अल-अहज़ाब · 53/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ وَلَٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنكُمْ ۖ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا رَسُولَ اللَّهِ وَلَا أَن تَنكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِن بَعْدِهِ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ اللَّهِ عَظِيمًا ۝٥٣
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tadkhuloo bu yootan Nabiyyi ilaaa ai yu`zana lakum ilaa ta`aamin ghaira naazireena inaahu wa laakin izaa du`eetum fadkhuloo fa izaa ta`imtum fantashiroo wa laa mustaaniseena lihadees; inna zaalikum kaana yu`zin Nabiyya fa yastahyee minkum wallaahu laa yastahyee minal haqq; wa izaa sa altumoohunna mataa`an fas`aloohunna minw waraaa`i hijaab; zaalikum atharu liquloobikum wa quloobihinn; wa maa kaana lakum an tu`zoo Rasoolal laahi wa laaa an tankihooo azwaajahoo mim ba`diheee abadaa; inna zaalikum kaana `indal laahi `azeema
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों तुम लोग पैग़म्बर के घरों में न जाया करो मगर जब तुमको खाने के वास्ते (अन्दर आने की) इजाज़त दी जाए (लेकिन) उसके पकने का इन्तेज़ार (नबी के घर बैठकर) न करो मगर जब तुमको बुलाया जाए तो (ठीक वक्त पर) जाओ और फिर जब खा चुको तो (फौरन अपनी अपनी जगह) चले जाया करो और बातों में न लग जाया करो क्योंकि इससे पैग़म्बर को अज़ीयत होती है तो वह तुम्हारा लैहाज़ करते हैं और खुदा तो ठीक (ठीक कहने) से झेंपता नहीं और जब पैग़म्बर की बीवियों से कुछ माँगना हो तो पर्दे के बाहर से माँगा करो यही तुम्हारे दिलों और उनके दिलों के वास्ते बहुत सफाई की बात है और तुम्हारे वास्ते ये जायज़ नहीं कि रसूले खुदा को (किसी तरह) अज़ीयत दो और न ये जायज़ है कि तुम उसके बाद कभी उनकी बीवियों से निकाह करो बेशक ये ख़ुदा के नज़दीक बड़ा (गुनाह) है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ: भोजन के पकने की प्रतीक्षा न करते हुए (अर्थात, समय से पहले न जाएँ)।
  • فَانتَشِرُوا: वहाँ से चले जाओ (बाहर निकल जाओ)।
  • مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ: आपस में बातचीत करने के लिए (वहाँ) ठहरना।
  • مَتَاعًا: कोई सामान या आवश्यक वस्तु।
  • حِجَابٍ: पर्दा (परदा)।
  • أَطْهَرُ: अधिक पवित्र (दिलों की शुद्धि के लिए बेहतर)।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला तुम्हें सिखा रहा है कि नबी ﷺ के घर में प्रवेश करने का सलीक़ा क्या होना चाहिए। यह सिर्फ़ एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि ईमान की परख है। नबी ﷺ के घर में बिना अनुमति के, और खासकर भोजन के पकने का इंतज़ार करते हुए, पहले से न जाओ। जब तुम्हें दावत दी जाए, तभी जाओ, और जब खाना खा लो, तो तुरंत वहाँ से उठ जाओ। वहाँ बैठकर आपस में बातचीत करने के लिए ठहरना नबी ﷺ को तकलीफ़ देता था, क्योंकि वे अपनी शर्म और नर्मी की वजह से तुम्हें जाने के लिए नहीं कह पाते थे। लेकिन अल्लाह तआला हक़ (सत्य) बोलने में कभी शर्म नहीं करता, इसलिए उसने साफ़-साफ़ यह आदेश दिया।

इसी तरह, जब तुम नबी ﷺ की पवित्र पत्नियों से कोई चीज़ माँगो, तो पर्दे के पीछे से माँगो। यह तुम्हारे और उनके दिलों की पवित्रता के लिए अधिक बेहतर है, क्योंकि आँखों का देखना दिल में फ़ितना (बुरे ख़यालात) पैदा कर सकता है। शैतान उसी रास्ते से वसवसा डालता है।

