अर-राद · 31/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
وَلَوْ أَنَّ قُرْآنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ أَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْأَرْضُ أَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَىٰ ۗ بَل لِّلَّهِ الْأَمْرُ جَمِيعًا ۗ أَفَلَمْ يَيْأَسِ الَّذِينَ آمَنُوا أَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا ۗ وَلَا يَزَالُ الَّذِينَ كَفَرُوا تُصِيبُهُم بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ أَوْ تَحُلُّ قَرِيبًا مِّن دَارِهِمْ حَتَّىٰ يَأْتِيَ وَعْدُ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ ۝٣١
Wa law anna Quraanan suyyirat bihil jibaalu aw qutti`at bihil ardu aw kullima bihil mawtaa; bal lillaahil amru jamee`aa; afalam yai`asil lazeena aamanooo al law yashaaa `ullaahu lahadan naasa jamee`aa; wa laa yazaalul lazeena kafaroo tuseebuhum bimaa sana`oo qaari`atun aw tahullu qareebam min daarihim hatta yaatiya wa`dul laah; innal laaha laa yukhliful mee`aad
📖 हिंदी अर्थ
और अगर कोई ऐसा क़ुरान (भी नाज़िल होता) जिसकी बरकत से पहाड़ (अपनी जगह) चल खड़े होते या उसकी वजह से ज़मीन (की मुसाफ़त (दूरी)) तय की जाती और उसकी बरकत से मुर्दे बोल उठते (तो भी ये लोग मानने वाले न थे) बल्कि सच यूँ है कि सब काम का एख्तेयार ख़ुदा ही को है तो क्या अभी तक ईमानदारों को चैन नहीं आया कि अगर ख़ुदा चाहता तो सब लोगों की हिदायत कर देता और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया उन पर उनकी करतूत की सज़ा में कोई (न कोई) मुसीबत पड़ती ही रहेगी या (उन पर पड़ी) तो उनके घरों के आस पास (ग़रज़) नाज़िल होगी (ज़रुर) यहाँ तक कि ख़ुदा का वायदा (फतेह मक्का) पूरा हो कर रहे और इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा हरगिज़ ख़िलाफ़े वायदा नहीं करता

🎧 सुनें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سُيِّرَتْ: हिलाई जाएं, स्थान से हटाई जाएं।
  • قُطِّعَتْ: फाड़ दी जाए, चीर दी जाए।
  • كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَى: मुर्दों से बात कराई जाए, अर्थात मुर्दे ज़िंदा होकर बोलें।
  • يَيْأَسِ: यहाँ अर्थ है 'जान लें' या 'निश्चित रूप से समझ लें'।
  • قَارِعَةٌ: वह मुसीबत या आफत जो अचानक आकर दस्तक दे, कड़ी सज़ा।
  • تَحُلُّ: उतरे, नाज़िल हो।
  • وَعْدُ اللّهِ: अल्लाह का वादा, यानी फतह और नुसरत का वादा।

तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन काफिरों का जवाब दे रहे हैं जो नबी ﷺ से माँग करते थे कि कोई ऐसा चमत्कार दिखाओ जो हमारी समझ में आए — जैसे पहाड़ हट जाएं, ज़मीन फट जाए, या मुर्दे ज़िंदा होकर बात करें। अल्लाह फ़रमाता है: अगर कोई किताब ऐसी होती जिसके पढ़ने से पहाड़ अपनी जगह से चल पड़ते, या ज़मीन चीरकर उसमें से नहरें फूट पड़तीं, या मुर्दे ज़िंदा होकर बोलने लगते — तो वह किताब यही क़ुरआन होती, क्योंकि यह अपनी दलील और अपने असर में सबसे बढ़कर है। लेकिन उनका दिल ही सख्त और झुठलाने वाला है, इसलिए वे कितनी भी निशानियाँ देख लें, ईमान नहीं लाएंगे।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: सारा मामला अल्लाह ही के हाथ में है — चाहे वह निशानियाँ दिखाए या न दिखाए, चाहे किसी को हिदायत दे या गुमराही में छोड़ दे। क्या ईमान वालों को यह बात मालूम नहीं कि अगर अल्लाह चाहता तो सारे इंसानों को बिना किसी निशानी के ईमान पर इकट्ठा कर देता? लेकिन उसकी हिकमत यह है कि लोग अपनी मर्जी और इख्तियार से राह पर आएं।

उसके बाद अल्लाह काफिरों को डराता है कि वे जो कुछ भी करते हैं — कुफ्र, ज़ुल्म, झुठलाना — उसकी सज़ा में उन पर मुसीबतें आती रहेंगी। कभी वे खुद मारे जाएंगे, कभी कैद होंगे, कभी उनके घरों के पास ही आफत उतरेगी, यहाँ तक कि अल्लाह का वादा आ जाए — यानी फतह और अल्लाह की मदद का वह वक़्त जो उसने अपने नबी ﷺ से किया था। और अल्लाह अपने वादे के खिलाफ़ कभी नहीं करता।


दावती पहलू:

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है। अल्लाह ने क़ुरआन को इतना बड़ा मौजिज़ा बनाया है कि अगर पहाड़ भी उसके सामने झुक सकते हैं, तो यह किताब हर दिल को नर्म करने की ताकत रखती है — बशर्ते दिल साफ हो। आज भी जो लोग सच्चे दिल से क़ुरआन पढ़ते हैं और उस पर अमल करते हैं, उनकी ज़िंदगी बदल जाती है। यह क़ुरआन वही चमत्कार है जो क़यामत तक ज़िंदा है। हमें चाहिए कि हम क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ने के लिए न रखें, बल्कि उसे अपनी ज़िंदगी में उतारें — तभी हमारे दिलों से अंधेरा दूर होगा और हमारी मुश्किलें हल होंगी। अल्लाह ने जो वादा किया है — मदद, फतह और हिदायत — वह ज़रूर पूरा होगा, बशर्ते हम उसकी राह पर चलें और उसके दीन की खिदमत करें।



📜 आयत 29-33 — अर-राद

29الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبَىٰ لَهُمْ وَحُسْنُ مَآبٍ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उनके वास्ते (बेहश्त में) तूबा (दरख्त) और ख़ुशहाली और अच्छा अन्जाम है
30كَذَٰلِكَ أَرْسَلْنَاكَ فِي أُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهَا أُمَمٌ لِّتَتْلُوَ عَلَيْهِمُ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمَٰنِ ۚ قُلْ هُوَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ مَتَابِ
(ऐ रसूल जिस तरह हमने और पैग़म्बर भेजे थे) उसी तरह हमने तुमको उस उम्मत में भेजा है जिससे पहले और भी बहुत सी उम्मते गुज़र चुकी हैं -ताकि तुम उनके सामने जो क़ुरान हमने वही के ज़रिए से तुम्हारे पास भेजा है उन्हें पढ़ कर सुना दो और ये लोग (कुछ तुम्हारे ही नहीं बल्कि सिरे से) ख़ुदा ही के मुन्किर हैं तुम कह दो कि वही मेरा परवरदिगार है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मै उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी तरफ रुज़ू करता हूँ
31وَلَوْ أَنَّ قُرْآنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ أَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْأَرْضُ أَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَىٰ ۗ بَل لِّلَّهِ الْأَمْرُ جَمِيعًا ۗ أَفَلَمْ يَيْأَسِ الَّذِينَ آمَنُوا أَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا ۗ وَلَا يَزَالُ الَّذِينَ كَفَرُوا تُصِيبُهُم بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ أَوْ تَحُلُّ قَرِيبًا مِّن دَارِهِمْ حَتَّىٰ يَأْتِيَ وَعْدُ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ
और अगर कोई ऐसा क़ुरान (भी नाज़िल होता) जिसकी बरकत से पहाड़ (अपनी जगह) चल खड़े होते या उसकी वजह से ज़मीन (की मुसाफ़त (दूरी)) तय की जाती और उसकी बरकत से मुर्दे बोल उठते (तो भी ये लोग मानने वाले न थे) बल्कि सच यूँ है कि सब काम का एख्तेयार ख़ुदा ही को है तो क्या अभी तक ईमानदारों को चैन नहीं आया कि अगर ख़ुदा चाहता तो सब लोगों की हिदायत कर देता और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया उन पर उनकी करतूत की सज़ा में कोई (न कोई) मुसीबत पड़ती ही रहेगी या (उन पर पड़ी) तो उनके घरों के आस पास (ग़रज़) नाज़िल होगी (ज़रुर) यहाँ तक कि ख़ुदा का वायदा (फतेह मक्का) पूरा हो कर रहे और इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा हरगिज़ ख़िलाफ़े वायदा नहीं करता
32وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَأَمْلَيْتُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी बहुतेरे पैग़म्बरों की हॅसी उड़ाई जा चुकी है तो मैने (चन्द रोज़) काफिरों को मोहलत दी फिर (आख़िर कार) हमने उन्हें ले डाला फिर (तू क्या पूछता है कि) हमारा अज़ाब कैसा था
33أَفَمَنْ هُوَ قَائِمٌ عَلَىٰ كُلِّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۗ وَجَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ قُلْ سَمُّوهُمْ ۚ أَمْ تُنَبِّئُونَهُ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي الْأَرْضِ أَم بِظَاهِرٍ مِّنَ الْقَوْلِ ۗ بَلْ زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا مَكْرُهُمْ وَصُدُّوا عَنِ السَّبِيلِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ
क्या जो (ख़ुदा) हर एक शख़्श के आमाल की ख़बर रखता है (उनको युं ही छोड़ देगा हरगिज़ नहीं) और उन लोगों ने ख़ुदा के (दूसरे दूसरे) शरीक ठहराए (ऐ रसूल तुम उनसे कह दो कि तुम आख़िर उनके नाम तो बताओं या तुम ख़ुदा को ऐसे शरीक़ो की ख़बर देते हो जिनको वह जानता तक नहीं कि वह ज़मीन में (किधर बसते) हैं या (निरी ऊपर से बातें बनाते हैं बल्कि (असल ये है कि) काफिरों को उनकी मक्कारियाँ भली दिखाई गई है और वह (गोया) राहे रास्त से रोक दिए गए हैं और जिस शख़्श को ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे तो उसका कोई हिदायत करने वाला नहीं
अर-रादकुरान सूची
43आयत
मदनीRevelation
31आयत

अनुवाद — अर-राद 31

सूरा अर-राद आयत 31 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर कोई ऐसा क़ुरान (भी नाज़िल होता) जिसकी बरकत…

सूरा आयत 31/43 — अर-राद الرعد (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अर-राद सुनें, अर-राद अनुवाद, अर-राद mp3, अर-राद pdf. आयत 29–33. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए