अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- हरज – कोई पाप, दोष या रुकावट।
- अ'मा – अंधा व्यक्ति।
- अ'रज – लंगड़ा व्यक्ति।
- मरीज़ – बीमार व्यक्ति।
- जुनाह – गुनाह, पाप।
- अश्तात – अलग-अलग, अकेले-अकेले।
- तहिय्यत – दुआ और सलाम।
- मुबारक – जिसमें भलाई और बरकत हो।
- तय्यिबा – पवित्र और अच्छी।
तफसीर:
यह आयत मुसलमानों के लिए बड़ी रहमत और आसानी लेकर आई है। अल्लाह तआला फरमाता है कि अंधे, लंगड़े और बीमार लोगों पर कोई गुनाह नहीं है अगर वे उन कामों में हिस्सा न ले सकें जिनके लिए तंदुरुस्ती और सलामती ज़रूरी है, जैसे जिहाद या दूसरे मुश्किल काम। इससे पहले कुछ लोग सोचते थे कि अंधे, लंगड़े या बीमार लोगों के साथ खाना खाना या उनके साथ बैठना ठीक नहीं, क्योंकि उनसे कोई कमी या बुराई पेश आ सकती है। अल्लाह ने इस गलतफहमी को दूर कर दिया और साफ कर दिया कि उन पर कोई हरज नहीं।
फिर अल्लाह तआला मुसलमानों को खाने के संबंध में आसानी देता है कि तुम अपने घरों से खा सकते हो, यानी अपने बच्चों के घरों से भी, क्योंकि बच्चे का घर भी माँ-बाप का ही होता है। इसी तरह अपने वालिद, वालिदा, भाइयों, बहनों, चाचाओं, फूफियों, मामाओं और खालाओं के घरों से खाना खाने में कोई गुनाह नहीं। यहाँ तक कि उन घरों से भी खा सकते हैं जिनकी चाबियाँ तुम्हें सौंपी गई हों, यानी जिन घरों की देखभाल तुम पर हो, और अपने सच्चे दोस्त के घर से भी खा सकते हो, क्योंकि दोस्त की मुहब्बत और चाहत यही होती है कि उसका भाई उसके घर से खाए।
अल्लाह तआला ने यह भी बताया कि चाहे तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग, दोनों तरह से जायज़ है। इससे पहले कुछ लोगों को इस बात में भी तकलीफ होती थी कि अकेले खाना खाएँ या साथ मिलकर, तो अल्लाह ने दोनों को जायज़ कर दिया।
फिर अल्लाह तआला एक प्यारी सी बात सिखाता है कि जब तुम किसी घर में दाखिल हो तो अपने भाइयों को सलाम करो। अगर घर में कोई न हो तो अपने आप को सलाम करो, यानी कहो: "अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस सालिहीन" (हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर सलाम हो)। यह सलाम अल्लाह की तरफ से सिखाई हुई एक बहुत ही अच्छी और बरकत वाली दुआ है, जो आपसी मुहब्बत और भाईचारे को बढ़ाती है।
आखिर में अल्लाह तआला फरमाता है कि वह इसी तरह अपनी आयतों को साफ-साफ बयान करता है ताकि तुम समझो और उन पर अमल करो।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम कितना आसान और प्यारा दीन है। अल्लाह तआला अपने बंदों पर रहम करने वाला है और उनकी मुश्किलें आसान करता है। हमें चाहिए कि हम अपने मुसलमान भाइयों के साथ मुहब्बत और भाईचारे से पेश आएँ, किसी को उसकी कमजोरी या बीमारी की वजह से नीचा न समझें, बल्कि उसकी मदद करें। सलाम को आम करें, क्योंकि सलाम में बड़ी बरकत है और यह दिलों के बीच मुहब्बत पैदा करता है। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह हर मामले में आसानी और भलाई चाहता है।
📜 आयत 59-63 — अन-नूर
अनुवाद — अन-नूर 61
सूरा अन-नूर आयत 61 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इस बात में न तो अंधे आदमी के लिए मज़ाएक़ा…सूरा आयत 61/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 59–63. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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