अन-नूर · 34/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكُمْ آيَاتٍ مُّبَيِّنَاتٍ وَمَثَلًا مِّنَ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ ۝٣٤
Wa laqad anzalnaaa ilaikum Aayaatim mubaiyinaatinw wa masalam minnal lazeena khalaw min qablikum wa maw`izatal lilmuttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
और (ईमानदारों) हमने तो तुम्हारे पास (अपनी) वाज़ेए व रौशन आयतें और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनकी हालतें और परहेज़गारों के लिए नसीहत (की बाते) नाज़िल की

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • आयातिन मुबय्यिनातिन: स्पष्ट और खुली हुई आयतें जो सत्य को असत्य से अलग करती हैं।
  • मसलन: एक उदाहरण, नसीहत और सबक के लिए।
  • खलव: गुज़र चुके, बीत चुके।
  • मौ'इज़़ा: नसीहत, सीख और चेतावनी।
  • लिल्मुत्तक़ीन: उन लोगों के लिए जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी नाफ़रमानी से बचते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों पर अपनी बड़ी मेहरबानी और एहसान का ज़िक्र कर रहा है। वह फ़रमाता है: "ऐ लोगों! हमने तुम्हारी ओर ऐसी आयतें उतारी हैं जो बिल्कुल साफ़ और रौशन हैं, जिनमें हलाल और हराम, हुक्म और हदूद (सीमाएँ) सब कुछ खोलकर बयान कर दिया गया है। ये आयतें तुम्हें अंधेरों से निकालकर रौशनी की ओर लाती हैं।"

साथ ही, अल्लाह ने उन पिछली उम्मतों के हालात और क़िस्से भी बयान किए हैं जो हमसे पहले गुज़र चुकी हैं—उनमें से ईमान वालों के अंजाम और नाफ़रमानों के अंजाम को हमारे सामने रखा है। यह एक मिसाल और सबक़ है कि जिसने अल्लाह की इताअत की उसे कैसी इज़्ज़त मिली, और जिसने नाफ़रमानी की उसे कैसी सज़ा मिली। यह सब कुछ हमारी हिदायत के लिए है।

और फिर अल्लाह फ़रमाता है कि यह किताब "मौ'इज़़ा" है—यानी नसीहत और चेतावनी—उन लोगों के लिए जो अल्लाह से डरते हैं, उसके अज़ाब से बचना चाहते हैं, और अपने रब के हुक्मों को मानकर उसकी मनाही से रुकते हैं। यह नसीहत दिल को जगाती है, आँखों को खोलती है और इंसान को सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ देती है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बताती है कि क़ुरआन महज़ एक किताब नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से हमारे लिए एक पूरा "रहनुमा" है। इसमें हमारे लिए रौशनी है, हमारे लिए सबक़ है, और हमारे लिए ज़िंदगी की हर मुश्किल का हल है। जो शख्स इस किताब को पकड़ लेता है, वह कभी गुमराह नहीं हो सकता। अल्लाह ने हम पर यह बड़ा एहसान किया है कि हमें ऐसी किताब दी जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई सिखाती है। हमें चाहिए कि इस किताब को सिर्फ़ पढ़ें ही नहीं, बल्कि समझें, उस पर अमल करें, और उसे अपनी ज़िंदगी का नक्शा बनाएँ। यही हमारी कामयाबी की कुंजी है। अल्लाह हमें अपनी किताब पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 32-36 — अन-नूर

32وَأَنكِحُوا الْأَيَامَىٰ مِنكُمْ وَالصَّالِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَائِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और अपनी (क़ौम की) बेशौहर औरतों और अपने नेक बख्त गुलामों और लौंडियों का निकाह कर दिया करो अगर ये लोग मोहताज होंगे तो खुदा अपने फज़ल व (करम) से उन्हें मालदार बना देगा और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ कार है
33وَلْيَسْتَعْفِفِ الَّذِينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتَّىٰ يُغْنِيَهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ ۗ وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًا ۖ وَآتُوهُم مِّن مَّالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ ۚ وَلَا تُكْرِهُوا فَتَيَاتِكُمْ عَلَى الْبِغَاءِ إِنْ أَرَدْنَ تَحَصُّنًا لِّتَبْتَغُوا عَرَضَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَمَن يُكْرِههُّنَّ فَإِنَّ اللَّهَ مِن بَعْدِ إِكْرَاهِهِنَّ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और जो लोग निकाह करने का मक़दूर नहीं रखते उनको चाहिए कि पाक दामिनी एख्तियार करें यहाँ तक कि ख़ुदा उनको अपने फज़ल व (करम) से मालदार बना दे और तुम्हारी लौन्डी ग़ुलामों में से जो मकातबत होने (कुछ रुपए की शर्त पर आज़ादी का सरख़त लेने) की ख्वाहिश करें तो तुम अगर उनमें कुछ सलाहियत देखो तो उनको मकातिब कर दो और ख़ुदा के माल से जो उसने तुम्हें अता किया है उनका भी दो और तुम्हारी लौन्डियाँ जो पाक दामन ही रहना चाहती हैं उनको दुनियावी ज़िन्दगी के फायदे हासिल करने की ग़रज़ से हराम कारी पर मजबूर न करो और जो शख्स उनको मजबूर करेगा तो इसमें शक नहीं कि ख़ुदा उसकी बेबसी के बाद बड़ा बख्शने वाले मेहरबान है
34وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكُمْ آيَاتٍ مُّبَيِّنَاتٍ وَمَثَلًا مِّنَ الَّذِينَ خَلَوْا مِن قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ
और (ईमानदारों) हमने तो तुम्हारे पास (अपनी) वाज़ेए व रौशन आयतें और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनकी हालतें और परहेज़गारों के लिए नसीहत (की बाते) नाज़िल की
35۞ اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ مَثَلُ نُورِهِ كَمِشْكَاةٍ فِيهَا مِصْبَاحٌ ۖ الْمِصْبَاحُ فِي زُجَاجَةٍ ۖ الزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌ دُرِّيٌّ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٍ مُّبَارَكَةٍ زَيْتُونَةٍ لَّا شَرْقِيَّةٍ وَلَا غَرْبِيَّةٍ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِيءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌ ۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٍ ۗ يَهْدِي اللَّهُ لِنُورِهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ ۗ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा तो सारे आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल (ऐसी) है जैसे एक ताक़ (सीना) है जिसमे एक रौशन चिराग़ (इल्मे शरीयत) हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील (दिल) में हो (और) क़न्दील (अपनी तड़प में) गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा (वह चिराग़) जैतून के मुबारक दरख्त (के तेल) से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ हो और न पश्चिम की तरफ (बल्कि बीचों बीच मैदान में) उसका तेल (ऐसा) शफ्फाफ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नही ताहम ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा (ग़रज़ एक नूर नहीं बल्कि) नूर आला नूर (नूर की नूर पर जोत पड़ रही है) ख़ुदा अपने नूर की तरफ जिसे चाहता है हिदायत करता है और ख़ुदा तो हर चीज़ से खूब वाक़िफ है
36فِي بُيُوتٍ أَذِنَ اللَّهُ أَن تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا اسْمُهُ يُسَبِّحُ لَهُ فِيهَا بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ
(वह क़न्दील) उन घरों में रौशन है जिनकी निस्बत ख़ुदा ने हुक्म दिया कि उनकी ताज़ीम की जाए और उनमें उसका नाम लिया जाए जिनमें सुबह व शाम वह लोग उसकी तस्बीह किया करते हैं
अन-नूरकुरान सूची
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34आयत

अनुवाद — अन-नूर 34

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Tuesday, August 18, 2026

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