अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- إِخْوَةٌ (इख्वा): भाई, यानी इस्लामी भाईचारा।
- فَأَصْلِحُوا (फ़अस्लिहू): सुधार करो, मेल-मिलाप कराओ।
- أَخَوَيْكُمْ (अख़वैकुम): तुम्हारे दो भाइयों के बीच (यानी दो विवादित पक्षों के बीच)।
- وَاتَّقُوا (वत्तक़ू): अल्लाह से डरो, उसकी नाराज़गी से बचो।
- تُرْحَمُونَ (तुरहमून): तुम पर रहम किया जाए।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत मुसलमानों के बीच भाईचारे की सबसे बड़ी शिक्षा देती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि सच्चे ईमान वाले आपस में भाई हैं—चाहे उनके रंग, नस्ल, देश या भाषा में कितना ही फ़र्क़ क्यों न हो। यह भाईचारा ख़ून के रिश्ते से नहीं, बल्कि ईमान और इस्लाम के रिश्ते से है, जो हर दौर में सबसे मज़बूत रिश्ता है।
जब दो मुसलमानों या दो गुटों के बीच झगड़ा हो जाए, तो अल्लाह हुक्म देता है कि दूसरे मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वे उनके बीच सुलह कराएँ। यह सिर्फ़ एक सलाह नहीं, बल्कि एक स्पष्ट आदेश है। सुलह कराने का मतलब है कि दोनों पक्षों को इंसाफ़ पर लाना, उनके दिलों से किन्नत और नफ़रत को दूर करना, और उन्हें भाईचारे की असली रूह की याद दिलाना।
इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है: "और अल्लाह से डरो, ताकि तुम पर रहम किया जाए।" यानी अगर तुम चाहते हो कि अल्लाह तुम पर रहम करे, उसकी रहमत तुम्हें ढाँप ले, और तुम्हें जहन्नुम से बचाकर जन्नत में दाख़िल करे, तो उसके हुक्मों पर चलो—ख़ासकर आपसी मेल-मिलाप और भाईचारे के हुक्म पर। अल्लाह की रहमत उन्हीं लोगों को मिलती है जो उसके डर से अपने नफ़्स को दबाते हैं, ग़ुस्से को पीते हैं, और दूसरों के साथ नर्मी और इंसाफ़ से पेश आते हैं।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में एकता और भाईचारा कितनी अहमियत रखता है। जब हम किसी मुसलमान से झगड़ते हैं या उससे नफ़रत रखते हैं, तो हम अपने ईमान के इसूलों से दूर हो जाते हैं। अल्लाह ने हमें एक उम्माह बनाया है, और हमारी ताक़त इसी एकता में है। अगर हम आपस में मिलकर रहें, एक-दूसरे की मदद करें, और झगड़ों को जल्दी ख़त्म करें, तो अल्लाह हम पर रहम करेगा और हमारे दुश्मन हम पर ग़ालिब नहीं आ सकते। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया में इज़्ज़त और आख़िरत में कामयाबी देता है। आओ, हम इस प्यारे भाईचारे को अपनाएँ, अपने दिलों से किन्नत को निकालें, और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।
📜 आयत 8-12 — अल-हुजुरात
अनुवाद — अल-हुजुरात 10
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Tuesday, August 18, 2026
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