अन-नूर · 30/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ ۝٣٠
Qul lilmu` mineena yaghuuddoo min absaarihim wa yahfazoo furoojahum; zaalika azkaa lahum; innallaaha khabeerum bimaa yasna`oon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है

🎧 सुनें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَغُضُّوا: अपनी आँखों को नीचा रखें, नज़रें झुकाएँ।
  • أَبْصَارِهِمْ: अपनी आँखों को।
  • فُرُوجَهُمْ: अपनी शर्मगाहों (गुप्त अंगों) की रक्षा करें।
  • أَزْكَى: अधिक पवित्र, अधिक शुद्ध और बेहतर।
  • خَبِيرٌ: पूरी तरह जानने वाला, हर चीज़ से अवगत।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप मोमिनों (ईमानवालों) से कह दें कि वे अपनी नज़रें झुकाए रखें, यानी जिन चीज़ों को देखना इस्लाम में जायज़ नहीं है—जैसे गैर-महरम (निकट संबंधी न होने वाली) महिलाओं की ओर देखना, दूसरों के गुप्त अंगों की ओर देखना, या किसी भी ऐसी चीज़ को देखना जो अल्लाह ने हराम किया है—उनसे अपनी आँखों को बचाएँ। और साथ ही, वे अपनी शर्मगाहों की भी रक्षा करें, यानी ज़िना (व्यभिचार), लिवात (समलैंगिक कृत्य), और गुप्त अंगों को खोलकर दिखाने जैसे सभी निषिद्ध कार्यों से दूर रहें।

यह आदेश केवल एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह दिल की पवित्रता और आत्मा की शुद्धि का ज़रिया है। जब इंसान अपनी नज़र को नियंत्रित करता है और अपनी शारीरिक इच्छाओं पर लगाम लगाता है, तो उसका दिल पापों के मैल से साफ़ रहता है, उसकी सोच शुद्ध रहती है, और उसका समाज पवित्र और सुरक्षित बनता है। यही वजह है कि अल्लाह ने फ़रमाया कि यह (नज़र झुकाना और शर्मगाह की रक्षा करना) उनके लिए अधिक पवित्र और बेहतर है।

इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाता है कि वह हर उस चीज़ से पूरी तरह वाक़िफ़ है जो लोग करते हैं। उससे कोई भी बात छिपी नहीं है—न आँखों की चोरी-छिपे नज़रें, न दिल के इरादे, न शरीर के कोई क्रियाकलाप। वह सब कुछ देखता और जानता है, और हर किसी को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि एक मोमिन की पहचान उसकी पवित्रता और संयम से होती है। जो व्यक्ति अपनी नज़र और अपने शरीर को हराम से बचाता है, वह अल्लाह के करीब होता है और उसकी ज़िंदगी में बरकत आती है। यह आदेश हमारे लिए एक ढाल है जो हमें दुनिया की बुराइयों और फितनों से बचाती है, और हमें उस पाक और साफ़ ज़िंदगी की ओर ले जाती है जो अल्लाह को पसंद है। आइए, हम इस आदेश पर अमल करें और अपने दिलों को गुनाहों से पाक रखें, ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।



📜 आयत 28-32 — अन-नूर

28فَإِن لَّمْ تَجِدُوا فِيهَا أَحَدًا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتَّىٰ يُؤْذَنَ لَكُمْ ۖ وَإِن قِيلَ لَكُمُ ارْجِعُوا فَارْجِعُوا ۖ هُوَ أَزْكَىٰ لَكُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ
(ये नसीहत इसलिए है) ताकि तुम याद रखो पस अगर तुम उन घरों में किसी को न पाओ तो तावाक़फियत कि तुम को (ख़ास तौर पर) इजाज़त न हासिल हो जाए उन में न जाओ और अगर तुम से कहा जाए कि फिर जाओ तो तुम (बे ताम्मुल) फिर जाओ यही तुम्हारे वास्ते ज्यादा सफाई की बात है और तुम जो कुछ भी करते हो ख़ुदा उससे खूब वाकिफ़ है
29لَّيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَدْخُلُوا بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍ فِيهَا مَتَاعٌ لَّكُمْ ۚ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ
इसमें अलबत्ता तुम पर इल्ज़ाम नहीं कि ग़ैर आबाद मकानात में जिसमें तुम्हारा कोई असबाब हो (बे इजाज़त) चले जाओ और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हो और जो कुछ छिपाकर करते हो खुदा (सब कुछ) जानता है
30قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ
(ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है
31وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ ۖ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آبَائِهِنَّ أَوْ آبَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَائِهِنَّ أَوْ أَبْنَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي أَخَوَاتِهِنَّ أَوْ نِسَائِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ أَوِ التَّابِعِينَ غَيْرِ أُولِي الْإِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ أَوِ الطِّفْلِ الَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا عَلَىٰ عَوْرَاتِ النِّسَاءِ ۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِن زِينَتِهِنَّ ۚ وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
और (ऐ रसूल) ईमानदार औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार (के मक़ामात) को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो (छुप न सकता हो) (उसका गुनाह नही) और अपनी ओढ़नियों को (घूँघट मारके) अपने गरेबानों (सीनों) पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने (क़िस्म की) औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या (घर के) नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर (बहुत बूढे होने की वजह से) औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या वह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा (किसी पर) अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार (झंकार वग़ैरह) की ख़बर हो जाए और ऐ ईमानदारों तुम सबके सब ख़ुदा की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ
32وَأَنكِحُوا الْأَيَامَىٰ مِنكُمْ وَالصَّالِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَائِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और अपनी (क़ौम की) बेशौहर औरतों और अपने नेक बख्त गुलामों और लौंडियों का निकाह कर दिया करो अगर ये लोग मोहताज होंगे तो खुदा अपने फज़ल व (करम) से उन्हें मालदार बना देगा और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ कार है
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीRevelation
30आयत

अनुवाद — अन-नूर 30

सूरा अन-नूर आयत 30 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को…

सूरा आयत 30/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 28–32. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए