अन-नहल · 35/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَقَالَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ نَّحْنُ وَلَا آبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ ۝٣٥
Wa qaalal lazeena ashrakoo law shaaa`al laahu ma `abadnaa min doonihee min shai`in nahnu wa laaa aabaaa`unaa wa laa harramnaa min doonihee min shai`; kazaalika fa`alal lazeena min qablihim fahal `alar Rusuli illal balaaghul mubeen
📖 हिंदी अर्थ
और मुशरेकीन कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम ही उसके सिवा किसी और चीज़ की इबादत करते और न हमारे बाप दादा और न हम बग़ैर उस (की मर्ज़ी) के किसी चीज़ को हराम कर बैठते जो लोग इनसे पहले हो गुज़रे हैं वह भी ऐसे (हीला हवाले की) बातें कर चुके हैं तो (कहा करें) पैग़म्बरों पर तो उसके सिवा कि एहकाम को साफ साफ पहुँचा दे और कुछ भी नहीं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَوْ شَاءَ اللهُ: अगर अल्लाह चाहता।
  • مِن دُونِهِ: उसके अलावा, उसे छोड़कर।
  • آبَاؤُنَا: हमारे बाप-दादा।
  • حَرَّمْنَا: हमने हराम ठहराया (जैसे बहीरा, साइबा, वसीला आदि)।
  • الْبَلَاغُ الْمُبِينُ: स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचाना।

विस्तृत व्याख्या:

जिन लोगों ने अल्लाह के साथ साझीदार ठहराए (मुशरिकीन), उन्होंने अपने कुकर्मों को सही ठहराने के लिए एक बहाना बनाया। उन्होंने कहा: "अगर अल्लाह चाहता तो हम उसके अलावा किसी और की पूजा न करते, न हम और न हमारे पूर्वज, और न हम उसके अलावा किसी चीज़ को हराम ठहराते (जैसे बहीरा, साइबा, वसीला आदि)।" उनका तर्क यह था कि अगर अल्लाह को यह पसंद न होता तो वह हमें इन कामों पर क़ाबू न देता, इसलिए हमारा यह करना अल्लाह की मर्ज़ी से है।

यह बहाना बिल्कुल झूठा और बेबुनियाद है, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें अक्ल, समझ, इच्छा और चुनने की शक्ति दी है। उसने अपने रसूल भेजे जिन्होंने उन्हें साफ़-साफ़ बता दिया कि क्या सही है और क्या गलत। अल्लाह की मर्ज़ी का यह मतलब नहीं कि वह उन्हें ज़बरदस्ती गुमराही पर मजबूर करे, बल्कि उसने उन्हें आज़ादी दी और रास्ता दिखाया। इसी तरह का बहाना पहले के काफ़िरों ने भी बनाया था, लेकिन यह उनके काम न आया। रसूलों का काम सिर्फ़ अल्लाह का संदेश साफ़-साफ़ पहुँचा देना है, और उन्होंने यह कर दिखाया। इसके बाद लोगों का हिसाब अल्लाह के ज़िम्मे है।

फ़ायदे और सबक:

  1. अल्लाह ने इंसान को इच्छा और चुनाव की शक्ति दी है, इसलिए हर इंसान अपने कर्मों के लिए खुद ज़िम्मेदार है। क़िस्मत का बहाना बनाकर गुनाहों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
  2. अल्लाह की मर्ज़ी का सही मतलब यह है कि उसने हिदायत और गुमराही के रास्ते साफ़ कर दिए, और रसूल भेजकर अपनी तरफ़ से हुज्जत (प्रमाण) पूरी कर दी।
  3. रसूलों का काम सिर्फ़ संदेश पहुँचाना है, लोगों को ज़बरदस्ती सीधे रास्ते पर लाना उनका काम नहीं। यह हमें सिखाता है कि हमें भी दूसरों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाना है, लेकिन नतीजा अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए।
  4. यह आयत हमें बताती है कि इस्लाम एक तर्कसंगत और ज़िम्मेदारी वाला धर्म है, जो हर इंसान को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराता है और उसे अल्लाह के सामने जवाबदेह ठहराता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 33-37 — अन-नहल

33هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَٰكِن كَانُوا أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
(ऐ रसूल) क्या ये (अहले मक्का) इसी बात के मुन्तिज़र है कि उनके पास फरिश्ते (क़ब्ज़े रुह को) आ ही जाएँ या (उनके हलाक करने को) तुम्हारे परवरदिगार का अज़ाब ही आ पहुँचे जो लोग उनसे पहले हो गुज़रे हैं वह ऐसी बातें कर चुके हैं और ख़ुदा ने उन पर (ज़रा भी) जुल्म नहीं किया बल्कि वह लोग ख़ुद कुफ़्र की वजह से अपने ऊपर आप जुल्म करते रहे
34فَأَصَابَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
फिर जो जो करतूतें उनकी थी उसकी सज़ा में बुरे नतीजे उनको मिले और जिस (अज़ाब) की वह हँसी उड़ाया करते थे उसने उन्हें (चारो तरफ से) घेर लिया
35وَقَالَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا لَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ نَّحْنُ وَلَا آبَاؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى الرُّسُلِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
और मुशरेकीन कहते हैं कि अगर ख़ुदा चाहता तो न हम ही उसके सिवा किसी और चीज़ की इबादत करते और न हमारे बाप दादा और न हम बग़ैर उस (की मर्ज़ी) के किसी चीज़ को हराम कर बैठते जो लोग इनसे पहले हो गुज़रे हैं वह भी ऐसे (हीला हवाले की) बातें कर चुके हैं तो (कहा करें) पैग़म्बरों पर तो उसके सिवा कि एहकाम को साफ साफ पहुँचा दे और कुछ भी नहीं
36وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ هَدَى اللَّهُ وَمِنْهُم مَّنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ الضَّلَالَةُ ۚ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ
और हमने तो हर उम्मत में एक (न एक) रसूल इस बात के लिए ज़रुर भेजा कि लोगों ख़ुदा की इबादत करो और बुतों (की इबादत) से बचे रहो ग़रज़ उनमें से बाज़ की तो ख़ुदा ने हिदायत की और बाज़ के (सर) पर गुमराही सवार हो गई तो ज़रा तुम लोग रुए ज़मीन पर चल फिर कर देखो तो कि (पैग़म्बराने ख़ुदा के) झुठलाने वालों को क्या अन्जाम हुआ
37إِن تَحْرِصْ عَلَىٰ هُدَاهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَن يُضِلُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
(ऐ रसूल) अगर तुमको इन लोगों के राहे रास्त पर जाने का हौका है (तो बे फायदा) क्योंकि ख़ुदा तो हरगिज़ उस शख़्श की हिदायत नहीं करेगा जिसको (नाज़िल होने की वजह से) गुमराही में छोड़ देता है और न उनका कोई मददगार है
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अनुवाद — अन-नहल 35

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Tuesday, August 18, 2026

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