आल-इमरान · 154/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
ثُمَّ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّن بَعْدِ الْغَمِّ أَمَنَةً نُّعَاسًا يَغْشَىٰ طَائِفَةً مِّنكُمْ ۖ وَطَائِفَةٌ قَدْ أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِاللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ ۖ يَقُولُونَ هَل لَّنَا مِنَ الْأَمْرِ مِن شَيْءٍ ۗ قُلْ إِنَّ الْأَمْرَ كُلَّهُ لِلَّهِ ۗ يُخْفُونَ فِي أَنفُسِهِم مَّا لَا يُبْدُونَ لَكَ ۖ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ مَّا قُتِلْنَا هَاهُنَا ۗ قُل لَّوْ كُنتُمْ فِي بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذِينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ إِلَىٰ مَضَاجِعِهِمْ ۖ وَلِيَبْتَلِيَ اللَّهُ مَا فِي صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِي قُلُوبِكُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ ۝١٥٤
Summa anzala `alaikum mim ba`dil ghammi amanatan nu`aasai yaghshaa taaa` ifatam minkum wa taaa`ifatun qad ahammathum anfusuhum yazunnoona billaahi ghairal haqqi zannal jaahiliyyati yaqooloona hal lanaa minal amri min shai`; qul innal amra kullahoo lillaah; yukhfoona fee anfusihim maa laa yubdoona laka yaqooloona law kaana lanaa minal amri shai`ummaa qutilnaa haahunaa; qul law kuntum fee buyootikum labarazal lazeena kutiba `alaihimul qatlu ilaa madaaji`ihim wa liyabtaliyal laahu maa fee sudoorikum wa liyumah hisa maa fee quloobikum; wallaahu `aleemum bizaatis sudoor
📖 हिंदी अर्थ
फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की हालत तारी की कि तुममें से एक गिरोह का (जो सच्चे ईमानदार थे) ख़ूब गहरी नींद आ गयी और एक गिरोह जिनको उस वक्त भी (भागने की शर्म से) जान के लाले पड़े थे ख़ुदा के साथ (ख्वाह मख्वाह) ज़मानाए जिहालत की ऐसी बदगुमानियॉ करने लगे और कहने लगे भला क्या ये अम्र (फ़तेह) कुछ भी हमारे इख्तियार में है (ऐ रसूल) कह दो कि हर अम्र का इख्तियार ख़ुदा ही को है (ज़बान से तो कहते ही है नहीं) ये अपने दिलों में ऐसी बातें छिपाए हुए हैं जो तुमसे ज़ाहिर नहीं करते (अब सुनो) कहते हैं कि इस अम्र (फ़तेह) में हमारा कुछ इख़्तियार होता तो हम यहॉ मारे न जाते (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि तुम अपने घरों में रहते तो जिन जिन की तकदीर में लड़के मर जाना लिखा था वह अपने (घरो से) निकल निकल के अपने मरने की जगह ज़रूर आ जाते और (ये इस वास्ते किया गया) ताकि जो कुछ तुम्हारे दिल में है उसका इम्तिहान कर दे और ख़ुदा तो दिलों के राज़ खूब जानता है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَمَنَةً: शांति और चैन, भय के बाद सुकून।
  • نُعَاسًا: ऊंघ, हल्की नींद जो दिल को सुकून दे।
  • يَغْشَى: ढक लेना, छा जाना।
  • أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ: उन्हें अपनी जान की चिंता लग गई।
  • ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ: अज्ञान काल जैसा गलत ख़याल (अल्लाह के बारे में बुरा गुमान)।
  • مَضَاجِعِهِمْ: उनके मरने की जगहें, क़त्लगाह।

तफ़सीर:

फिर अल्लाह तआला ने उस ग़म और मुसीबत के बाद तुम पर सुकून और इत्मीनान उतारा, जो नींद की ऊंघ की शक्ल में तुममें से एक गिरोह पर छा गई। ये वो मोमिनीन थे जिनके दिल अल्लाह के वादे पर पक्का यक़ीन रखते थे, इसलिए उन्हें चैन मिला और वो सो गए। लेकिन दूसरा गिरोह (मुनाफ़िक़ीन) ऐसा था जिन्हें सिर्फ़ अपनी जान की फ़िक्र थी। उन्होंने अल्लाह के बारे में बुरा गुमान किया — जैसा जाहिलियत के लोग किया करते थे — कि क्या अल्लाह अपने रसूल की मदद करेगा? क्या ये दीन कामयाब होगा? उन्होंने सोचा कि इस्लाम का कोई भविष्य नहीं।

