Iz tus`idoona wa laa talwoona `alaaa ahadinw war Rasoolu yad`ookum feee ukhraakum fa asaabakum ghammam bighammil likailaa tahzanoo `alaa maa faatakum wa laa maaa asaabakum; wallaahu khabeerum bimaa ta`maloon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों तुम) उस वक्त क़ो याद करके शर्माओ जब तुम (बदहवास) भागे पहाड़ पर चले जाते थे पस (चूंकि) रसूल को तुमने (आज़ारदा) किया ख़ुदा ने भी तुमको (इस) रंज की सज़ा में (शिकस्त का) रंज दिया ताकि जब कभी तुम्हारी कोई चीज़ हाथ से जाती रहे या कोई मुसीबत पड़े तो तुम रंज न करो और सब्र करना सीखो और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
(وہ وقت بھی یاد کرنے کے لائق ہے) جب تم لوگ دور بھاگے جاتے تھے اور کسی کو پیچھے پھر کر نہیں دیکھتے تھے اور رسول الله تم کو تمہارے پیچھے کھڑے بلا رہے تھے تو خدا نے تم کو غم پر غم پہنچایا تاکہ جو چیز تمہارے ہاتھ سے جاتی رہی یا جو مصیبت تم پر واقع ہوئی ہے اس سے تم اندوہ ناک نہ ہو اور خدا تمہارے سب اعمال سے خبردار ہے
لَا تَلْوُونَ عَلَى أَحَدٍ: किसी की ओर ध्यान नहीं दे रहे थे, न किसी की ओर मुड़ रहे थे।
فِي أُخْرَاكُمْ: तुम्हारे पीछे से।
فَأَثَابَكُمْ: तो उसने तुम्हें बदला दिया।
غَمًّا بِغَمٍّ: एक शोक के बाद दूसरा शोक, अर्थात् शोक के बदले शोक।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ ईमानवालों! उस समय को याद करो जब उहुद के मैदान में तुम पहाड़ की ओर भाग रहे थे, और भय तथा घबराहट के कारण तुम में से कोई किसी की ओर देखता भी नहीं था। तुम सब अपनी जान बचाने में लगे हुए थे। हालाँकि रसूलुल्लाह ﷺ मैदान में डटे हुए थे और पीछे से तुम्हें पुकार रहे थे: "ऐ अल्लाह के बंदो! मेरी ओर आओ, मेरी ओर आओ!" लेकिन तुम उनकी आवाज़ पर ध्यान नहीं दे रहे थे। यह इसलिए हुआ क्योंकि तुमने पैग़म्बर ﷺ के आदेश की अवहेलना की थी और तीरंदाज़ों ने अपनी जगह छोड़ दी थी, जिसके कारण शत्रु ने पीछे से हमला कर दिया और तुम्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
इस अवज्ञा के कारण अल्लाह ने तुम्हें शोक और संकट का बदला दिया—एक शोक के बाद दूसरा शोक। पहला शोक पराजय और हानि का था, और दूसरा शोक यह अफवाह फैलने का था कि रसूलुल्लाह ﷺ शहीद हो गए हैं। यह इसलिए किया गया ताकि तुम उस नुक़सान (विजय और धन-संपत्ति) पर शोक न करो जो तुमसे छूट गया, और न उस पर शोक करो जो तुम पर बीती (क़त्ल, ज़ख्म और अपमानजनक हार)। क्योंकि जब तुम्हें यह ज्ञात हुआ कि नबी ﷺ जीवित हैं, तो यह ख़बर तुम्हारे लिए हर मुसीबत से बड़ी थी और उसने तुम्हारे दिलों को सांत्वना दी। अल्लाह तुम्हारे सभी कार्यों से भली-भाँति अवगत है, चाहे वे दिल के हों या शरीर के, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
फ़ायदे (निष्कर्ष):
अल्लाह की परीक्षा और उसकी ओर से मिलने वाली कठिनाइयाँ बंदे के लिए सीख और सफ़ाई का ज़रिया होती हैं, ताकि वह अपनी ग़लतियों से सबक़ सीखे।
नबी ﷺ की आज्ञा का पालन करना हर हाल में ज़रूरी है; उसकी अवहेलना पराजय और संकट का कारण बनती है।
मुसीबत के समय अल्लाह की ओर रुजू करना चाहिए और उसी पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही सब कुछ जानने वाला है।
यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि दुनिया की हानि और नुक़सान पर शोक न करें, बल्कि अल्लाह की रज़ा और उसके दीन की मदद को सबसे बड़ा लक्ष्य बनाएँ।
अल्लाह की सज़ा भी रहमत का रूप ले सकती है, क्योंकि इस घटना ने ईमानवालों को दृढ़ता और सब्र सिखाया और उनके दिलों को नबी ﷺ की मुहब्बत में पक्का किया।
(मुसलमानों तुम) उस वक्त क़ो याद करके शर्माओ जब तुम (बदहवास) भागे पहाड़ पर चले जाते थे पस (चूंकि) रसूल को तुमने (आज़ारदा) किया ख़ुदा ने भी तुमको (इस) रंज की सज़ा में (शिकस्त का) रंज दिया ताकि जब कभी तुम्हारी कोई चीज़ हाथ से जाती रहे या कोई मुसीबत पड़े तो तुम रंज न करो और सब्र करना सीखो और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
(तुम घबराओ नहीं) हम अनक़रीब तुम्हारा रोब काफ़िरों के दिलों में जमा देंगे इसलिए कि उन लोगों ने ख़ुदा का शरीक बनाया (भी तो) इस चीज़ बुत को जिसे ख़ुदा ने किसी क़िस्म की हुकूमत नहीं दी और (आख़िरकार) उनका ठिकाना दौज़ख़ है और ज़ालिमों का (भी क्या) बुरा ठिकाना है
बेशक खुदा ने (जंगे औहद में भी) अपना (फतेह का) वायदा सच्चा कर दिखाया था जब तुम उसके हुक्म से (पहले ही हमले में) उन (कुफ्फ़ार) को खूब क़त्ल कर रहे थे यहॉ तक की तुम्हारे पसन्द की चीज़ (फ़तेह) तुम्हें दिखा दी उसके बाद भी तुमने (माले ग़नीमत देखकर) बुज़दिलापन किया और हुक्में रसूल (मोर्चे पर जमे रहने) झगड़ा किया और रसूल की नाफ़रमानी की तुममें से कुछ तो तालिबे दुनिया हैं (कि माले ग़नीमत की तरफ़) से झुक पड़े और कुछ तालिबे आख़िरत (कि रसूल पर अपनी जान फ़िदा कर दी) फिर (बुज़दिलेपन ने) तुम्हें उन (कुफ्फ़ार) की की तरफ से फेर दिया (और तुम भाग खड़े हुए) उससे ख़ुदा को तुम्हारा (ईमान अख़लासी) आज़माना मंज़ूर था और (उसपर भी) ख़ुदा ने तुमसे दरगुज़र की और खुदा मोमिनीन पर बड़ा फ़ज़ल करने वाला है
(मुसलमानों तुम) उस वक्त क़ो याद करके शर्माओ जब तुम (बदहवास) भागे पहाड़ पर चले जाते थे पस (चूंकि) रसूल को तुमने (आज़ारदा) किया ख़ुदा ने भी तुमको (इस) रंज की सज़ा में (शिकस्त का) रंज दिया ताकि जब कभी तुम्हारी कोई चीज़ हाथ से जाती रहे या कोई मुसीबत पड़े तो तुम रंज न करो और सब्र करना सीखो और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की हालत तारी की कि तुममें से एक गिरोह का (जो सच्चे ईमानदार थे) ख़ूब गहरी नींद आ गयी और एक गिरोह जिनको उस वक्त भी (भागने की शर्म से) जान के लाले पड़े थे ख़ुदा के साथ (ख्वाह मख्वाह) ज़मानाए जिहालत की ऐसी बदगुमानियॉ करने लगे और कहने लगे भला क्या ये अम्र (फ़तेह) कुछ भी हमारे इख्तियार में है (ऐ रसूल) कह दो कि हर अम्र का इख्तियार ख़ुदा ही को है (ज़बान से तो कहते ही है नहीं) ये अपने दिलों में ऐसी बातें छिपाए हुए हैं जो तुमसे ज़ाहिर नहीं करते (अब सुनो) कहते हैं कि इस अम्र (फ़तेह) में हमारा कुछ इख़्तियार होता तो हम यहॉ मारे न जाते (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि तुम अपने घरों में रहते तो जिन जिन की तकदीर में लड़के मर जाना लिखा था वह अपने (घरो से) निकल निकल के अपने मरने की जगह ज़रूर आ जाते और (ये इस वास्ते किया गया) ताकि जो कुछ तुम्हारे दिल में है उसका इम्तिहान कर दे और ख़ुदा तो दिलों के राज़ खूब जानता है
बेशक जिस दिन (जंगे औहद में) दो जमाअतें आपस में गुथ गयीं उस दिन जो लोग तुम (मुसलमानों) में से भाग खड़े हुए (उसकी वजह ये थी कि) उनके बाज़ गुनाहों (मुख़ालफ़ते रसूल) की वजह से शैतान ने बहका के उनके पॉव उखाड़ दिए और (उसी वक्त तो) ख़ुदा ने ज़रूर उनसे दरगुज़र की बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला बुर्दवार है
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