अन-नूर · 60/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَالْقَوَاعِدُ مِنَ النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَاتٍ بِزِينَةٍ ۖ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَّهُنَّ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ۝٦٠
Walqawaa`idu minan nisaaa`il laatee laa yarjoona nikaahan falisa `alaihinna junaahun ai yada`na siyaabahunna ghaira mutabar rijaatim bizeenah; wa ai yasta`fifna khairul lahunn; wallaahu Samee`un `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो (बुढ़ापे की वजह से) निकाह की ख्वाहिश नही रखती वह अगर अपने कपड़े (दुपट्टे वगैराह) उतारकर (सर नंगा) कर डालें तो उसमें उन पर कुछ गुनाह नही है- बशर्ते कि उनको अपना बनाव सिंगार दिखाना मंज़ूर न हो और (इस से भी) बचें तो उनके लिए और बेहतर है और ख़ुदा तो (सबकी सब कुछ) सुनता और जानता है

🎧 सुनें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْقَوَاعِدُ (अल-क़वा'इद): वे औरतें जो बुढ़ापे की वजह से हृदय और गर्भाशय के कार्यों से रुक चुकी हैं।
  • لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا (ला यरजूना निकाहन): जिन्हें विवाह की कोई उम्मीद या इच्छा नहीं रहती।
  • ثِيَابَهُنَّ (सियाबहुन्ना): ऊपरी कपड़े जैसे चादर, दुपट्टा या घूंघट जो सामान्य पोशाक के ऊपर पहना जाता है।
  • غَيْرَ مُتَبَرِّجَاتٍ بِزِينَةٍ (गैर मुतबर्रिजातिन बिज़ीनतिन): अपनी छिपी हुई सजावट या शारीरिक सुंदरता को प्रकट न करती हुईं।
  • يَسْتَعْفِفْنَ (यस्त'फ़िफ़्न): पवित्रता और संयम बनाए रखें, यानी कपड़े न उतारें।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन बुज़ुर्ग औरतों के बारे में है जो उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुकी हैं जहाँ उन्हें न तो विवाह की चाह रहती है और न ही पुरुषों की ओर से उनके प्रति कोई आकर्षण होता है। ऐसी औरतों के लिए राहत दी गई है कि वे अपने ऊपरी कपड़े (जैसे चादर या बड़ा दुपट्टा) उतार सकती हैं, बशर्ते वे अपनी सजावट या छिपी हुई सुंदरता को प्रकट न करें। यह छूट केवल उन्हीं औरतों के लिए है, और उन्हें भी यह ध्यान रखना है कि वे अपनी आंतरिक पोशाक (जैसे क़मीज़ या सिर का कपड़ा) न उतारें।

हालाँकि, अल्लाह तआला इसी आयत में यह भी फ़रमाता है कि अगर ये औरतें अपने ऊपरी कपड़े भी न उतारें और पूरी सतर्कता व संयम बनाए रखें, तो यह उनके लिए बेहतर और अधिक पवित्रता वाला काम है। इसका कारण यह है कि इससे उनकी इज़्ज़त और भी बढ़ती है, और किसी भी तरह की गलतफ़हमी या बुरी नज़र से बचाव होता है।

अल्लाह तआला सब कुछ सुनता और जानता है। वह जानता है कि औरतें किस नियत से कपड़े उतारती हैं या पहनती हैं, और वह उनके दिलों के इरादों से भी पूरी तरह वाक़िफ़ है। यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में हर उम्र और हर हालत के लिए आसानी और राहत दी गई है, लेकिन साथ ही पवित्रता और शालीनता को हमेशा प्राथमिकता दी गई है।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत इस्लाम की उस खूबसूरत तालीम को दिखाती है जो हर उम्र और हर हालत का ख़याल रखती है। अल्लाह तआला ने बुज़ुर्ग औरतों पर बोझ नहीं डाला, बल्कि उन्हें राहत दी, लेकिन साथ ही उन्हें सबसे अच्छा रास्ता भी बताया — वह है संयम और पवित्रता। यह हमें सिखाता है कि इस्लाम में जहाँ आसानी है, वहीं बेहतरी की तरफ़ भी रहनुमाई की गई है। अल्लाह हमारी हर नीयत और हर अमल से वाक़िफ़ है, और वह हमें उसी के अनुसार अज्र देगा। हमें चाहिए कि हम अल्लाह की बताई हुई हदों का पालन करें, क्योंकि इसमें ही हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है।



📜 आयत 58-62 — अन-नूर

58يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِيَسْتَأْذِنكُمُ الَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ وَالَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَاةِ الْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ الظَّهِيرَةِ وَمِن بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ ۚ ثَلَاثُ عَوْرَاتٍ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّافُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि (दिन रात में) तीन मरतबा (तुम्हारे पास आने की) तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ (एक) नमाज़ सुबह से पहले और (दूसरे) जब तुम (गर्मी से) दोपहर को (सोने के लिए मामूलन) कपड़े उतार दिया करते हो (तीसरी) नमाजे इशा के बाद (ये) तीन (वक्त) तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा (बे अज़न आने मे) न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर (क्योंकि) उन अवक़ात के अलावा (ब ज़रुरत या बे ज़रुरत) लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ ख़ुदा (अपने) एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
59وَإِذَا بَلَغَ الْأَطْفَالُ مِنكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَأْذِنُوا كَمَا اسْتَأْذَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और (ऐ ईमानदारों) जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल (बड़ी उम्र) वाले (घर में आने की) इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ ख़ुदा अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफकार हकीम है
60وَالْقَوَاعِدُ مِنَ النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَاتٍ بِزِينَةٍ ۖ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَّهُنَّ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो (बुढ़ापे की वजह से) निकाह की ख्वाहिश नही रखती वह अगर अपने कपड़े (दुपट्टे वगैराह) उतारकर (सर नंगा) कर डालें तो उसमें उन पर कुछ गुनाह नही है- बशर्ते कि उनको अपना बनाव सिंगार दिखाना मंज़ूर न हो और (इस से भी) बचें तो उनके लिए और बेहतर है और ख़ुदा तो (सबकी सब कुछ) सुनता और जानता है
61لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ وَلَا عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَن تَأْكُلُوا مِن بُيُوتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ آبَائِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أُمَّهَاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ إِخْوَانِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخَوَاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَعْمَامِكُمْ أَوْ بُيُوتِ عَمَّاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخْوَالِكُمْ أَوْ بُيُوتِ خَالَاتِكُمْ أَوْ مَا مَلَكْتُم مَّفَاتِحَهُ أَوْ صَدِيقِكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَأْكُلُوا جَمِيعًا أَوْ أَشْتَاتًا ۚ فَإِذَا دَخَلْتُم بُيُوتًا فَسَلِّمُوا عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ تَحِيَّةً مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُبَارَكَةً طَيِّبَةً ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
इस बात में न तो अंधे आदमी के लिए मज़ाएक़ा है और न लँगड़ें आदमी पर कुछ इल्ज़ाम है- और न बीमार पर कोई गुनाह है और न ख़ुद तुम लोगो पर कि अपने घरों से खाना खाओ या अपने बाप दादा नाना बग़ैरह के घरों से या अपनी माँ दादी नानी वगैरह के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चचाओं के घरों से या अपनी फूफ़ियों के घरों से या अपने मामूओं के घरों से या अपनी खालाओं के घरों से या उस घर से जिसकी कुन्जियाँ तुम्हारे हाथ में है या अपने दोस्तों (के घरों) से इस में भी तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कि सब के सब मिलकर खाओ या अलग अलग फिर जब तुम घर वालों में जाने लगो (और वहाँ किसी का न पाओ) तो ख़ुद अपने ही ऊपर सलाम कर लिया करो जो ख़ुदा की तरफ से एक मुबारक पाक व पाकीज़ा तोहफा है- ख़ुदा यूँ (अपने) एहकाम तुमसे साफ साफ बयान करता है ताकि तुम समझो
62إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَإِذَا كَانُوا مَعَهُ عَلَىٰ أَمْرٍ جَامِعٍ لَّمْ يَذْهَبُوا حَتَّىٰ يَسْتَأْذِنُوهُ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَأْذِنُونَكَ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ فَإِذَا اسْتَأْذَنُوكَ لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَن لِّمَن شِئْتَ مِنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمُ اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
सच्चे ईमानदार तो सिर्फ वह लोग हैं जो ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाए और जब किसी ऐसे काम के लिए जिसमें लोंगों के जमा होने की ज़रुरत है- रसूल के पास होते हैं जब तक उससे इजाज़त न ले ली न गए (ऐ रसूल) जो लोग तुम से (हर बात में) इजाज़त ले लेते हैं वे ही लोग (दिल से) ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाए हैं तो जब ये लोग अपने किसी काम के लिए तुम से इजाज़त माँगें तो तुम उनमें से जिसको (मुनासिब ख्याल करके) चाहो इजाज़त दे दिया करो और खुदा उसे उसकी बख़्शिस की दुआ भी करो बेशक खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीRevelation
60आयत

अनुवाद — अन-नूर 60

सूरा अन-नूर आयत 60 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो (बुढ़ापे की वजह से) निकाह…

सूरा आयत 60/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 58–62. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए