Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- أَمَنَةً: शांति और चैन, भय के बाद सुकून।
- نُعَاسًا: ऊंघ, हल्की नींद जो दिल को सुकून दे।
- يَغْشَى: ढक लेना, छा जाना।
- أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ: उन्हें अपनी जान की चिंता लग गई।
- ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ: अज्ञान काल जैसा गलत ख़याल (अल्लाह के बारे में बुरा गुमान)।
- مَضَاجِعِهِمْ: उनके मरने की जगहें, क़त्लगाह।
तफ़सीर:
फिर अल्लाह तआला ने उस ग़म और मुसीबत के बाद तुम पर सुकून और इत्मीनान उतारा, जो नींद की ऊंघ की शक्ल में तुममें से एक गिरोह पर छा गई। ये वो मोमिनीन थे जिनके दिल अल्लाह के वादे पर पक्का यक़ीन रखते थे, इसलिए उन्हें चैन मिला और वो सो गए। लेकिन दूसरा गिरोह (मुनाफ़िक़ीन) ऐसा था जिन्हें सिर्फ़ अपनी जान की फ़िक्र थी। उन्होंने अल्लाह के बारे में बुरा गुमान किया — जैसा जाहिलियत के लोग किया करते थे — कि क्या अल्लाह अपने रसूल की मदद करेगा? क्या ये दीन कामयाब होगा? उन्होंने सोचा कि इस्लाम का कोई भविष्य नहीं।
वो आपस में कहने लगे: "क्या हमारे पास इस मामले (जंग में निकलने) का कोई इख़्तियार था?" यानी वो जंग में आने पर पछता रहे थे। अल्लाह तआला ने नबी ﷺ से कहने को कहा: "कह दो कि पूरा मामला अल्लाह के हाथ में है।" वो अपने दिलों में वो बातें छिपाते हैं जो आपके सामने ज़ाहिर नहीं करते। वो आपस में कहते हैं: "अगर हमारा कोई इख़्तियार होता तो हम यहाँ क़त्ल न होते।"
अल्लाह तआला ने उनके इस ख़याल का जवाब दिया: "कह दो, अगर तुम अपने घरों में भी होते, तो जिनकी क़िस्मत में मौत लिखी जाती, वो ख़ुद अपनी क़त्लगाहों की तरफ़ निकल आते।" यानी मौत का फ़ैसला अल्लाह ने पहले ही लिख दिया है, न कोई उससे बच सकता है और न उसे टाला जा सकता है।
अल्लाह ने ये सब कुछ इसलिए किया ताकि तुम्हारे सीनों के हालात को आज़माए और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है — ईमान या निफ़ाक़ — उसे ज़ाहिर कर दे। बेशक अल्लाह तआला दिलों के राज़ से पूरी तरह वाक़िफ़ है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।
दावती पहलू:
ये आयत हमें सिखाती है कि मुसीबत के वक़्त भी अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। जो दिल अल्लाह से जुड़े होते हैं, उन्हें अल्लाह सुकून और इत्मीनान देता है, चाहे हालात कितने भी ख़राब क्यों न हों। और जो लोग अल्लाह से कटे होते हैं, वो हर मुश्किल में घबरा जाते हैं और अल्लाह पर बुरा गुमान करते हैं। हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह पर अच्छा गुमान रखें, क्योंकि अल्लाह ही सब कुछ करने वाला है। मौत और ज़िंदगी उसी के हाथ में है, और उसका हर फ़ैसला हिकमत पर आधारित होता है। ये आयत हमें ये भी सिखाती है कि मोमिन की पहचान ये है कि वो मुसीबत में भी अल्लाह पर भरोसा रखता है और उसकी रज़ा पर राज़ी रहता है।
📜 आयत 152-156 — सूरा आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 154
सूरा आल-इमरान आयत 154 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की…सूरा आयत 154/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 152–156. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा आल-इमरान
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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