अल-अहज़ाब · 52/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
لَّا يَحِلُّ لَكَ النِّسَاءُ مِن بَعْدُ وَلَا أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَاجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ رَّقِيبًا ۝٥٢
Laa yahillu lakan nisaaa`u mim ba`du wa laaa an tabaddala bihinna min azwaajinw wa law ajabaka husnuhunna illaa maa malakat yameenukk; wa kaanal laahu `alaa kulli shai`ir Raqeeba
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) अब उन (नौ) के बाद (और) औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला (क्यों न) मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ (इस के बाद भी जायज़ हैं) और खुदा तो हर चीज़ का निगरॉ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَحِلُّ لَكَ – आपके लिए जायज़ नहीं है।
  • مِن بَعْدُ – इसके बाद।
  • تَبَدَّلَ بِهِنَّ – उन्हें बदलना (यानी किसी को तलाक़ देकर उसके स्थान पर दूसरी पत्नी लाना)।
  • أَزْوَاجٍ – पत्नियाँ।
  • أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ – उनका सौंदर्य आपको भा जाए।
  • مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ – जो लौंडियाँ (दासियाँ) आपकी मिल्कियत में हों।
  • رَّقِيبًا – निगरानी रखने वाला, हर चीज़ पर नज़र रखने वाला।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को ख़िताब करते हुए फ़रमाता है कि ऐ नबी! उन पत्नियों के बाद जो इस वक़्त आपकी निकाह में हैं (और जिन्हें अल्लाह ने आपके लिए हलाल किया है), आपके लिए और कोई नई महिला निकाह में लाना जायज़ नहीं है। साथ ही यह भी जायज़ नहीं कि आप अपनी इन पत्नियों में से किसी को तलाक़ देकर उसके बदले दूसरी औरत ले आएँ, चाहे वह औरत कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो। यह आपकी पत्नियों के लिए एक बड़ा सम्मान और इज़्ज़त है कि उन्हें यह मर्तबा दिया गया कि उनके बाद नबी ﷺ के लिए किसी और से शादी हराम कर दी गई।

हाँ, अल्लाह ने आपके लिए उन दासियों को हलाल रखा है जो आपकी मिल्कियत में हों, उनमें कोई पाबंदी नहीं। इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है कि अल्लाह हर चीज़ पर निगरानी रखने वाला है, उसकी नज़र से कोई चीज़ छिपी नहीं है, और वह जानता है कि उसके बंदे क्या करते हैं।

यह हुक्म उम्महातुल मोमिनीन (नबी ﷺ की पत्नियों) की फ़ज़ीलत को बयान करता है कि अल्लाह ने उन्हें इस क़ाबिल समझा कि नबी ﷺ के लिए उनके अलावा किसी और से शादी करना जायज़ न रखा जाए। यह उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बड़ी इज़्ज़त की बात है।

इस आयत के बाद अल्लाह के रसूल ﷺ के लिए महिलाओं से निकाह की गुंजाइश फिर से बहाल कर दी गई, जैसा कि सही हदीस में आया है कि आप ﷺ का इंतकाल उस वक़्त तक नहीं हुआ जब तक कि आपके लिए महिलाओं (से निकाह) को हलाल नहीं कर दिया गया।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें नबी ﷺ की पत्नियों की अज़ीम शान का पता चलता है, और यह भी पता चलता है कि अल्लाह अपने नबी ﷺ की इज़्ज़त और उनके घराने की पाकीज़गी का कितना ख़याल रखता है। यह हमारे लिए सबक़ है कि हम अपने घर की इज़्ज़त करें, अपनी पत्नियों के साथ हुस्ने सुलूक करें, और अल्लाह की निगरानी का एहसास रखें। अल्लाह हर चीज़ पर निगरानी रखने वाला है — यही हमारे लिए सबसे बड़ी तरबियत है कि हम हर हाल में याद रखें कि अल्लाह हमें देख रहा है। यही ईमान की असली रूह है।