वो आपस में कहने लगे: "क्या हमारे पास इस मामले (जंग में निकलने) का कोई इख़्तियार था?" यानी वो जंग में आने पर पछता रहे थे। अल्लाह तआला ने नबी ﷺ से कहने को कहा: "कह दो कि पूरा मामला अल्लाह के हाथ में है।" वो अपने दिलों में वो बातें छिपाते हैं जो आपके सामने ज़ाहिर नहीं करते। वो आपस में कहते हैं: "अगर हमारा कोई इख़्तियार होता तो हम यहाँ क़त्ल न होते।"

अल्लाह तआला ने उनके इस ख़याल का जवाब दिया: "कह दो, अगर तुम अपने घरों में भी होते, तो जिनकी क़िस्मत में मौत लिखी जाती, वो ख़ुद अपनी क़त्लगाहों की तरफ़ निकल आते।" यानी मौत का फ़ैसला अल्लाह ने पहले ही लिख दिया है, न कोई उससे बच सकता है और न उसे टाला जा सकता है।

अल्लाह ने ये सब कुछ इसलिए किया ताकि तुम्हारे सीनों के हालात को आज़माए और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है — ईमान या निफ़ाक़ — उसे ज़ाहिर कर दे। बेशक अल्लाह तआला दिलों के राज़ से पूरी तरह वाक़िफ़ है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।


दावती पहलू:

ये आयत हमें सिखाती है कि मुसीबत के वक़्त भी अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। जो दिल अल्लाह से जुड़े होते हैं, उन्हें अल्लाह सुकून और इत्मीनान देता है, चाहे हालात कितने भी ख़राब क्यों न हों। और जो लोग अल्लाह से कटे होते हैं, वो हर मुश्किल में घबरा जाते हैं और अल्लाह पर बुरा गुमान करते हैं। हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह पर अच्छा गुमान रखें, क्योंकि अल्लाह ही सब कुछ करने वाला है। मौत और ज़िंदगी उसी के हाथ में है, और उसका हर फ़ैसला हिकमत पर आधारित होता है। ये आयत हमें ये भी सिखाती है कि मोमिन की पहचान ये है कि वो मुसीबत में भी अल्लाह पर भरोसा रखता है और उसकी रज़ा पर राज़ी रहता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 152-156 — आल-इमरान

