अल-बकरा · 280/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِن كَانَ ذُو عُسۡرَةٍ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيۡسَرَةٍۚ وَأَن تَصَدَّقُواْ خَيۡرٌ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ  ۝٢٨٠
Wa in kaana zoo `usratin fanaziratun ilaa maisarah; wa an tasaddaqoo khairul lakum in kuntum ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर कोई तंगदस्त तुम्हारा (क़र्ज़दार हो) तो उसे ख़ुशहाली तक मोहल्लत (दो) और सदक़ा करो और अगर तुम समझो तो तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है कि असल भी बख्श दो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذُو عُسْرَةٍ (ज़ू उसरतिन): जो कर्ज़दार तंगी और मुश्किल में हो, उसके पास कर्ज़ अदा करने की कूव्वत न हो।
  • فَنَظِرَةٌ (फ़नज़िरतुन): मोहलत देना, ढील देना, इंतज़ार करना।
  • مَيْسَرَةٍ (मैसरतिन): आसानी, खुशहाली, वह वक़्त जब कर्ज़दार के पास पैसा आ जाए।
  • تَصَدَّقُوا (तसद्दक़ू): ख़ैरात करना, यानी कर्ज़ माफ़ कर देना या उसमें से कुछ छोड़ देना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में कर्ज़ के मामले में बड़ी ही प्यारी और रहमदिली भरी हिदायत दे रहा है। जब कोई कर्ज़दार तंगी और मुश्किल में हो, उसके पास अदा करने की ताक़त न हो, तो उस पर ज़ुल्म न करो, उसे सख़्ती से न दबाओ, बल्कि उसे मोहलत दो। उस वक़्त तक इंतज़ार करो जब तक अल्लाह उसे आसानी न दे और वह कर्ज़ अदा करने के क़ाबिल न हो जाए। यह एक इंसानियत और रहम का तक़ाज़ा है।

फिर अल्लाह तआला इससे भी बेहतर बात बताता है—अगर तुम कर्ज़दार की मुश्किल देखकर उसका पूरा कर्ज़ माफ़ कर दो या उसमें से कुछ हिस्सा छोड़ दो, तो यह तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतर है। यह सिर्फ़ कर्ज़दार पर एहसान नहीं, बल्कि तुम्हारे अपने लिए अल्लाह के यहाँ बड़ा अज्र और सवाब है। अल्लाह फ़रमाता है: "अगर तुम जानते हो" यानी अगर तुम्हें इसकी हक़ीक़त का इल्म हो कि इस काम में तुम्हारी भलाई है, तो तुम ज़रूर ऐसा करो। जिसे यह बात समझ आ गई और उसने अमल नहीं किया, वह उस शख्स की तरह है जो जानता ही नहीं।


दावती पहलू (इंसानियत और ईमान की तरबियत):

इस आयत में अल्लाह तआला हमें सिखाता है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि इंसानियत, हमदर्दी और रहम का दीन है। कर्ज़दार जब मुश्किल में हो तो उसे वक़्त देना और उस पर आसानी करना अल्लाह को बहुत पसंद है। याद रखो! जो बंदा दुनिया में किसी मुसीबतज़दा पर रहम करता है, अल्लाह उस पर क़यामत के दिन रहम फ़रमाता है। अगर तुम कर्ज़ माफ़ कर दो तो अल्लाह तुम्हारे गुनाह माफ़ करेगा और तुम्हें ऐसा इनाम देगा जिसका अंदाज़ा नहीं। यही असली कामयाबी है—दुनिया में दिल की सफ़ाई और आख़िरत में जन्नत की दौलत। अल्लाह हम सबको इस हुस्ने-अख़लाक़ पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 278-282 — अल-बकरा

278يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَذَرُواْ مَا بَقِيَ مِنَ ٱلرِّبَوٰٓاْ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ 
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरो और जो सूद लोगों के ज़िम्मे बाक़ी रह गया है अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो छोड़ दो
279فَإِن لَّمۡ تَفۡعَلُواْ فَأۡذَنُواْ بِحَرۡبٍ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۖ وَإِن تُبۡتُمۡ فَلَكُمۡ رُءُوسُ أَمۡوَٰلِكُمۡ لَا تَظۡلِمُونَ وَلَا تُظۡلَمُونَ 
और अगर तुमने ऐसा न किया तो ख़ुदा और उसके रसूल से लड़ने के लिये तैयार रहो और अगर तुमने तौबा की है तो तुम्हारे लिए तुम्हारा असल माल है न तुम किसी का ज़बरदस्ती नुकसान करो न तुम पर ज़बरदस्ती की जाएगी
280وَإِن كَانَ ذُو عُسۡرَةٍ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيۡسَرَةٍۚ وَأَن تَصَدَّقُواْ خَيۡرٌ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ 
और अगर कोई तंगदस्त तुम्हारा (क़र्ज़दार हो) तो उसे ख़ुशहाली तक मोहल्लत (दो) और सदक़ा करो और अगर तुम समझो तो तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है कि असल भी बख्श दो
281وَٱتَّقُواْ يَوۡمًا تُرۡجَعُونَ فِيهِ إِلَى ٱللَّهِۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفۡسٍ مَّا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ 
और उस दिन से डरो जिस दिन तुम सब के सब ख़ुदा की तरफ़ लौटाये जाओगे फिर जो कुछ जिस शख्स ने किया है उसका पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी ज़रा भी हक़ तलफ़ी न होगी
282يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيۡنٍ إِلَىٰٓ أَجَلٍ مُّسَمًّى فَٱكۡتُبُوهُۚ وَلۡيَكۡتُب بَّيۡنَكُمۡ كَاتِبُۢ بِٱلۡعَدۡلِۚ وَلَا يَأۡبَ كَاتِبٌ أَن يَكۡتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ ٱللَّهُۚ فَلۡيَكۡتُبۡ وَلۡيُمۡلِلِ ٱلَّذِي عَلَيۡهِ ٱلۡحَقُّ وَلۡيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ وَلَا يَبۡخَسۡ مِنۡهُ شَيۡـًٔاۚ فَإِن كَانَ ٱلَّذِي عَلَيۡهِ ٱلۡحَقُّ سَفِيهًا أَوۡ ضَعِيفًا أَوۡ لَا يَسۡتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلۡيُمۡلِلۡ وَلِيُّهُۥ بِٱلۡعَدۡلِۚ وَٱسۡتَشۡهِدُواْ شَهِيدَيۡنِ مِن رِّجَالِكُمۡۖ فَإِن لَّمۡ يَكُونَا رَجُلَيۡنِ فَرَجُلٌ وَٱمۡرَأَتَانِ مِمَّن تَرۡضَوۡنَ مِنَ ٱلشُّهَدَآءِ أَن تَضِلَّ إِحۡدَىٰهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحۡدَىٰهُمَا ٱلۡأُخۡرَىٰۚ وَلَا يَأۡبَ ٱلشُّهَدَآءُ إِذَا مَا دُعُواْۚ وَلَا تَسۡـَٔمُوٓاْ أَن تَكۡتُبُوهُ صَغِيرًا أَوۡ كَبِيرًا إِلَىٰٓ أَجَلِهِۦۚ ذَٰلِكُمۡ أَقۡسَطُ عِندَ ٱللَّهِ وَأَقۡوَمُ لِلشَّهَٰدَةِ وَأَدۡنَىٰٓ أَلَّا تَرۡتَابُوٓاْ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَٰرَةً حَاضِرَةً تُدِيرُونَهَا بَيۡنَكُمۡ فَلَيۡسَ عَلَيۡكُمۡ جُنَاحٌ أَلَّا تَكۡتُبُوهَاۗ وَأَشۡهِدُوٓاْ إِذَا تَبَايَعۡتُمۡۚ وَلَا يُضَآرَّ كَاتِبٌ وَلَا شَهِيدٌۚ وَإِن تَفۡعَلُواْ فَإِنَّهُۥ فُسُوقُۢ بِكُمۡۗ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۖ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱللَّهُۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٌ 
ऐ ईमानदारों जब एक मियादे मुक़र्ररा तक के लिए आपस में क़र्ज क़ा लेन देन करो तो उसे लिखा पढ़ी कर लिया करो और लिखने वाले को चाहिये कि तुम्हारे दरमियान तुम्हारे क़ौल व क़रार को, इन्साफ़ से ठीक ठीक लिखे और लिखने वाले को लिखने से इन्कार न करना चाहिये (बल्कि) जिस तरह ख़ुदा ने उसे (लिखना पढ़ना) सिखाया है उसी तरह उसको भी वे उज़्र (बहाना) लिख देना चाहिये और जिसके ज़िम्मे क़र्ज़ आयद होता है उसी को चाहिए कि (तमस्सुक) की इबारत बताता जाये और ख़ुदा से डरे जो उसका सच्चा पालने वाला है डरता रहे और (बताने में) और क़र्ज़ देने वाले के हुक़ूक़ में कुछ कमी न करे अगर क़र्ज़ लेने वाला कम अक्ल या माज़ूर या ख़ुद (तमस्सुक) का मतलब लिखवा न सकता हो तो उसका सरपरस्त ठीक ठीक इन्साफ़ से लिखवा दे और अपने लोगों में से जिन लोगों को तुम गवाही लेने के लिये पसन्द करो (कम से कम) दो मर्दों की गवाही कर लिया करो फिर अगर दो मर्द न हो तो (कम से कम) एक मर्द और दो औरतें (क्योंकि) उन दोनों में से अगर एक भूल जाएगी तो एक दूसरी को याद दिला देगी, और जब गवाह हुक्काम के सामने (गवाही के लिए) बुलाया जाएं तो हाज़िर होने से इन्कार न करे और क़र्ज़ का मामला ख्वाह छोटा हो या उसकी मियाद मुअय्युन तक की (दस्तावेज़) लिखवाने में काहिली न करो, ख़ुदा के नज़दीक ये लिखा पढ़ी बहुत ही मुन्सिफ़ाना कारवाई है और गवाही के लिए भी बहुत मज़बूती है और बहुत क़रीन (क़यास) है कि तुम आईन्दा किसी तरह के शक व शुबहा में न पड़ो मगर जब नक़द सौदा हो जो तुम लोग आपस में उलट फेर किया करते हो तो उसकी (दस्तावेज) के न लिखने में तुम पर कुछ इल्ज़ाम नहीं है (हॉ) और जब उसी तरह की ख़रीद (फ़रोख्त) हो तो गवाह कर लिया करो और क़ातिब (दस्तावेज़) और गवाह को ज़रर न पहुँचाया जाए और अगर तुम ऐसा कर बैठे तो ये ज़रूर तुम्हारी शरारत है और ख़ुदा से डरो ख़ुदा तुमको मामले की सफ़ाई सिखाता है और वह हर चीज़ को ख़ूब जानता है
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीRevelation
280आयत

अनुवाद — अल-बकरा 280

सूरा आयत 280/286 — अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-बकरा सुनें, अल-बकरा अनुवाद, अल-बकरा mp3, अल-बकरा pdf. आयत 278–282. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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