अन-नहल · 36/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ هَدَى اللَّهُ وَمِنْهُم مَّنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ الضَّلَالَةُ ۚ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ ۝٣٦
Wa laqad ba`asnaa fee kulli ummatir Rasoolan ani`budul laaha wajtanibut Taaghoota faminhum man hadal laahu wa minhum man haqqat `alaihid dalaalah; faseeroo fil ardi fanzuroo kaifa kaana `aaqibatul mukazzibeen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तो हर उम्मत में एक (न एक) रसूल इस बात के लिए ज़रुर भेजा कि लोगों ख़ुदा की इबादत करो और बुतों (की इबादत) से बचे रहो ग़रज़ उनमें से बाज़ की तो ख़ुदा ने हिदायत की और बाज़ के (सर) पर गुमराही सवार हो गई तो ज़रा तुम लोग रुए ज़मीन पर चल फिर कर देखो तो कि (पैग़म्बराने ख़ुदा के) झुठलाने वालों को क्या अन्जाम हुआ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • बَعَثْنَا: हमने भेजा।
  • उम्मत: समुदाय या जाति।
  • ताग़ूत: हर वह चीज़ जिसे अल्लाह के अलावा पूजा जाए, चाहे वह मूर्ति हो, शैतान हो, जिन्न हो या कोई इंसान।
  • ह़क़्क़त: साबित हो गई, वाजिब हो गई।
  • अ़क़िबत: अंजाम, परिणाम।
  • मुकज़्ज़िबीन: झुठलाने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में बताया कि उसने हर उम्मत में एक रसूल भेजा। इन रसूलों का मूल संदेश एक ही था—केवल अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा हर पूज्य) से बचो। यही दीन का सार है जो आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक सभी नबियों का पैग़ाम रहा।

इसके बाद अल्लाह ने बताया कि लोगों की प्रतिक्रिया दो प्रकार की थी—कुछ लोगों को अल्लाह ने हिदायत दी और उन्होंने रसूलों का अनुसरण किया, जबकि कुछ लोगों पर गुमराही साबित हो गई, क्योंकि उन्होंने सत्य को जानते हुए भी उसे ठुकरा दिया और हठधर्मी पर अड़े रहे। यह उनकी अपनी पसंद का परिणाम था, न कि अल्लाह की ओर से ज़ुल्म।

अंत में अल्लाह क़ुरैश और सभी लोगों को नसीहत करता है कि वे धरती में चलें-फिरें और देखें कि उन लोगों का अंजाम क्या हुआ जिन्होंने रसूलों को झुठलाया। उनके शहर वीरान हो गए, उनकी ताक़त मिट्टी में मिल गई और वे इतिहास के पन्नों में सिर्फ़ एक सबक़ बनकर रह गए।

फ़ायदे (सीख):

  1. दीन की एकरूपता: इस आयत से पता चलता है कि सभी रसूलों का संदेश एक ही था—तौहीद और ताग़ूत से बचाव। इस्लाम कोई नया दीन नहीं बल्कि उसी मूल संदेश का अंतिम रूप है।
  2. हिदायत और गुमराही का राज़: अल्लाह किसी को ज़बरदस्ती गुमराह नहीं करता। जो लोग सच्चाई को स्वीकार करने का इरादा रखते हैं, अल्लाह उन्हें हिदायत देता है। जो लोग हठधर्मी और अहंकार के कारण सच्चाई को ठुकराते हैं, अल्लाह उन्हें उनके हाल पर छोड़ देता है।
  3. इतिहास से सबक़: यह आयत हमें प्रोत्साहित करती है कि हम इतिहास से सीखें। जिन क़ौमों ने अल्लाह के रसूलों को झुठलाया, उनका अंजाम विनाश के अलावा कुछ नहीं था। यह हमारे लिए चेतावनी है कि हम उनके रास्ते पर न चलें।
  4. अल्लाह की रहमत: अल्लाह ने किसी भी उम्मत को बिना रसूल भेजे सज़ा नहीं दी। यह उसकी रहमत और न्याय का प्रमाण है कि उसने हर जगह अपना संदेश पहुँचाया ताकि लोगों के पास कोई बहाना न बचे।
  5. आज़ादी और ज़िम्मेदारी: इंसान को चुनने की आज़ादी दी गई है, लेकिन इस आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारी भी है। हमें अपनी पसंद के नतीजे भुगतने होंगे। इसलिए बेहतर है कि हम हिदायत का रास्ता चुनें।
🎧 सुनें

📜 आयत 34-38 — अन-नहल

34فَأَصَابَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
फिर जो जो करतूतें उनकी थी उसकी सज़ा में बुरे नतीजे उनको मिले और जिस (अज़ाब) की वह हँसी उड़ाया करते थे उसने उन्हें (चारो तरफ से) घेर लिया
35وَقَالَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ نَّحْنُ وَلَا آبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
और मुशरेकीन कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम ही उसके सिवा किसी और चीज़ की इबादत करते और न हमारे बाप दादा और न हम बग़ैर उस (की मर्ज़ी) के किसी चीज़ को हराम कर बैठते जो लोग इनसे पहले हो गुज़रे हैं वह भी ऐसे (हीला हवाले की) बातें कर चुके हैं तो (कहा करें) पैग़म्बरों पर तो उसके सिवा कि एहकाम को साफ साफ पहुँचा दे और कुछ भी नहीं
36وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ هَدَى اللَّهُ وَمِنْهُم مَّنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ الضَّلَالَةُ ۚ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ
और हमने तो हर उम्मत में एक (न एक) रसूल इस बात के लिए ज़रुर भेजा कि लोगों ख़ुदा की इबादत करो और बुतों (की इबादत) से बचे रहो ग़रज़ उनमें से बाज़ की तो ख़ुदा ने हिदायत की और बाज़ के (सर) पर गुमराही सवार हो गई तो ज़रा तुम लोग रुए ज़मीन पर चल फिर कर देखो तो कि (पैग़म्बराने ख़ुदा के) झुठलाने वालों को क्या अन्जाम हुआ
37إِن تَحْرِصْ عَلَىٰ هُدَاهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَن يُضِلُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
(ऐ रसूल) अगर तुमको इन लोगों के राहे रास्त पर जाने का हौका है (तो बे फायदा) क्योंकि ख़ुदा तो हरगिज़ उस शख़्श की हिदायत नहीं करेगा जिसको (नाज़िल होने की वजह से) गुमराही में छोड़ देता है और न उनका कोई मददगार है
38وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ ۙ لَا يَبْعَثُ اللَّهُ مَن يَمُوتُ ۚ بَلَىٰ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(कि अज़ाब से बचाए) और ये कुफ्फार ख़ुदा की जितनी क़समें उनके इमकान में तुम्हें खा (कर कहते) हैं कि जो शख़्श मर जाता है फिर उसको ख़ुदा दोबारा ज़िन्दा नहीं करेगा (ऐ रसूल) तुम कह दो कि हाँ ज़रुर ऐसा करेगा इस पर अपने वायदे की (वफा) लाज़िम व ज़रुरी है मगर बहुतेरे आदमी नहीं जानते हैं
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अनुवाद — अन-नहल 36

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Tuesday, August 18, 2026

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