अन-नूर · 59/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَإِذَا بَلَغَ الْأَطْفَالُ مِنكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَأْذِنُوا كَمَا اسْتَأْذَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝٥٩
Wa izaa balaghal atfaalu minkumul huluma fal yastaazinoo kamas taazanal lazeena min qablihim; kazaalika yubaiyinul laahu lakum Aayaatih; wallaahu `Aleemun Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ ईमानदारों) जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल (बड़ी उम्र) वाले (घर में आने की) इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ ख़ुदा अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफकार हकीम है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • बुलूग़े हुलुम (बालिग़ होना): यानी बच्चों का उस उम्र को पहुँचना जब उन पर शरई अहकाम (धार्मिक आदेश) लागू होते हैं, जैसे नमाज़, रोज़ा, हिजाब वगैरह।
  • फ़ल-यस्ताज़िनू (उन्हें इजाज़त लेनी चाहिए): यानी किसी के घर में दाखिल होने से पहले अनुमति माँगना।
  • अल्लाह अलीमुन हकीम: अल्लाह सब कुछ जानने वाला और अपने फैसलों में पूर्ण ज्ञान और हिकमत (समझदारी) वाला है।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला बच्चों के बालिग़ होने के बाद के हुक्म को बयान कर रहा है। जब बच्चे उस उम्र को पहुँच जाएँ जहाँ उन पर शरई अहकाम लागू होते हैं (यानी बालिग़ हो जाएँ), तो उनके लिए भी वही हुक्म है जो बड़ों के लिए है — यानी उन्हें हर वक़्त, हर मौके पर, घर में दाखिल होने से पहले इजाज़त लेनी होगी। यह वही आदेश है जो पहले बड़ों (आज़ाद, बालिग़ लोगों) के लिए बताया गया था। यानी अब वे बच्चे नहीं रहे जिनके लिए पहले तीन वक़्त (सुबह, दोपहर और रात) की इजाज़त का नियम था, बल्कि अब उन्हें हर वक़्त इजाज़त लेनी होगी।

अल्लाह तआला यहाँ यह सिखा रहा है कि इस्लाम में घर की प्राइवेसी (निजता) का कितना ख्याल रखा गया है। यह सिर्फ़ एक सामाजिक आदेश नहीं, बल्कि एक तहज़ीब (संस्कृति) और अदब (शिष्टाचार) है जो मुसलमानों को सिखाया गया है। इसके बाद अल्लाह फरमाता है कि जिस तरह उसने ये आदेश साफ़-साफ़ बयान किए हैं, उसी तरह वह अपनी सारी आयतों को स्पष्ट करता है, ताकि लोग समझें और उन पर अमल करें। अल्लाह अपने बंदों की भलाई को खूब जानता है और जो कुछ भी वह हुक्म देता है, उसमें गहरी हिकमत (समझदारी) होती है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि ज़िंदगी के हर पहलू में अदब और तहज़ीब का दीन है। अल्लाह तआला ने हमें इजाज़त लेने का तरीका सिखाकर यह बताया कि दूसरों की निजता और इज़्ज़त का ख्याल रखना कितना बड़ा गुण है। यही वजह है कि इस्लाम में घर की प्राइवेसी को इतनी अहमियत दी गई। यह आदेश हमें एक मुकम्मल और पाकीज़ा समाज बनाने में मदद करता है, जहाँ हर इंसान सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। हमें चाहिए कि हम इन आदेशों पर अमल करें और अपने बच्चों को भी यह अदब सिखाएँ, ताकि हमारा समाज अल्लाह की पसंदीदा तहज़ीब पर चले। याद रखें, अल्लाह का हर हुक्म हमारी भलाई के लिए है, और वह जो कुछ भी फरमाता है, उसमें कोई कमी नहीं होती।



📜 आयत 57-61 — अन-नूर

57لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ الْمَصِيرُ
और (ऐ रसूल) तुम ये ख्याल न करो कि कुफ्फार (इधर उधर) ज़मीन मे (फैल कर हमें) आजिज़ कर देगें (ये ख़ुद आजिज़ हो जाएगें) और उनका ठिकाना तो जहन्नुम है और क्या बुरा ठिकाना है
58يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِيَسْتَأْذِنكُمُ الَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ وَالَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا الْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَاةِ الْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ الظَّهِيرَةِ وَمِن بَعْدِ صَلَاةِ الْعِشَاءِ ۚ ثَلَاثُ عَوْرَاتٍ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّافُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि (दिन रात में) तीन मरतबा (तुम्हारे पास आने की) तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ (एक) नमाज़ सुबह से पहले और (दूसरे) जब तुम (गर्मी से) दोपहर को (सोने के लिए मामूलन) कपड़े उतार दिया करते हो (तीसरी) नमाजे इशा के बाद (ये) तीन (वक्त) तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा (बे अज़न आने मे) न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर (क्योंकि) उन अवक़ात के अलावा (ब ज़रुरत या बे ज़रुरत) लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ ख़ुदा (अपने) एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
59وَإِذَا بَلَغَ الْأَطْفَالُ مِنكُمُ الْحُلُمَ فَلْيَسْتَأْذِنُوا كَمَا اسْتَأْذَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और (ऐ ईमानदारों) जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल (बड़ी उम्र) वाले (घर में आने की) इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ ख़ुदा अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और ख़ुदा तो बड़ा वाकिफकार हकीम है
60وَالْقَوَاعِدُ مِنَ النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا يَرْجُونَ نِكَاحًا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَاتٍ بِزِينَةٍ ۖ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌ لَّهُنَّ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो (बुढ़ापे की वजह से) निकाह की ख्वाहिश नही रखती वह अगर अपने कपड़े (दुपट्टे वगैराह) उतारकर (सर नंगा) कर डालें तो उसमें उन पर कुछ गुनाह नही है- बशर्ते कि उनको अपना बनाव सिंगार दिखाना मंज़ूर न हो और (इस से भी) बचें तो उनके लिए और बेहतर है और ख़ुदा तो (सबकी सब कुछ) सुनता और जानता है
61لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ وَلَا عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَن تَأْكُلُوا مِن بُيُوتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ آبَائِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أُمَّهَاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ إِخْوَانِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخَوَاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَعْمَامِكُمْ أَوْ بُيُوتِ عَمَّاتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخْوَالِكُمْ أَوْ بُيُوتِ خَالَاتِكُمْ أَوْ مَا مَلَكْتُم مَّفَاتِحَهُ أَوْ صَدِيقِكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَأْكُلُوا جَمِيعًا أَوْ أَشْتَاتًا ۚ فَإِذَا دَخَلْتُم بُيُوتًا فَسَلِّمُوا عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ تَحِيَّةً مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُبَارَكَةً طَيِّبَةً ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
इस बात में न तो अंधे आदमी के लिए मज़ाएक़ा है और न लँगड़ें आदमी पर कुछ इल्ज़ाम है- और न बीमार पर कोई गुनाह है और न ख़ुद तुम लोगो पर कि अपने घरों से खाना खाओ या अपने बाप दादा नाना बग़ैरह के घरों से या अपनी माँ दादी नानी वगैरह के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चचाओं के घरों से या अपनी फूफ़ियों के घरों से या अपने मामूओं के घरों से या अपनी खालाओं के घरों से या उस घर से जिसकी कुन्जियाँ तुम्हारे हाथ में है या अपने दोस्तों (के घरों) से इस में भी तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कि सब के सब मिलकर खाओ या अलग अलग फिर जब तुम घर वालों में जाने लगो (और वहाँ किसी का न पाओ) तो ख़ुद अपने ही ऊपर सलाम कर लिया करो जो ख़ुदा की तरफ से एक मुबारक पाक व पाकीज़ा तोहफा है- ख़ुदा यूँ (अपने) एहकाम तुमसे साफ साफ बयान करता है ताकि तुम समझो
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अनुवाद — अन-नूर 59

सूरा अन-नूर आयत 59 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और (ऐ ईमानदारों) जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें…

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Tuesday, August 18, 2026

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