और सबसे बड़ी बात—अल्लाह के रसूल ﷺ को किसी भी तरह से तकलीफ़ देना जायज़ नहीं है, और न ही उनके बाद उनकी पत्नियों से विवाह करना। वे तो मोमिनों की माताएँ हैं, और यह काम अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ा गुनाह है। यह आदेश सिर्फ़ उस वक़्त के लिए नहीं था, बल्कि हमेशा के लिए है, और उम्मत ने इसे पूरी तरह से अपनाया।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुहब्बत सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अदब (शिष्टाचार) और एहतिराम से होती है। जिस तरह सहाबा ने नबी ﷺ के घर में जाने के अदब को अपनाया और उनकी पत्नियों का सम्मान किया, उसी तरह हमें भी अपने दिलों को पाक रखना चाहिए और हर उस चीज़ से बचना चाहिए जो अल्लाह को नापसंद है। यह आयत हमें बताती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि हर काम में अदब, हया और पवित्रता का ख़याल रखना भी इबादत है। जो लोग इन आदाब को अपनाते हैं, अल्लाह उनके दिलों को नूर से भर देता है और उन्हें दुनिया और आख़िरत में कामयाबी देता है। आओ, हम सब अपने जीवन में इन आदाब को अपनाएँ और अल्लाह के हुक्मों के सामने सर झुकाएँ—यही हमारी सच्ची कामयाबी है।



📜 आयत 51-55 — अल-अहज़ाब

51۞ تُرْجِي مَن تَشَاءُ مِنْهُنَّ وَتُؤْوِي إِلَيْكَ مَن تَشَاءُ ۖ وَمَنِ ابْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَن تَقَرَّ أَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَا آتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي قُلُوبِكُمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَلِيمًا
इनमें से जिसको (जब) चाहो अलग कर दो और जिसको (जब तक) चाहो अपने पास रखो और जिन औरतों को तुमने अलग कर दिया था अगर फिर तुम उनके ख्वाहॉ हो तो भी तुम पर कोई मज़ाएक़ा नहीं है ये (अख़तेयार जो तुमको दिया गया है) ज़रूर इस क़ाबिल है कि तुम्हारी बीवियों की ऑंखें ठन्डी रहे और आर्जूदा ख़ातिर न हो और वो कुछ तुम उन्हें दे दो सबकी सब उस पर राज़ी रहें और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है खुदा उसको ख़ुब जानता है और खुदा तो बड़ा वाक़िफकार बुर्दबार है
52لَّا يَحِلُّ لَكَ النِّسَاءُ مِن بَعْدُ وَلَا أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَاجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ رَّقِيبًا
(ऐ रसूल) अब उन (नौ) के बाद (और) औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला (क्यों न) मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ (इस के बाद भी जायज़ हैं) और खुदा तो हर चीज़ का निगरॉ है
53يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ وَلَٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنكُمْ ۖ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا رَسُولَ اللَّهِ وَلَا أَن تَنكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِن بَعْدِهِ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ اللَّهِ عَظِيمًا
ऐ ईमानदारों तुम लोग पैग़म्बर के घरों में न जाया करो मगर जब तुमको खाने के वास्ते (अन्दर आने की) इजाज़त दी जाए (लेकिन) उसके पकने का इन्तेज़ार (नबी के घर बैठकर) न करो मगर जब तुमको बुलाया जाए तो (ठीक वक्त पर) जाओ और फिर जब खा चुको तो (फौरन अपनी अपनी जगह) चले जाया करो और बातों में न लग जाया करो क्योंकि इससे पैग़म्बर को अज़ीयत होती है तो वह तुम्हारा लैहाज़ करते हैं और खुदा तो ठीक (ठीक कहने) से झेंपता नहीं और जब पैग़म्बर की बीवियों से कुछ माँगना हो तो पर्दे के बाहर से माँगा करो यही तुम्हारे दिलों और उनके दिलों के वास्ते बहुत सफाई की बात है और तुम्हारे वास्ते ये जायज़ नहीं कि रसूले खुदा को (किसी तरह) अज़ीयत दो और न ये जायज़ है कि तुम उसके बाद कभी उनकी बीवियों से निकाह करो बेशक ये ख़ुदा के नज़दीक बड़ा (गुनाह) है
54إِن تُبْدُوا شَيْئًا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ खुदा तो (बहरहाल) हर चीज़ से यक़ीनी खूब आगाह है
55لَّا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِي آبَائِهِنَّ وَلَا أَبْنَائِهِنَّ وَلَا إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ أَخَوَاتِهِنَّ وَلَا نِسَائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ ۗ وَاتَّقِينَ اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدًا
औरतों पर न अपने बाप दादाओं (के सामने होने) में कुछ गुनाह है और न अपने बेटों के और न अपने भाईयों के और न अपने भतीजों के और अपने भांजों के और न अपनी (क़िस्म कि) औरतों के और न अपनी लौंडियों के सामने होने में कुछ गुनाह है (ऐ पैग़म्बर की बीबियों) तुम लोग खुदा से डरती रहो इसमें कोई शक ही नहीं की खुदा (तुम्हारे आमाल में) हर चीज़ से वाक़िफ़ है
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 53

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सूरा आयत 53/73 — अल-अहज़ाब الأحزاب (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अहज़ाब सुनें, अल-अहज़ाब अनुवाद, अल-अहज़ाब mp3, अल-अहज़ाब pdf. आयत 51–55. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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