जो यतीमों के माल नाहक़ चट कर जाया करते हैं वह अपने पेट में बस अंगारे भरते हैं और अनक़रीब जहन्नुम वासिल होंगे
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
يَأْكُلُونَ: खाते हैं (यहाँ अर्थ है—हड़पना, अनुचित रूप से उपभोग करना)
الْيَتَامَى: अनाथ (वे बच्चे जिनके पिता का देहांत हो चुका हो)
ظُلْمًا: अत्याचार के साथ, बिना किसी हक़ के
فِي بُطُونِهِمْ: अपने पेटों में
سَعِيرًا: भड़कती हुई आग (नरक की आग)
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के बारे में है जो अनाथों की संपत्ति पर अत्याचार करते हैं—चाहे वे संरक्षक (वली) हों या कोई और—जो अनाथ बच्चों के माल को बिना किसी वैध अधिकार के खाते हैं, उनके हिस्से को हड़पते हैं, या उसमें ग़बन करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये लोग वास्तव में अपने पेट में आग भर रहे हैं। यानी जो माल वे अनाथों का खाते हैं, वह उनके लिए नरक की आग बन जाएगा जो क़ियामत के दिन उनके पेटों में भड़केगी। यह एक सख़्त तनबीह (चेतावनी) है कि अनाथों का माल खाना सीधे जहन्नम की आग तक ले जाने वाला काम है। आयत के अंत में फ़रमाया गया कि वे अनिवार्य रूप से भड़कती हुई आग (सईर) में झुलसेंगे और उसकी तपिश को महसूस करेंगे। यह उनके लिए एक दर्दनाक अंजाम है।
फ़ायदे (सबक़):
इस आयत से मालूम होता है कि अनाथों की देखभाल और उनके माल की हिफ़ाज़त इस्लाम में कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है। जो लोग इस ज़िम्मेदारी में ख़ियानत करते हैं, उनके लिए अल्लाह ने सख़्त से सख़्त सज़ा का एलान किया है।
यह आयत मुसलमानों को नेकी, ईमानदारी और अमानतदारी की तरफ़ राहनुमाई करती है—कि कमज़ोर और बेसहारा लोगों (जैसे अनाथ) के हक़ों का ख़याल रखना ईमान का हिस्सा है।
इससे यह भी सबक़ मिलता है कि दुनिया में चाहे जो भी कमाया जाए, उसका अंजाम आख़िरत में सामने आएगा। हर नाजायज़ कमाई और हर ज़ुल्म का हिसाब अल्लाह के यहाँ ज़रूर होगा।
यह आयत मुसलमानों को तरग़ीब देती है कि वे अनाथों की परवरिश करें, उनके माल को उनके हवाले करें और उनके साथ इंसाफ़ से पेश आएँ—यही अल्लाह को पसंदीदा अमल है और इसी में दुनिया और आख़िरत की भलाई है।
और जब (तर्क की) तक़सीम के वक्त (वह) क़राबतदार (जिनका कोई हिस्सा नहीं) और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह (उनवाने शाइस्ता से) बात करो
और उन लोगों को डरना (और ख्याल करना चाहिये) कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद (नन्हे नन्हे) नातवॉ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर (किस क़दर) तरस आता पस उनको (ग़रीब बच्चों पर सख्ती करने में) ख़ुदा से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए
(मुसलमानों) ख़ुदा तुम्हारी औलाद के हक़ में तुमसे वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है और अगर (मय्यत की) औलाद में सिर्फ लड़कियॉ ही हों (दो) या (दो) से ज्यादा तो उनका (मक़र्रर हिस्सा) कुल तर्के का दो तिहाई है और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा है और मय्यत के बाप मॉ हर एक का अगर मय्यत की कोई औलाद मौजूद न हो तो माल मुस्तरद का में से मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) छटा हिस्सा है और अगर मय्यत के कोई औलाद न हो और उसके सिर्फ मॉ बाप ही वारिस हों तो मॉ का मुअय्यन (ख़ास चीज़ों में) एक तिहाई हिस्सा तय है और बाक़ी बाप का लेकिन अगर मय्यत के (हक़ीक़ी और सौतेले) भाई भी मौजूद हों तो (अगरचे उन्हें कुछ न मिले) उस वक्त मॉ का हिस्सा छठा ही होगा (और वह भी) मय्यत नें जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तालीम और (अदाए) क़र्ज़ के बाद तुम्हारे बाप हों या बेटे तुम तो यह नहीं जानते हों कि उसमें कौन तुम्हारी नाफ़रमानी में ज्यादा क़रीब है (फिर तुम क्या दख़ल दे सकते हो) हिस्सा तो सिर्फ ख़ुदा की तरफ़ से मुअय्यन होता है क्योंकि ख़ुदा तो ज़रूर हर चीज़ को जानता और तदबीर वाला है
और जो कुछ तुम्हारी बीवियां छोड़ कर (मर) जाए पस अगर उनके कोई औलाद न हो तो तुम्हारा आधा है और अगर उनके कोई औलाद हो तो जो कुछ वह तरका छोड़े उसमें से बाज़ चीज़ों में चौथाई तुम्हारा है (और वह भी) औरत ने जिसकी वसीयत की हो और (अदाए) क़र्ज़ के बाद अगर तुम्हारे कोई औलाद न हो तो तुम्हारे तरके में से तुम्हारी बीवियों का बाज़ चीज़ों में चौथाई है और अगर तुम्हारी कोई औलाद हो तो तुम्हारे तर्के में से उनका ख़ास चीज़ों में आठवॉ हिस्सा है (और वह भी) तुमने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और (अदाए) क़र्ज़ के बाद और अगर कोई मर्द या औरत अपनी मादरजिलों (ख्याली) भाई या बहन को वारिस छोड़े तो उनमें से हर एक का ख़ास चीजों में छठा हिस्सा है और अगर उससे ज्यादा हो तो सबके सब एक ख़ास तिहाई में शरीक़ रहेंगे और (ये सब) मय्यत ने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और (अदाए) क़र्ज क़े बाद मगर हॉ वह वसीयत (वारिसों को ख्वाह मख्वाह) नुक्सान पहुंचाने वाली न हो (तब) ये वसीयत ख़ुदा की तरफ़ से है और ख़ुदा तो हर चीज़ का जानने वाला और बुर्दबार है
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