📜 आयत 50-54 — अल-अहज़ाब

50يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَاجَكَ اللَّاتِي آتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّاتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَالَاتِكَ اللَّاتِي هَاجَرْنَ مَعَكَ وَامْرَأَةً مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنْ أَرَادَ النَّبِيُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةً لَّكَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِي أَزْوَاجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌ ۗ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
ऐ नबी हमने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी उन बीवियों को हलाल कर दिया है जिनको तुम मेहर दे चुके हो और तुम्हारी उन लौंडियों को (भी) जो खुदा ने तुमको (बग़ैर लड़े-भिड़े) माले ग़नीमत में अता की है और तुम्हारे चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामू की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जो तुम्हारे साथ हिजरत करके आयी हैं (हलाल कर दी और हर ईमानवाली औरत (भी हलाल कर दी) अगर वह अपने को (बग़ैर मेहर) नबी को दे दें और नबी भी उससे निकाह करना चाहते हों मगर (ऐ रसूल) ये हुक्म सिर्फ तुम्हारे वास्ते ख़ास है और मोमिनीन के लिए नहीं और हमने जो कुछ (मेहर या क़ीमत) आम मोमिनीन पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर कर दिया है हम खूब जानते हैं और (तुम्हारी रिआयत इसलिए है) ताकि तुमको (बीवियों की तरफ से) कोई दिक्क़त न हो और खुदा तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है
51۞ تُرْجِي مَن تَشَاءُ مِنْهُنَّ وَتُؤْوِي إِلَيْكَ مَن تَشَاءُ ۖ وَمَنِ ابْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَن تَقَرَّ أَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَا آتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي قُلُوبِكُمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَلِيمًا
इनमें से जिसको (जब) चाहो अलग कर दो और जिसको (जब तक) चाहो अपने पास रखो और जिन औरतों को तुमने अलग कर दिया था अगर फिर तुम उनके ख्वाहॉ हो तो भी तुम पर कोई मज़ाएक़ा नहीं है ये (अख़तेयार जो तुमको दिया गया है) ज़रूर इस क़ाबिल है कि तुम्हारी बीवियों की ऑंखें ठन्डी रहे और आर्जूदा ख़ातिर न हो और वो कुछ तुम उन्हें दे दो सबकी सब उस पर राज़ी रहें और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है खुदा उसको ख़ुब जानता है और खुदा तो बड़ा वाक़िफकार बुर्दबार है
52لَّا يَحِلُّ لَكَ النِّسَاءُ مِن بَعْدُ وَلَا أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَاجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ رَّقِيبًا
(ऐ रसूल) अब उन (नौ) के बाद (और) औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला (क्यों न) मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ (इस के बाद भी जायज़ हैं) और खुदा तो हर चीज़ का निगरॉ है
53يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ وَلَٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنكُمْ ۖ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا رَسُولَ اللَّهِ وَلَا أَن تَنكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِن بَعْدِهِ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ اللَّهِ عَظِيمًا
ऐ ईमानदारों तुम लोग पैग़म्बर के घरों में न जाया करो मगर जब तुमको खाने के वास्ते (अन्दर आने की) इजाज़त दी जाए (लेकिन) उसके पकने का इन्तेज़ार (नबी के घर बैठकर) न करो मगर जब तुमको बुलाया जाए तो (ठीक वक्त पर) जाओ और फिर जब खा चुको तो (फौरन अपनी अपनी जगह) चले जाया करो और बातों में न लग जाया करो क्योंकि इससे पैग़म्बर को अज़ीयत होती है तो वह तुम्हारा लैहाज़ करते हैं और खुदा तो ठीक (ठीक कहने) से झेंपता नहीं और जब पैग़म्बर की बीवियों से कुछ माँगना हो तो पर्दे के बाहर से माँगा करो यही तुम्हारे दिलों और उनके दिलों के वास्ते बहुत सफाई की बात है और तुम्हारे वास्ते ये जायज़ नहीं कि रसूले खुदा को (किसी तरह) अज़ीयत दो और न ये जायज़ है कि तुम उसके बाद कभी उनकी बीवियों से निकाह करो बेशक ये ख़ुदा के नज़दीक बड़ा (गुनाह) है
54إِن تُبْدُوا شَيْئًا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ खुदा तो (बहरहाल) हर चीज़ से यक़ीनी खूब आगाह है
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
52आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 52

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सूरा आयत 52/73 — अल-अहज़ाब الأحزاب (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अहज़ाब सुनें, अल-अहज़ाब अनुवाद, अल-अहज़ाब mp3, अल-अहज़ाब pdf. आयत 50–54. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

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