अल-हुजुरात · 10/18
अनुवाद उच्चारण — अल-हुजुरात
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ۝١٠
Innamal mu`minoona ikhwatun fa aslihoo baina akhawaykum wattaqul laaha la`allakum tuhamoon
📖 हिंदी अर्थ
मोमिनीन तो आपस में बस भाई भाई हैं तो अपने दो भाईयों में मेल जोल करा दिया करो और ख़ुदा से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِخْوَةٌ (इख्वा): भाई, यानी इस्लामी भाईचारा।
  • فَأَصْلِحُوا (फ़अस्लिहू): सुधार करो, मेल-मिलाप कराओ।
  • أَخَوَيْكُمْ (अख़वैकुम): तुम्हारे दो भाइयों के बीच (यानी दो विवादित पक्षों के बीच)।
  • وَاتَّقُوا (वत्तक़ू): अल्लाह से डरो, उसकी नाराज़गी से बचो।
  • تُرْحَمُونَ (तुरहमून): तुम पर रहम किया जाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुसलमानों के बीच भाईचारे की सबसे बड़ी शिक्षा देती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि सच्चे ईमान वाले आपस में भाई हैं—चाहे उनके रंग, नस्ल, देश या भाषा में कितना ही फ़र्क़ क्यों न हो। यह भाईचारा ख़ून के रिश्ते से नहीं, बल्कि ईमान और इस्लाम के रिश्ते से है, जो हर दौर में सबसे मज़बूत रिश्ता है।

जब दो मुसलमानों या दो गुटों के बीच झगड़ा हो जाए, तो अल्लाह हुक्म देता है कि दूसरे मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वे उनके बीच सुलह कराएँ। यह सिर्फ़ एक सलाह नहीं, बल्कि एक स्पष्ट आदेश है। सुलह कराने का मतलब है कि दोनों पक्षों को इंसाफ़ पर लाना, उनके दिलों से किन्नत और नफ़रत को दूर करना, और उन्हें भाईचारे की असली रूह की याद दिलाना।

इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है: "और अल्लाह से डरो, ताकि तुम पर रहम किया जाए।" यानी अगर तुम चाहते हो कि अल्लाह तुम पर रहम करे, उसकी रहमत तुम्हें ढाँप ले, और तुम्हें जहन्नुम से बचाकर जन्नत में दाख़िल करे, तो उसके हुक्मों पर चलो—ख़ासकर आपसी मेल-मिलाप और भाईचारे के हुक्म पर। अल्लाह की रहमत उन्हीं लोगों को मिलती है जो उसके डर से अपने नफ़्स को दबाते हैं, ग़ुस्से को पीते हैं, और दूसरों के साथ नर्मी और इंसाफ़ से पेश आते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में एकता और भाईचारा कितनी अहमियत रखता है। जब हम किसी मुसलमान से झगड़ते हैं या उससे नफ़रत रखते हैं, तो हम अपने ईमान के इसूलों से दूर हो जाते हैं। अल्लाह ने हमें एक उम्माह बनाया है, और हमारी ताक़त इसी एकता में है। अगर हम आपस में मिलकर रहें, एक-दूसरे की मदद करें, और झगड़ों को जल्दी ख़त्म करें, तो अल्लाह हम पर रहम करेगा और हमारे दुश्मन हम पर ग़ालिब नहीं आ सकते। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया में इज़्ज़त और आख़िरत में कामयाबी देता है। आओ, हम इस प्यारे भाईचारे को अपनाएँ, अपने दिलों से किन्नत को निकालें, और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 8-12 — अल-हुजुरात

8فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَنِعْمَةً ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और ख़ुदा तो बड़ा वाक़िफ़कार और हिकमत वाला है
9وَإِن طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا ۖ فَإِن بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَىٰ فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
और अगर मोमिनीन में से दो फिरक़े आपस में लड़ पड़े तो उन दोनों में सुलह करा दो फिर अगर उनमें से एक (फ़रीक़) दूसरे पर ज्यादती करे तो जो (फिरक़ा) ज्यादती करे तुम (भी) उससे लड़ो यहाँ तक वह ख़ुदा के हुक्म की तरफ रूझू करे फिर जब रूजू करे तो फरीकैन में मसावात के साथ सुलह करा दो और इन्साफ़ से काम लो बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
10إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
मोमिनीन तो आपस में बस भाई भाई हैं तो अपने दो भाईयों में मेल जोल करा दिया करो और ख़ुदा से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाए
11يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ ۖ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
ऐ ईमानदारों (तुम किसी क़ौम का) कोई मर्द ( दूसरी क़ौम के मर्दों की हँसी न उड़ाये मुमकिन है कि वह लोग (ख़ुदा के नज़दीक) उनसे अच्छे हों और न औरते औरतों से (तमसख़ुर करें) क्या अजब है कि वह उनसे अच्छी हों और तुम आपस में एक दूसरे को मिलने न दो न एक दूसरे का बुरा नाम धरो ईमान लाने के बाद बदकारी (का) नाम ही बुरा है और जो लोग बाज़ न आएँ तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
12يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اجْتَنِبُوا كَثِيرًا مِّنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ
ऐ ईमानदारों बहुत से गुमान (बद) से बचे रहो क्यों कि बाज़ बदगुमानी गुनाह हैं और आपस में एक दूसरे के हाल की टोह में न रहा करो और न तुममें से एक दूसरे की ग़ीबत करे क्या तुममें से कोई इस बात को पसन्द करेगा कि अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाए तो तुम उससे (ज़रूर) नफरत करोगे और ख़ुदा से डरो, बेशक ख़ुदा बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
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Tuesday, August 18, 2026

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