152وَلَقَدْ صَدَقَكُمُ اللَّهُ وَعْدَهُ إِذْ تَحُسُّونَهُم بِإِذْنِهِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا فَشِلْتُمْ وَتَنَازَعْتُمْ فِي الْأَمْرِ وَعَصَيْتُم مِّن بَعْدِ مَا أَرَاكُم مَّا تُحِبُّونَ ۚ مِنكُم مَّن يُرِيدُ الدُّنْيَا وَمِنكُم مَّن يُرِيدُ الْآخِرَةَ ۚ ثُمَّ صَرَفَكُمْ عَنْهُمْ لِيَبْتَلِيَكُمْ ۖ وَلَقَدْ عَفَا عَنكُمْ ۗ وَاللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ
बेशक खुदा ने (जंगे औहद में भी) अपना (फतेह का) वायदा सच्चा कर दिखाया था जब तुम उसके हुक्म से (पहले ही हमले में) उन (कुफ्फ़ार) को खूब क़त्ल कर रहे थे यहॉ तक की तुम्हारे पसन्द की चीज़ (फ़तेह) तुम्हें दिखा दी उसके बाद भी तुमने (माले ग़नीमत देखकर) बुज़दिलापन किया और हुक्में रसूल (मोर्चे पर जमे रहने) झगड़ा किया और रसूल की नाफ़रमानी की तुममें से कुछ तो तालिबे दुनिया हैं (कि माले ग़नीमत की तरफ़) से झुक पड़े और कुछ तालिबे आख़िरत (कि रसूल पर अपनी जान फ़िदा कर दी) फिर (बुज़दिलेपन ने) तुम्हें उन (कुफ्फ़ार) की की तरफ से फेर दिया (और तुम भाग खड़े हुए) उससे ख़ुदा को तुम्हारा (ईमान अख़लासी) आज़माना मंज़ूर था और (उसपर भी) ख़ुदा ने तुमसे दरगुज़र की और खुदा मोमिनीन पर बड़ा फ़ज़ल करने वाला है
153۞ إِذْ تُصْعِدُونَ وَلَا تَلْوُونَ عَلَىٰ أَحَدٍ وَالرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ فِي أُخْرَاكُمْ فَأَثَابَكُمْ غَمًّا بِغَمٍّ لِّكَيْلَا تَحْزَنُوا عَلَىٰ مَا فَاتَكُمْ وَلَا مَا أَصَابَكُمْ ۗ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
(मुसलमानों तुम) उस वक्त क़ो याद करके शर्माओ जब तुम (बदहवास) भागे पहाड़ पर चले जाते थे पस (चूंकि) रसूल को तुमने (आज़ारदा) किया ख़ुदा ने भी तुमको (इस) रंज की सज़ा में (शिकस्त का) रंज दिया ताकि जब कभी तुम्हारी कोई चीज़ हाथ से जाती रहे या कोई मुसीबत पड़े तो तुम रंज न करो और सब्र करना सीखो और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
154ثُمَّ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّن بَعْدِ الْغَمِّ أَمَنَةً نُّعَاسًا يَغْشَىٰ طَائِفَةً مِّنكُمْ ۖ وَطَائِفَةٌ قَدْ أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِاللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ ۖ يَقُولُونَ هَل لَّنَا مِنَ الْأَمْرِ مِن شَيْءٍ ۗ قُلْ إِنَّ الْأَمْرَ كُلَّهُ لِلَّهِ ۗ يُخْفُونَ فِي أَنفُسِهِم مَّا لَا يُبْدُونَ لَكَ ۖ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ مَّا قُتِلْنَا هَاهُنَا ۗ قُل لَّوْ كُنتُمْ فِي بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذِينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ إِلَىٰ مَضَاجِعِهِمْ ۖ وَلِيَبْتَلِيَ اللَّهُ مَا فِي صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِي قُلُوبِكُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की हालत तारी की कि तुममें से एक गिरोह का (जो सच्चे ईमानदार थे) ख़ूब गहरी नींद आ गयी और एक गिरोह जिनको उस वक्त भी (भागने की शर्म से) जान के लाले पड़े थे ख़ुदा के साथ (ख्वाह मख्वाह) ज़मानाए जिहालत की ऐसी बदगुमानियॉ करने लगे और कहने लगे भला क्या ये अम्र (फ़तेह) कुछ भी हमारे इख्तियार में है (ऐ रसूल) कह दो कि हर अम्र का इख्तियार ख़ुदा ही को है (ज़बान से तो कहते ही है नहीं) ये अपने दिलों में ऐसी बातें छिपाए हुए हैं जो तुमसे ज़ाहिर नहीं करते (अब सुनो) कहते हैं कि इस अम्र (फ़तेह) में हमारा कुछ इख़्तियार होता तो हम यहॉ मारे न जाते (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि तुम अपने घरों में रहते तो जिन जिन की तकदीर में लड़के मर जाना लिखा था वह अपने (घरो से) निकल निकल के अपने मरने की जगह ज़रूर आ जाते और (ये इस वास्ते किया गया) ताकि जो कुछ तुम्हारे दिल में है उसका इम्तिहान कर दे और ख़ुदा तो दिलों के राज़ खूब जानता है
155إِنَّ الَّذِينَ تَوَلَّوْا مِنكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ إِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطَانُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُوا ۖ وَلَقَدْ عَفَا اللَّهُ عَنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ
बेशक जिस दिन (जंगे औहद में) दो जमाअतें आपस में गुथ गयीं उस दिन जो लोग तुम (मुसलमानों) में से भाग खड़े हुए (उसकी वजह ये थी कि) उनके बाज़ गुनाहों (मुख़ालफ़ते रसूल) की वजह से शैतान ने बहका के उनके पॉव उखाड़ दिए और (उसी वक्त तो) ख़ुदा ने ज़रूर उनसे दरगुज़र की बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला बुर्दवार है
156يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ أَوْ كَانُوا غُزًّى لَّوْ كَانُوا عِندَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُوا لِيَجْعَلَ اللَّهُ ذَٰلِكَ حَسْرَةً فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
ऐ ईमानदारों उन लोगों के ऐसे न बनो जो काफ़िर हो गए भाई बन्द उनके परदेस में निकले हैं या जेहाद करने गए हैं (और वहॉ) मर (गए) तो उनके बारे में कहने लगे कि वह हमारे पास रहते तो न मरते ओर न मारे जाते (और ये इस वजह से कहते हैं) ताकि ख़ुदा (इस ख्याल को) उनके दिलों में (बाइसे) हसरत बना दे और (यूं तो) ख़ुदा ही जिलाता और मारता है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीRevelation
154आयत

अनुवाद — आल-इमरान 154

सूरा आल-इमरान आयत 154 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की…

सूरा आयत 154/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 152–156. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए