अत-तौबा · 101/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ الْأَعْرَابِ مُنَافِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ الْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا عَلَى النِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍ ۝١٠١
Wa mimmann hawlakum minal A`raabi munaafiqoona wa min ahlil Madeenati maradoo `alan nifaaq, laa ta`lamuhum nahnu na`lamuhum; sanu`azzibuhum marrataini summa yuraddoona ilaa `azaabin `azeem
📖 हिंदी अर्थ
और (मुसलमानों) तुम्हारे एतराफ़ (आस पास) के गॅवार देहातियों में से बाज़ मुनाफिक़ (भी) हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी (बाज़ मुनाफिक़ हैं) जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं (ऐ रसूल) तुम उन को नहीं जानते (मगर) हम उनको (ख़ूब) जानते हैं अनक़रीब हम (दुनिया में) उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग (क़यामत में) एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाऎंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الأَعْرَابِ: बद्दू (ग्रामीण अरब), जो शहरों में नहीं बल्कि जंगलों और मरुस्थलों में रहते हैं।
  • مَرَدُوا عَلَى النِّفَاقِ: निफ़ाक़ (दोहरेपन) पर जम गए, उसमें माहिर हो गए और उसी पर डटे रहे।
  • لَا تَعْلَمُهُمْ: आप (ऐ नबी) उन्हें नहीं जानते।
  • سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ: हम उन्हें दो बार अज़ाब देंगे।

तफ़सीर:

ऐ ईमानवालों! तुम्हारे आस-पास (मदीना के इर्द-गिर्द) रहने वाले कुछ बद्दू (ग्रामीण) भी मुनाफ़िक़ (दो-मुँहे) हैं, और मदीना शहर के कुछ निवासी भी ऐसे हैं जो निफ़ाक़ पर जम गए हैं और उसमें इतने पक्के हो गए हैं कि उनका दोहरापन छिपा हुआ है। ऐ नबी! आप उन्हें नहीं पहचान सकते, लेकिन हम (अल्लाह) उन्हें पूरी तरह जानते हैं। हम उन्हें दो बार अज़ाब देंगे: पहली बार दुनिया में — उनके दोहरेपन का भंडाफोड़ करके, उन्हें क़त्ल, क़ैद और रुसवाई के ज़रिए सज़ा देंगे; दूसरी बार क़ब्र के अज़ाब के रूप में। फिर क़ियामत के दिन उन्हें बड़े भारी अज़ाब (जहन्नुम की आग) की ओर लौटाया जाएगा, जो सबसे सख्त और हमेशा रहने वाला अज़ाब है।


फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह का इल्म हर चीज़ पर हावी है — इंसान चाहे कितना भी अपने दिल की बात छिपाए, अल्लाह उसे खूब जानता है। इससे हमें सीख मिलती है कि अपने दिल और इरादों को साफ़ रखें, क्योंकि अल्लाह से कुछ छिपा नहीं है।
  2. मुनाफ़िक़ी (दोहरेपन) सबसे बुरी आदत है — यह वह बीमारी है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में रुसवा कर देती है। इसलिए हमें हमेशा सच्चाई और सीधेपन पर चलना चाहिए।
  3. अल्लाह की सज़ा अटल है — मुनाफ़िक़ों को दुनिया में भी सज़ा मिलती है और आख़िरत में भी। यह हमें डराता है कि हम कभी भी अल्लाह की नाफ़रमानी में पड़कर अपने आपको धोखे में न डालें।
  4. नबी की मुहब्बत और अदब — इस आयत में अल्लाह ने अपने नबी को संबोधित करते हुए फ़रमाया कि "आप नहीं जानते, हम जानते हैं", यह हमें सिखाता है कि नबी की शान में अदब रखें और उनके फ़ैसलों पर भरोसा करें, क्योंकि वे अल्लाह के हुक्म से ही चलते हैं।
  5. तौबा की अहमियत — जब हमें पता चलता है कि अल्लाह हर बात जानता है, तो हमें चाहिए कि गुनाह करने के तुरंत बाद तौबा करें, ताकि हम उन लोगों में से न हों जो निफ़ाक़ पर जम गए और अज़ाब के हक़दार बन गए।


📜 आयत 99-103 — सूरा अत-तौबा

99وَمِنَ الْأَعْرَابِ مَن يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ قُرُبَاتٍ عِندَ اللَّهِ وَصَلَوَاتِ الرَّسُولِ ۚ أَلَا إِنَّهَا قُرْبَةٌ لَّهُمْ ۚ سَيُدْخِلُهُمُ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और कुछ देहाती तो ऐसे भी हैं जो ख़ुदा और आख़िरत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे ख़ुदा की (बारगाह में) नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये (ख़ैरात) ज़रूर उनके तक़र्रुब (क़रीब होने का) का बाइस है ख़ुदा उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाख़िल करेगा बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
100وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُم بِإِحْسَانٍ رَّضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي تَحْتَهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
और मुहाजिरीन व अन्सार में से (ईमान की तरफ) सबक़त (पहल) करने वाले और वह लोग जिन्होंने नेक नीयती से (कुबूले ईमान में उनका साथ दिया ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़ुदा से ख़ुश और उनके वास्ते ख़ुदा ने (वह हरे भरे) बाग़ जिन के नीचे नहरें जारी हैं तैयार कर रखे हैं वह हमेशा अब्दआलाबाद (हमेशा) तक उनमें रहेगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
101وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ الْأَعْرَابِ مُنَافِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ الْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا عَلَى النِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍ
और (मुसलमानों) तुम्हारे एतराफ़ (आस पास) के गॅवार देहातियों में से बाज़ मुनाफिक़ (भी) हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी (बाज़ मुनाफिक़ हैं) जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं (ऐ रसूल) तुम उन को नहीं जानते (मगर) हम उनको (ख़ूब) जानते हैं अनक़रीब हम (दुनिया में) उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग (क़यामत में) एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाऎंगे
102وَآخَرُونَ اعْتَرَفُوا بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَآخَرَ سَيِّئًا عَسَى اللَّهُ أَن يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाहों का (तो) एकरार किया (मगर) उन लोगों ने भले काम को और कुछ बुरे काम को मिला जुला (कर गोलमाल) कर दिया क़रीब है कि ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे (क्योंकि) ख़ुदा तो यक़ीनी बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान हैं
103خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ ۖ إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَّهُمْ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
(ऐ रसूल) तुम उनके माल की ज़कात लो (और) इसकी बदौलत उनको (गुनाहो से) पाक साफ करों और उनके वास्ते दुआएं ख़ैर करो क्योंकि तुम्हारी दुआ इन लोगों के हक़ में इत्मेनान (का बाइस है) और ख़ुदा तो (सब कुछ) सुनता (और) जानता है
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
101आयत

अनुवाद — अत-तौबा 101

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Monday, September 28, 2026

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