Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- آمَنَ: विश्वास किया, दिल से सत्य माना।
- الرَّسُولُ: अल्लाह के पैगंबर मुहम्मद ﷺ।
- أُنزِلَ إِلَيْهِ: जो कुछ उन पर उतारा गया (यानी कुरआन और वह सब जो वह्य के रूप में मिला)।
- الْمُؤْمِنُونَ: सच्चे ईमान वाले लोग।
- لَا نُفَرِّقُ: हम फर्क नहीं करते।
- سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا: हमने सुना और हमने आज्ञा मानी।
- غُفْرَانَكَ: हे अल्लाह! हम तेरी क्षमा चाहते हैं।
- الْمَصِيرُ: लौटने की जगह, अंतिम ठिकाना।
तफसीर:
इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला अपने आखिरी नबी मुहम्मद ﷺ और उनके सच्चे साथियों (ईमान वालों) की तारीफ कर रहा है। रसूलुल्लाह ﷺ ने उस हर चीज़ पर दिल से ईमान लाया जो उनके रब की तरफ से उन पर उतारी गई — चाहे वह कुरआन हो या कोई और वह्य। और ईमान वाले मुसलमानों ने भी यही किया। उन्होंने अल्लाह पर, उसके सब फ़रिश्तों पर, उसकी सब किताबों (तौरात, ज़बूर, इंजील, कुरआन) पर और उसके सब पैगंबरों पर पूरा विश्वास किया। वे कहते हैं: "हम अल्लाह के किसी भी रसूल के बीच फर्क नहीं करते" — यानी हम किसी नबी को नहीं मानते और किसी को नहीं, बल्कि सबको सच्चा और अल्लाह का भेजा हुआ मानते हैं। यह उन यहूदियों और ईसाइयों के खिलाफ है जो कुछ नबियों पर ईमान लाते थे और कुछ को झुठलाते थे।
फिर रसूल और ईमान वालों ने अल्लाह से कहा: "हमने सुना और हमने आज्ञा मानी" — यानी हमने तेरा हुक्म सुना, उसे कबूल किया, और उस पर अमल किया। यह सिर्फ ज़ुबान का दावा नहीं था, बल्कि दिल का यक़ीन और अमल का सबूत था। फिर उन्होंने दुआ की: "हे हमारे रब! हम तेरी मगफिरत (क्षमा) चाहते हैं, और तेरी ही तरफ लौटना है।" यानी हमें माफ कर दे, हमारी कमियों को ढांक दे, क्योंकि हमें तेरी ही तरफ लौटकर जाना है और तू ही हमारा आखिरी ठिकाना है।
दावत और नसीहत:
यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का मतलब सिर्फ ज़ुबान से कहना नहीं, बल्कि दिल से यक़ीन करना, ज़ुबान से इकरार करना और अमल से साबित करना है। जिस तरह रसूलुल्लाह ﷺ और उनके साथियों ने पूरे ईमान के साथ अल्लाह के हर हुक्म को कबूल किया और कहा "सुना और माना", उसी तरह हमें भी अपनी ज़िंदगी में कुरआन और सुन्नत के हर हुक्म को खुशी से कबूल करना चाहिए। अल्लाह से माफी मांगना और उसी की तरफ लौटने का यक़ीन रखना ही सच्चे मुसलमान की पहचान है। यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह के दीन में कोई भेदभाव नहीं — सब नबी सच्चे हैं, सब किताबें अल्लाह की तरफ से हैं, और हमें सब पर एक जैसा ईमान लाना है। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की रहमत और मगफिरत तक पहुंचाता है।
📜 आयत 283-286 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 285
सूरा अल-बकरा आयत 285 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : हमारे पैग़म्बर (मोहम्मद) जो कुछ उनपर उनके परवरदिगार की तरफ…सूरा आयत 285/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 283–286. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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