अल-अहज़ाब · 54/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
إِن تُبْدُوا شَيْئًا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا ۝٥٤
In tubdoo shai`an aw tukhfoohu fa innal laaha kaana bikulli shai`in `Aleemaa
📖 हिंदी अर्थ
चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ खुदा तो (बहरहाल) हर चीज़ से यक़ीनी खूब आगाह है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُبْدُوا – प्रकट करना, ज़ाहिर करना
  • تُخْفُوهُ – छिपाना, अपने दिल में रखना
  • عَلِيمًا – सब कुछ जानने वाला, पूर्ण ज्ञान रखने वाला

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ लोगों! चाहे तुम कोई बात ज़ुबान पर लाकर प्रकट कर दो, या उसे अपने दिलों में छिपाए रखो, अल्लाह तआला के लिए दोनों ही स्थितियाँ एक समान हैं। वह उस हर चीज़ से पूरी तरह अवगत है जो तुम अपनी ज़ुबान से कहते हो और उस हर बात से भी जो तुम अपने सीनों में पोशीदा रखते हो। यहाँ विशेष रूप से उस संदर्भ में बात की गई है जब अल्लाह के रसूल ﷺ की पाक बीवियों के संबंध में कुछ लोगों ने ऐसी बातें कीं जो शरई अदब के खिलाफ थीं, या दिलों में ऐसे ख़यालात पैदा किए जो नापसंदीदा थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि तुम चाहे इन बातों को ज़ाहिर करो या छिपाओ, अल्लाह तो हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान रखता है।

यह एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि अल्लाह तआला की निगाह हमारे ज़ाहिर और बातिन दोनों पर है। वह न केवल हमारे कर्मों को देखता है बल्कि हमारे दिलों के राज़ और छिपे हुए इरादों को भी जानता है। कोई भी बात, चाहे वह कितनी ही गुप्त क्यों न हो, उससे छिपी नहीं है। यही वजह है कि एक मोमिन को चाहिए कि वह अपनी ज़ुबान और अपने दिल दोनों को पाक रखे, क्योंकि अल्लाह तआला हर छोटी-बड़ी बात का हिसाब लेगा।

इस आयत में हमारे लिए एक बहुत प्यारी बशारत (खुशखबरी) भी है कि अल्लाह तआला इतना मेहरबान और रहीम है कि वह हमारी हर नेकी को जानता है, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, और उसका अज्र अता करेगा। साथ ही यह भी तनबीह है कि बुराई भी उससे छिपी नहीं है, और उसकी सज़ा से बचना मुश्किल है। इसलिए हमें अपनी ज़ुबान को गुनाह से बचाना चाहिए और अपने दिल को बुरे ख़यालात से पाक रखना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह तआला से कुछ भी छिपा नहीं है — न हमारे ज़ाहिरी आमाल और न हमारे बातिनी इरादे। यही ईमान की निशानी है कि इंसान हर वक़्त इस एहसास के साथ जिए कि अल्लाह मुझे देख रहा है और मेरी हर बात जानता है।



📜 आयत 52-56 — अल-अहज़ाब

52لَّا يَحِلُّ لَكَ النِّسَاءُ مِن بَعْدُ وَلَا أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَاجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ رَّقِيبًا
(ऐ रसूल) अब उन (नौ) के बाद (और) औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला (क्यों न) मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ (इस के बाद भी जायज़ हैं) और खुदा तो हर चीज़ का निगरॉ है
53يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ وَلَٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنكُمْ ۖ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا رَسُولَ اللَّهِ وَلَا أَن تَنكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِن بَعْدِهِ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ اللَّهِ عَظِيمًا
ऐ ईमानदारों तुम लोग पैग़म्बर के घरों में न जाया करो मगर जब तुमको खाने के वास्ते (अन्दर आने की) इजाज़त दी जाए (लेकिन) उसके पकने का इन्तेज़ार (नबी के घर बैठकर) न करो मगर जब तुमको बुलाया जाए तो (ठीक वक्त पर) जाओ और फिर जब खा चुको तो (फौरन अपनी अपनी जगह) चले जाया करो और बातों में न लग जाया करो क्योंकि इससे पैग़म्बर को अज़ीयत होती है तो वह तुम्हारा लैहाज़ करते हैं और खुदा तो ठीक (ठीक कहने) से झेंपता नहीं और जब पैग़म्बर की बीवियों से कुछ माँगना हो तो पर्दे के बाहर से माँगा करो यही तुम्हारे दिलों और उनके दिलों के वास्ते बहुत सफाई की बात है और तुम्हारे वास्ते ये जायज़ नहीं कि रसूले खुदा को (किसी तरह) अज़ीयत दो और न ये जायज़ है कि तुम उसके बाद कभी उनकी बीवियों से निकाह करो बेशक ये ख़ुदा के नज़दीक बड़ा (गुनाह) है
54إِن تُبْدُوا شَيْئًا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ खुदा तो (बहरहाल) हर चीज़ से यक़ीनी खूब आगाह है
55لَّا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِي آبَائِهِنَّ وَلَا أَبْنَائِهِنَّ وَلَا إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ أَخَوَاتِهِنَّ وَلَا نِسَائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ ۗ وَاتَّقِينَ اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدًا
औरतों पर न अपने बाप दादाओं (के सामने होने) में कुछ गुनाह है और न अपने बेटों के और न अपने भाईयों के और न अपने भतीजों के और अपने भांजों के और न अपनी (क़िस्म कि) औरतों के और न अपनी लौंडियों के सामने होने में कुछ गुनाह है (ऐ पैग़म्बर की बीबियों) तुम लोग खुदा से डरती रहो इसमें कोई शक ही नहीं की खुदा (तुम्हारे आमाल में) हर चीज़ से वाक़िफ़ है
56إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
इसमें भी शक नहीं कि खुदा और उसके फरिश्ते पैग़म्बर (और उनकी आल) पर दुरूद भेजते हैं तो ऐ ईमानदारों तुम भी दुरूद भेजते रहो और बराबर सलाम करते रहो
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
54आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 54

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सूरा आयत 54/73 — अल-अहज़ाब الأحزاب (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अहज़ाब सुनें, अल-अहज़ाब अनुवाद, अल-अहज़ाब mp3, अल-अहज़ाब pdf. आयत 52–56. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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