Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- वल्यख्शा: डरें
- ज़ुर्रियतन दिआफ़ा: कमज़ोर (नन्हीं) संतान
- ख़ाफू अलैहिम: उनके बारे में डर महसूस करें
- फल्यत्तक़ुल्लाह: अल्लाह से डरें (तक़वा अपनाएँ)
- क़ौलन सदीदा: सीधी, सच्ची और न्यायपूर्ण बात
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों को सम्बोधित करती है जो अनाथों, कमज़ोरों और उन बच्चों के मामलों की देखभाल करते हैं जिनके सरपरस्त नहीं हैं। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि जिन लोगों के पास यतीमों की ज़िम्मेदारी है, उन्हें उस दिन का ख़्याल करना चाहिए जब वे ख़ुद इस दुनिया से रुख़्सत करेंगे और अपने पीछे अपनी नन्हीं, कमज़ोर संतान छोड़ जाएँगे। क्या वे नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चों के साथ कोई अच्छा व्यवहार करे? क्या उन्हें डर नहीं लगेगा कि उनके बच्चे अनाथ होकर ज़ुल्म और बर्बादी का शिकार हो जाएँगे?
यही एहसास उन्हें दूसरे यतीमों के साथ भी करना चाहिए। जिस तरह वे चाहते हैं कि उनके बाद उनकी औलाद के साथ भलाई की जाए, उसी तरह उन्हें भी दूसरे यतीमों और कमज़ोर बच्चों के साथ भलाई करनी चाहिए। यह आयत उन लोगों को भी नसीहत करती है जो किसी मरने वाले व्यक्ति के पास मौजूद हों और वसीयत (विल) के समय उसे सलाह दें। उन्हें चाहिए कि वह व्यक्ति को न्यायपूर्ण सलाह दें — यानी वह अपनी जायदाद का एक हिस्सा ज़रूरतमंदों को दे, लेकिन अपने वारिसों को भी महरूम न करे, और न ही किसी को नुक़सान पहुँचाने की वसीयत करे।
इस आयत में अल्लाह तआला ने तीन अहम बातें सिखाई हैं: पहली — यतीमों और कमज़ोरों के साथ न्याय और दया का व्यवहार करना; दूसरी — अल्लाह से डरना और उसकी निगरानी का एहसास रखना; तीसरी — हमेशा सीधी और सच्ची बात कहना, ख़ासकर जब किसी की वसीयत या हक़ की बात हो। जो व्यक्ति इन बातों पर अमल करेगा, वह दुनिया में भी इज़्ज़त पाएगा और आख़िरत में भी कामयाब होगा।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम कितना प्यारा और इंसानियत से भरा दीन है। अल्लाह तआला हमें उसी भलाई की तरफ़ बुलाता है जो हम अपने लिए पसंद करते हैं। जो व्यक्ति यतीमों की परवरिश करता है, वह रसूलुल्लाह ﷺ के साथ जन्नत में होगा। इसलिए हमें चाहिए कि हम अनाथों और कमज़ोरों के साथ नर्मी और मुहब्बत से पेश आएँ, उनके हक़ों की रक्षा करें, और हमेशा सच और न्याय की बात करें। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की रहमत और उसकी मग़फ़िरत तक पहुँचाता है।
📜 आयत 7-11 — सूरा अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 9
सूरा अन-निसा आयत 9 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और उन लोगों को डरना (और ख्याल करना चाहिये) कि…सूरा आयत 9/176 — सूरा अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-निसा सुनें, सूरा अन-निसा अनुवाद, सूरा अन-निसा mp3, सूरा अन-निसा pdf. आयत 7–11. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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