अन-नूर · 29/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
لَّيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ فِيهَا مَتَاعٌ لَّكُمْ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ ۝٢٩
Laisa `alaikum junaahun ann tadkhuloo buyootan ghaira maskoonatin feeha mataa`ul lakum; wallaahu ya`lamu maa tubdoona wa maa taktumoon
📖 हिंदी अर्थ
इसमें अलबत्ता तुम पर इल्ज़ाम नहीं कि ग़ैर आबाद मकानात में जिसमें तुम्हारा कोई असबाब हो (बे इजाज़त) चले जाओ और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हो और जो कुछ छिपाकर करते हो खुदा (सब कुछ) जानता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • जुनाह (جُنَاح): गुनाह, पाप, कोई दोष या पाबंदी।
  • गैर-मस्कूना (غَيْرَ مَسْكُونَةٍ): जो रहने के लिए न बनाई गई हों, जिनमें कोई न रहता हो।
  • मताअ (مَتَاع): सामान, फायदा, ज़रूरत की चीज़, उपयोग की वस्तु।
  • तुब्दून (تُبْدُونَ): जो तुम ज़ाहिर करते हो।
  • तकतुमून (تَكْتُمُونَ): जो तुम छिपाते हो।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को एक और आसानी और रहमत अता फ़रमा रहा है। पिछली आयत में घरों में दाखिल होने के लिए इजाज़त लेने का हुक्म दिया गया था, लेकिन यहाँ स्पष्ट किया जा रहा है कि यह पाबंदी उन घरों के लिए है जो किसी की रिहाइश के लिए मख़सूस हों। लेकिन अगर कोई घर या इमारत ऐसी हो जो किसी की रिहाइश के लिए न हो, बल्कि आम लोगों के इस्तेमाल के लिए हो—जैसे सरायें, मुसाफ़िरख़ाने, दुकानें, लाइब्रेरी, दफ़्तर, या ऐसी जगहें जहाँ लोग अपना सामान रखते हैं या किसी काम के लिए आते-जाते हैं—तो उनमें बगैर इजाज़त दाखिल होने में कोई गुनाह नहीं। क्योंकि इन जगहों पर इजाज़त लेने की ज़रूरत ही नहीं होती, और ऐसा करने में लोगों के लिए मशक्कत होती। यह अल्लाह की तरफ से एक सहूलत है ताकि लोग अपने कामों में आसानी महसूस करें।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि वह जानता है जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो। यानी तुम्हारे अंदरूनी इरादे, नीयतें, और हरकतें—सब कुछ अल्लाह के इल्म में है। अगर कोई शख्स इन आम जगहों में किसी बुरे इरादे से दाखिल होता है, या किसी की परदादारी (झाँकने) की नीयत से जाता है, या फसाद की गरज़ से, तो अल्लाह उसे जानता है और उसका हिसाब लेगा। यह एक तरफ़ तो मोमिनों के लिए खुशखबरी है कि उन्हें आसानी दी गई, और दूसरी तरफ उन लोगों के लिए चेतावनी है जो इस आज़ादी का गलत इस्तेमाल करना चाहें।

दावती पहलू:

यह आयत हमें इस्लाम की आसानी और हमदर्दी सिखाती है। अल्लाह तआला अपने बंदों पर सख्ती नहीं करता, बल्कि उनकी ज़रूरतों और मजबूरियों को देखते हुए नरमी और सहूलत अता फरमाता है। यही इस्लाम की रूह है—मुश्किलें पैदा करना नहीं, बल्कि आसानी देना। साथ ही यह भी सबक है कि हमारी ज़िंदगी का हर पहलू—चाहे वह ज़ाहिर हो या छिपा—अल्लाह की निगरानी में है। यह एहसास हमें सच्चाई, ईमानदारी और परहेज़गारी की तरफ ले जाता है। जब हमें यकीन हो कि अल्लाह हमारी नीयतों को जानता है, तो हम अपने अंदर सुधार लाते हैं और बुरे इरादों से बचते हैं। यही तक़वा है, और यही वह चीज़ है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी दिलाती है।



📜 आयत 27-31 — अन-नूर

27يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ بُيُوتِكُمْ حَتَّىٰ تَسْتَأْنِسُوا وَتُسَلِّمُوا عَلَىٰ أَهْلِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
और इज्ज़त की रोज़ी ऐ ईमानदारों अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में (दर्राना) न चले जाओ यहाँ तक कि उनसे इजाज़त ले लो और उन घरों के रहने वालों से साहब सलामत कर लो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
28فَإِن لَّمْ تَجِدُوا فِيهَا أَحَدًا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتَّىٰ يُؤْذَنَ لَكُمْ ۖ وَإِن قِيلَ لَكُمُ ارْجِعُوا فَارْجِعُوا ۖ هُوَ أَزْكَىٰ لَكُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ
(ये नसीहत इसलिए है) ताकि तुम याद रखो पस अगर तुम उन घरों में किसी को न पाओ तो तावाक़फियत कि तुम को (ख़ास तौर पर) इजाज़त न हासिल हो जाए उन में न जाओ और अगर तुम से कहा जाए कि फिर जाओ तो तुम (बे ताम्मुल) फिर जाओ यही तुम्हारे वास्ते ज्यादा सफाई की बात है और तुम जो कुछ भी करते हो ख़ुदा उससे खूब वाकिफ़ है
29لَّيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ فِيهَا مَتَاعٌ لَّكُمْ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ
इसमें अलबत्ता तुम पर इल्ज़ाम नहीं कि ग़ैर आबाद मकानात में जिसमें तुम्हारा कोई असबाब हो (बे इजाज़त) चले जाओ और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हो और जो कुछ छिपाकर करते हो खुदा (सब कुछ) जानता है
30قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ
(ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है
31وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ ۖ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آبَائِهِنَّ أَوْ آبَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَائِهِنَّ أَوْ أَبْنَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي أَخَوَاتِهِنَّ أَوْ نِسَائِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ أَوِ التَّابِعِينَ غَيْرِ أُولِي الْإِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ أَوِ الطِّفْلِ الَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا عَلَىٰ عَوْرَاتِ النِّسَاءِ ۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِن زِينَتِهِنَّ ۚ وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
और (ऐ रसूल) ईमानदार औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार (के मक़ामात) को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो (छुप न सकता हो) (उसका गुनाह नही) और अपनी ओढ़नियों को (घूँघट मारके) अपने गरेबानों (सीनों) पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने (क़िस्म की) औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या (घर के) नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर (बहुत बूढे होने की वजह से) औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या वह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा (किसी पर) अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार (झंकार वग़ैरह) की ख़बर हो जाए और ऐ ईमानदारों तुम सबके सब ख़ुदा की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ
अन-नूरकुरान सूची
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मदनीRevelation
29आयत

अनुवाद — अन-नूर 29

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Tuesday, August 18, 2026

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