर चे ये लोग जो कुछ कर चुके हैं (इनके) आमाल नामों में (दर्ज) है
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وَكُلُّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ مُّسۡتَطَرٌ  ۝٥٣
Wa kullu sagheerinw wa kabeerim mustatar
(यानि) हर छोटा और बड़ा काम लिख दिया गया है
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إِنَّ ٱلۡمُتَّقِينَ فِي جَنَّٰتٍ وَنَهَرٍ  ۝٥٤
Innal muttaqeena fee jannaatinw wa nahar
बेशक परहेज़गार लोग (बेहिश्त के) बाग़ों और नहरों में
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فِي مَقۡعَدِ صِدۡقٍ عِندَ مَلِيكٍ مُّقۡتَدِرِۭ  ۝٥٥
Fee maq`adi sidqin `inda Maleekim Muqtadir
(यानि) पसन्दीदा मक़ाम में हर तरह की कुदरत रखने वाले बादशाह की बारगाह में (मुक़र्रिब) होंगे
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🎊 शाबाश! याद पूरी हुई
Mishary Rashid Alafasy
Mahmoud Khalil Al-Husary
Abdurrahman As-Sudais
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
Abdul Basit Abdul Samad
Ali Al-Hudhaify
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
Abu Bakr Ash-Shaatree
Muhammad Ayyoub
Abdullah Basfar
Abdullah Al-Juhani
Maher Al Muaiqly
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पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए