In tahris `alaa hudaahum fa innal laaha laa yahdee mai yudillu wa maa lahum min naasireen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) अगर तुमको इन लोगों के राहे रास्त पर जाने का हौका है (तो बे फायदा) क्योंकि ख़ुदा तो हरगिज़ उस शख़्श की हिदायत नहीं करेगा जिसको (नाज़िल होने की वजह से) गुमराही में छोड़ देता है और न उनका कोई मददगार है
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اگر تم ان (کفار) کی ہدایت کے لیے للچاؤ تو جس کو خدا گمراہ کردیتا ہے اس کو وہ ہدایت نہیں دیا کرتا اور ایسے لوگوں کا کوئی مددگار بھی نہیں ہوتا
(ऐ रसूल) अगर तुमको इन लोगों के राहे रास्त पर जाने का हौका है (तो बे फायदा) क्योंकि ख़ुदा तो हरगिज़ उस शख़्श की हिदायत नहीं करेगा जिसको (नाज़िल होने की वजह से) गुमराही में छोड़ देता है और न उनका कोई मददगार है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
تَحْرِصْ: अत्यधिक प्रयास करना, भरपूर कोशिश करना।
هُدَاهُمْ: उनका मार्गदर्शन, उन्हें सीधा रास्ता दिखाना।
يُضِلُّ: जिसे (अल्लाह) गुमराह कर दे।
نَّاصِرِينَ: सहायक, मददगार।
व्याख्या:
ऐ नबी! यदि आप इन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के मार्गदर्शन के लिए अपनी पूरी कोशिश और अत्यधिक प्रयास करें, और उन्हें सीधे रास्ते पर लाने के लिए हर संभव उपाय अपनाएँ, तो यह आपका कर्तव्य है और आपने अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया। लेकिन आपको यह जान लेना चाहिए कि मार्गदर्शन देना केवल अल्लाह के हाथ में है। जिसे अल्लाह ने उसके कुकर्मों और हठधर्मिता के कारण गुमराह कर दिया, उसे कोई भी सीधा रास्ता नहीं दिखा सकता। अल्लाह की इच्छा के बिना किसी का दिल हिदायत के लिए नहीं खुलता।
इन लोगों ने सत्य को जानते हुए भी उसे ठुकरा दिया और हठधर्मिता पर अड़े रहे, इसलिए अल्लाह ने उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दिया। उनके लिए अल्लाह के अलावा कोई सहायक नहीं है जो उन्हें अल्लाह की यातना से बचा सके या उनके लिए सिफ़ारिश कर सके। वे अपने किए की सज़ा भुगतने वाले हैं।
शिक्षाएँ और लाभ:
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दूसरों को सत्य का संदेश पहुँचाना हमारा कर्तव्य है, लेकिन परिणाम अल्लाह के हाथ में है। हमें निराश नहीं होना चाहिए।
हिदायत और गुमराही पूरी तरह अल्लाह के इख्तियार में है। इसलिए हमें अपनी कोशिशें जारी रखनी चाहिए और अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि जो लोग जानबूझकर सत्य को ठुकराते हैं और हठधर्मिता पर अड़े रहते हैं, उनके लिए अल्लाह की ओर से कोई मदद नहीं आती।
इस्लाम की शिक्षा है कि हमें लोगों को नरमी और समझदारी से सत्य का संदेश देना चाहिए, लेकिन अगर कोई न माने तो हमें दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमारा काम केवल संदेश पहुँचाना है।
यह आयत हमें अल्लाह की क़ुदरत और उसके इख्तियार का एहसास कराती है, जिससे हमारा विश्वास और मज़बूत होता है कि सब कुछ उसी के हाथ में है।
और मुशरेकीन कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम ही उसके सिवा किसी और चीज़ की इबादत करते और न हमारे बाप दादा और न हम बग़ैर उस (की मर्ज़ी) के किसी चीज़ को हराम कर बैठते जो लोग इनसे पहले हो गुज़रे हैं वह भी ऐसे (हीला हवाले की) बातें कर चुके हैं तो (कहा करें) पैग़म्बरों पर तो उसके सिवा कि एहकाम को साफ साफ पहुँचा दे और कुछ भी नहीं
और हमने तो हर उम्मत में एक (न एक) रसूल इस बात के लिए ज़रुर भेजा कि लोगों ख़ुदा की इबादत करो और बुतों (की इबादत) से बचे रहो ग़रज़ उनमें से बाज़ की तो ख़ुदा ने हिदायत की और बाज़ के (सर) पर गुमराही सवार हो गई तो ज़रा तुम लोग रुए ज़मीन पर चल फिर कर देखो तो कि (पैग़म्बराने ख़ुदा के) झुठलाने वालों को क्या अन्जाम हुआ
(ऐ रसूल) अगर तुमको इन लोगों के राहे रास्त पर जाने का हौका है (तो बे फायदा) क्योंकि ख़ुदा तो हरगिज़ उस शख़्श की हिदायत नहीं करेगा जिसको (नाज़िल होने की वजह से) गुमराही में छोड़ देता है और न उनका कोई मददगार है
(कि अज़ाब से बचाए) और ये कुफ्फार ख़ुदा की जितनी क़समें उनके इमकान में तुम्हें खा (कर कहते) हैं कि जो शख़्श मर जाता है फिर उसको ख़ुदा दोबारा ज़िन्दा नहीं करेगा (ऐ रसूल) तुम कह दो कि हाँ ज़रुर ऐसा करेगा इस पर अपने वायदे की (वफा) लाज़िम व ज़रुरी है मगर बहुतेरे आदमी नहीं जानते हैं
(दोबारा ज़िन्दा करना इसलिए ज़रुरी है) कि जिन बातों पर ये लोग झगड़ा करते हैं उन्हें उनके सामने साफ वाज़ेए कर देगा और ताकि कुफ्फार ये समझ लें कि ये लोग (दुनिया में) झूठे थे
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