अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لِّلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ: आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, सब अल्लाह ही का है।
- وَإِن تُبْدُوا: और यदि तुम प्रकट करो।
- مَا فِي أَنفُسِكُمْ: जो कुछ तुम्हारे मनों में है।
- أَوْ تُخْفُوهُ: या उसे छिपाओ।
- يُحَاسِبْكُم بِهِ: उसके द्वारा वह तुमसे हिसाब लेगा।
- فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ: तो वह जिसे चाहे क्षमा कर दे।
- وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ: और जिसे चाहे यातना दे।
- وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ: और अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत अल्लाह की संपूर्ण प्रभुता और उसके असीम ज्ञान को स्पष्ट करती है। आकाशों और धरती में जो कुछ भी है—चाहे वह छोटा हो या बड़ा, प्रत्यक्ष हो या परोक्ष—सब कुछ अल्लाह ही की मिल्कियत (स्वामित्व) में है। वही इन सबका रचयिता, पालनहार और प्रबंधक है। उसकी सत्ता से कोई चीज़ बाहर नहीं है, और उसके ज्ञान से कोई भी बात छिपी नहीं है।
फिर अल्लाह तआला बताता है कि तुम चाहे अपने दिलों की बातों को प्रकट करो या उन्हें छिपाओ, अल्लाह उन सबको जानता है और उन पर तुमसे हिसाब लेगा। यह हिसाब उसके न्याय और उसके ज्ञान की पूर्णता के अनुसार होगा। वह जिसे चाहे अपने कृपा और दया से क्षमा कर देता है, और जिसे चाहे अपने न्याय और हिकमत के अनुसार यातना देता है। उसका क्षमा करना उसकी रहमत है, और उसका यातना देना उसका न्याय है—दोनों ही उसकी हिकमत के अनुसार हैं।
अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है। वह जीवन देने, मृत्यु देने, हिसाब लेने, क्षमा करने और यातना देने—सब कुछ करने पर कादिर है। उसकी कुदरत (शक्ति) के आगे कोई चीज़ असम्भव नहीं है।
इस आयत के बाद अल्लाह ने मुसलमानों पर विशेष कृपा की कि दिल में आने वाले ख़यालात (विचारों) और दिल की बातों पर तब तक मुख़ाहिज़ा (पकड़) नहीं होगा, जब तक कि उन पर अमल न किया जाए या उन्हें ज़ुबान से न कहा जाए। यह बात रसूलुल्लाह ﷺ की हदीस से साबित है।
फ़ायदे (लाभ):
- इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की मिल्कियत और उसका ज्ञान हर चीज़ को घेरे हुए है। जब हमें यह यक़ीन हो जाए कि अल्लाह हमारे दिल की हर बात को जानता है, तो हमारे दिल में उसका ख़ौफ़ पैदा होता है और हम गुनाहों से बचते हैं।
- यह आयत हमें अल्लाह की रहमत की ओर ले जाती है—वह जिसे चाहे क्षमा कर देता है। यह बात मुसलमान के दिल में उम्मीद पैदा करती है कि चाहे हमसे कितने ही गुनाह हुए हों, अल्लाह की रहमत उन सबसे बड़ी है।
- अल्लाह की कुदरत का ज़िक्र हमें यह सिखाता है कि हमें केवल अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि वही हर चीज़ पर सामर्थ्य रखता है। कोई भी मुश्किल उसके लिए बड़ी नहीं है।
- यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह का दीन (धर्म) न्याय और रहमत पर आधारित है। वह न्याय करता है, लेकिन अपनी रहमत से क्षमा करना उसे अधिक पसंद है। यही इस्लाम की सुंदरता है—उम्मीद और ख़ौफ़ का संतुलन।
📜 आयत 282-286 — अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 284
सूरा अल-बकरा आयत 284 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में…सूरा आयत 284/286 — अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-बकरा सुनें, अल-बकरा अनुवाद, अल-बकरा mp3, अल-बकरा pdf. आयत 282–286. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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