अल-हुजुरात · 11/18
अनुवाद उच्चारण — अल-हुजुरात
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ ۖ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ۝١١
Yaaa ayyuhal lazeena aamanoo laa yaskhar qawmum min qawmin `asaaa anyyakoonoo khairam minhum wa laa nisaaa`um min nisaaa`in `Asaaa ay yakunna khairam minhunna wa laa talmizooo bil alqaab; bi`sal ismul fusooqu ba`dal eemaan; wa mal-lam yatub fa-ulaaa`ika humuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों (तुम किसी क़ौम का) कोई मर्द ( दूसरी क़ौम के मर्दों की हँसी न उड़ाये मुमकिन है कि वह लोग (ख़ुदा के नज़दीक) उनसे अच्छे हों और न औरते औरतों से (तमसख़ुर करें) क्या अजब है कि वह उनसे अच्छी हों और तुम आपस में एक दूसरे को मिलने न दो न एक दूसरे का बुरा नाम धरो ईमान लाने के बाद बदकारी (का) नाम ही बुरा है और जो लोग बाज़ न आएँ तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لا يَسْخَرْ: मज़ाक न उड़ाए, उपहास न करे
  • قَوْمٌ: लोगों का समूह (पुरुष)
  • عَسَى: संभावना है, आशा है
  • تَلْمِزُوا: एक-दूसरे को बुरा-भला न कहो, ऐब न निकालो
  • تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ: एक-दूसरे को बुरे नामों से न पुकारो
  • بِئْسَ الِاسْمُ: कितना बुरा नाम है
  • الفُسُوقُ: अवज्ञा, पाप, गुनाह
  • الظَّالِمُونَ: अत्याचारी, जो अपनी ही आत्मा पर ज़ुल्म करते हैं

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान लाने वालों! अल्लाह तआला तुम्हें एक बहुत ही अहम और प्यारी नसीहत दे रहा है। कोई मर्द किसी दूसरे मर्द का मज़ाक न उड़ाए, और न ही कोई औरत किसी दूसरी औरत का उपहास करे। क्योंकि हो सकता है कि जिसे तुम हँसी का पात्र बना रहे हो, वह अल्लाह के यहाँ तुमसे बेहतर हो। अल्लाह के नज़दीक इज़्ज़त का पैमाना दुनियावी रूप-रंग, माल-दौलत या नस्ल नहीं, बल्कि तक़वा और अच्छे आचरण हैं। तुम किसी को कमज़ोर, ग़रीब या साधारण देखकर उसका मज़ाक उड़ाते हो, लेकिन शायद वही अल्लाह का नेक बंदा हो और तुमसे कहीं बढ़कर हो।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: अपने भाइयों को बुरा-भला न कहो, उनके ऐब न तलाशो और न ही उन्हें बुरे नामों या उपनामों से पुकारो। जैसे किसी को उसके किसी गुनाह या कमज़ोरी की वजह से बुरे लफ़्ज़ों से याद करना। यह बहुत बुरी बात है कि ईमान लाने के बाद, जब तुम मुसलमान कहलाए, तो तुम्हारी पहचान फ़िस्क़ (गुनाह) से हो — यानी लोग तुम्हें मज़ाक उड़ाने वाला, ऐब निकालने वाला या बुरे नामों से पुकारने वाला जानें। यह ईमान के बिल्कुल ख़िलाफ़ है।

और जो शख्स इन कामों से तौबा नहीं करता, वह अपनी ही रूह पर ज़ुल्म करता है — क्योंकि वह अपने आपको अल्लाह की नाराज़गी और अज़ाब में डालता है। इसलिए ऐ मोमिनों! अपनी ज़बानों को क़ाबू में रखो, दूसरों की इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझो, और याद रखो कि अल्लाह के यहाँ सबसे प्यारा वही है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार और अच्छे अख़लाक़ वाला हो।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में मुसलमानों के आपसी रिश्ते भाईचारे, मुहब्बत और इज़्ज़त पर क़ायम हैं। जो शख्स इन आदाब को अपनाता है, वह अल्लाह की मुहब्बत और रसूल ﷺ की सुन्नत पर चलता है। और जो इनसे बचता है, उसके लिए अल्लाह ने तौबा का दरवाज़ा खुला रखा है — तौबा करो, अल्लाह बख़्शने वाला और रहम करने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 9-13 — अल-हुजुरात

9وَإِن طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا ۖ فَإِن بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَىٰ فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
और अगर मोमिनीन में से दो फिरक़े आपस में लड़ पड़े तो उन दोनों में सुलह करा दो फिर अगर उनमें से एक (फ़रीक़) दूसरे पर ज्यादती करे तो जो (फिरक़ा) ज्यादती करे तुम (भी) उससे लड़ो यहाँ तक वह ख़ुदा के हुक्म की तरफ रूझू करे फिर जब रूजू करे तो फरीकैन में मसावात के साथ सुलह करा दो और इन्साफ़ से काम लो बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
10إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
मोमिनीन तो आपस में बस भाई भाई हैं तो अपने दो भाईयों में मेल जोल करा दिया करो और ख़ुदा से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाए
11يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ ۖ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
ऐ ईमानदारों (तुम किसी क़ौम का) कोई मर्द ( दूसरी क़ौम के मर्दों की हँसी न उड़ाये मुमकिन है कि वह लोग (ख़ुदा के नज़दीक) उनसे अच्छे हों और न औरते औरतों से (तमसख़ुर करें) क्या अजब है कि वह उनसे अच्छी हों और तुम आपस में एक दूसरे को मिलने न दो न एक दूसरे का बुरा नाम धरो ईमान लाने के बाद बदकारी (का) नाम ही बुरा है और जो लोग बाज़ न आएँ तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं
12يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اجْتَنِبُوا كَثِيرًا مِّنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ
ऐ ईमानदारों बहुत से गुमान (बद) से बचे रहो क्यों कि बाज़ बदगुमानी गुनाह हैं और आपस में एक दूसरे के हाल की टोह में न रहा करो और न तुममें से एक दूसरे की ग़ीबत करे क्या तुममें से कोई इस बात को पसन्द करेगा कि अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाए तो तुम उससे (ज़रूर) नफरत करोगे और ख़ुदा से डरो, बेशक ख़ुदा बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
13يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और हम ही ने तुम्हारे कबीले और बिरादरियाँ बनायीं ताकि एक दूसरे की शिनाख्त करे इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा के नज़दीक तुम सबमें बड़ा इज्ज़तदार वही है जो बड़ा परहेज़गार हो बेशक ख़ुदा बड़ा वाक़िफ़कार ख़बरदार है
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अनुवाद — अल-हुजुरात 11

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Tuesday, August 18, 2026

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