अर-राद · 30/43
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-राद
كَذَٰلِكَ أَرْسَلْنَاكَ فِي أُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهَا أُمَمٌ لِّتَتْلُوَ عَلَيْهِمُ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمَٰنِ ۚ قُلْ هُوَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ مَتَابِ ۝٣٠
Kazaalika arsalnaaka feee ummatin qad khalat min qablihaaa umamul litatluwa `alaihimul lazeee awhainaaa ilaika wa hum yakfuroona bir Rahmaaan; qul Huwa Rabbee laaa ilaaha illaa Huwa Rabbee laaa ilaaha illaa Huwa `alaihi tawakkaltu wa ilaihi mataab
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल जिस तरह हमने और पैग़म्बर भेजे थे) उसी तरह हमने तुमको उस उम्मत में भेजा है जिससे पहले और भी बहुत सी उम्मते गुज़र चुकी हैं -ताकि तुम उनके सामने जो क़ुरान हमने वही के ज़रिए से तुम्हारे पास भेजा है उन्हें पढ़ कर सुना दो और ये लोग (कुछ तुम्हारे ही नहीं बल्कि सिरे से) ख़ुदा ही के मुन्किर हैं तुम कह दो कि वही मेरा परवरदिगार है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मै उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी तरफ रुज़ू करता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَلَتْ – गुज़र चुकी हैं, बीत चुकी हैं।
  • لِتَتْلُوَ – ताकि तू पढ़कर सुनाए।
  • الرَّحْمَٰن – अत्यंत दयावान (अल्लाह का विशेष नाम)।
  • مَتَاب – रुजू करने की जगह, तौबा और पलटने का स्थान।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! जिस प्रकार हमने आपसे पहले अपने रसूलों को उनकी क़ौमों की ओर भेजा, ठीक उसी प्रकार हमने आपको भेजा है। आप एक ऐसी उम्मत (समुदाय) में आए हैं जिससे पहले भी कई उम्मतें गुज़र चुकी हैं। आपका मक़सद यह है कि आप उन्हें वह क़ुरआन पढ़कर सुनाएँ जो हमने आपकी ओर वह़्य (प्रकाशना) के रूप में उतारा है। यह क़ुरआन ही आपकी सच्चाई के लिए पर्याप्त प्रमाण है, लेकिन आपकी क़ौम का हाल यह है कि वे रहमान (अल्लाह) को नहीं मानते और उसके साथ दूसरों को साझीदार ठहराते हैं। वे उस परम दयावान का इनकार करते हैं, जिसकी रहमत हर चीज़ को घेरे हुए है।

ऐ नबी! आप उनसे कह दीजिए: "वही रहमान मेरा रब है, जिसे तुम मानने से इनकार करते हो। उसके अलावा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। मैंने उसी पर भरोसा किया है और उसी की ओर मेरी तौबा और रुजू है। मेरा पूरा भरोसा उसी पर है, मेरे सारे मामले उसी के हवाले हैं, और मेरी वापसी और पलटाव भी उसी की ओर है।"

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह ने अपने नबियों को भेजने की जो परंपरा शुरू की थी, उसी कड़ी में आख़िरी नबी ﷺ को भेजा, जिससे यह साबित होता है कि यह रिसालत (पैग़म्बरी) अल्लाह की ओर से है और पिछली रिसालतों की पुष्टि करती है।
  2. क़ुरआन की तिलावत (पढ़ना) और उसका संदेश लोगों तक पहुँचाना नबी का सबसे बड़ा कार्य था, और यही उम्मत का भी मिशन है — क़ुरआन को पढ़ना, समझना और दूसरों तक पहुँचाना।
  3. अल्लाह के नाम "रहमान" की विशेषता यह है कि उसकी रहमत असीमित है, और उसी की रहमत की ओर बुलाना ही इस्लाम का मूल संदेश है।
  4. मुश्किलों और विरोध के बावजूद नबी ﷺ का अल्लाह पर भरोसा और उसी की ओर रुजू करना हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण है — हमें हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और अपनी ग़लतियों पर तौबा करते रहना चाहिए।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई पर डटे रहना चाहिए, भले ही लोग इनकार करें; क्योंकि हमारा इनाम और हमारी पनाह अल्लाह के पास है, और उसी की ओर हमें लौटना है।


📜 आयत 28-32 — सूरा अर-राद

28الَّذِينَ آمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُم بِذِكْرِ اللَّهِ ۗ أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
और जिसने उसकी तरफ रुज़ू की उसे अपनी तरफ पहुँचने की राह दिखाता है (ये) वह लोग हैं जिन्होंने ईमान कुबूल किया और उनके दिलों को ख़ुदा की चाह से तसल्ली हुआ करती है
29الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبَىٰ لَهُمْ وَحُسْنُ مَآبٍ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उनके वास्ते (बेहश्त में) तूबा (दरख्त) और ख़ुशहाली और अच्छा अन्जाम है
30كَذَٰلِكَ أَرْسَلْنَاكَ فِي أُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهَا أُمَمٌ لِّتَتْلُوَ عَلَيْهِمُ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمَٰنِ ۚ قُلْ هُوَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ مَتَابِ
(ऐ रसूल जिस तरह हमने और पैग़म्बर भेजे थे) उसी तरह हमने तुमको उस उम्मत में भेजा है जिससे पहले और भी बहुत सी उम्मते गुज़र चुकी हैं -ताकि तुम उनके सामने जो क़ुरान हमने वही के ज़रिए से तुम्हारे पास भेजा है उन्हें पढ़ कर सुना दो और ये लोग (कुछ तुम्हारे ही नहीं बल्कि सिरे से) ख़ुदा ही के मुन्किर हैं तुम कह दो कि वही मेरा परवरदिगार है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मै उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी तरफ रुज़ू करता हूँ
31وَلَوْ أَنَّ قُرْآنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ أَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْأَرْضُ أَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَىٰ ۗ بَل لِّلَّهِ الْأَمْرُ جَمِيعًا ۗ أَفَلَمْ يَيْأَسِ الَّذِينَ آمَنُوا أَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا ۗ وَلَا يَزَالُ الَّذِينَ كَفَرُوا تُصِيبُهُم بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ أَوْ تَحُلُّ قَرِيبًا مِّن دَارِهِمْ حَتَّىٰ يَأْتِيَ وَعْدُ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ
और अगर कोई ऐसा क़ुरान (भी नाज़िल होता) जिसकी बरकत से पहाड़ (अपनी जगह) चल खड़े होते या उसकी वजह से ज़मीन (की मुसाफ़त (दूरी)) तय की जाती और उसकी बरकत से मुर्दे बोल उठते (तो भी ये लोग मानने वाले न थे) बल्कि सच यूँ है कि सब काम का एख्तेयार ख़ुदा ही को है तो क्या अभी तक ईमानदारों को चैन नहीं आया कि अगर ख़ुदा चाहता तो सब लोगों की हिदायत कर देता और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया उन पर उनकी करतूत की सज़ा में कोई (न कोई) मुसीबत पड़ती ही रहेगी या (उन पर पड़ी) तो उनके घरों के आस पास (ग़रज़) नाज़िल होगी (ज़रुर) यहाँ तक कि ख़ुदा का वायदा (फतेह मक्का) पूरा हो कर रहे और इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा हरगिज़ ख़िलाफ़े वायदा नहीं करता
32وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِّن قَبْلِكَ فَأَمْلَيْتُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ
और (ऐ रसूल) तुमसे पहले भी बहुतेरे पैग़म्बरों की हॅसी उड़ाई जा चुकी है तो मैने (चन्द रोज़) काफिरों को मोहलत दी फिर (आख़िर कार) हमने उन्हें ले डाला फिर (तू क्या पूछता है कि) हमारा अज़ाब कैसा था
अर-रादकुरान सूची
43आयत
मदनीअवतरण स्थान
30आयत

अनुवाद — अर-राद 30

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सूरा आयत 30/43 — सूरा अर-राद الرعد (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अर-राद सुनें, सूरा अर-राद अनुवाद, सूरा अर-राद mp3, सूरा अर-राद pdf. आयत 28–32. हिंदी अर्थ: اردو.





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Thursday, October 1, 2026

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