अत-तौबा · 11/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
فَإِن تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ ۗ وَنُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ ۝١١
Fa in taaboo wa aqaamus Salaata wa aatawuz Zakaata fa ikhwaanukum fid deen; wa nufassilul Aayaati liqawminy ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
तो अगर (अभी मुशरिक से) तौबा करें और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी भाई हैं और हम अपनी आयतों को वाक़िफकार लोगों के वास्ते तफ़सीलन बयान करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَابُوا: तौबा कर लें, शिर्क (बहुदेववाद) से बाज़ आ जाएँ।
  • أَقَامُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके नियमों और शर्तों के साथ स्थापित करें।
  • آتَوُا الزَّكَاةَ: ज़कात दें, यानी अपने माल का निर्धारित हिस्सा अदा करें।
  • إِخْوَانُكُمْ: तुम्हारे भाई (धार्मिक भाईचारे में)।
  • نُفَصِّلُ: हम विस्तार से बयान करते हैं, स्पष्ट करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुशरिकों (बहुदेववादियों) के संबंध में है, जिनसे युद्ध का आदेश दिया गया था। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यदि ये लोग अपने शिर्क और कुफ्र से तौबा कर लें, एकेश्वरवाद (तौहीद) की गवाही दे दें, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात अदा करें, तो वे तुम्हारे धार्मिक भाई बन जाएँगे। उनके लिए वही अधिकार होंगे जो तुम्हारे लिए हैं, और उन पर वही ज़िम्मेदारियाँ होंगी जो तुम पर हैं। उनका इस्लाम लाना उनके ख़ून, माल और इज़्ज़त को महफ़ूज़ (सुरक्षित) कर देगा, और उनसे लड़ना जायज़ नहीं रहेगा। अल्लाह अपनी आयतों को उन लोगों के लिए स्पष्ट रूप से बयान करता है जो समझते और सीखते हैं, क्योंकि वही लोग इनसे लाभ उठाते हैं और दूसरों तक पहुँचाते हैं।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. इस्लाम दया और भाईचारे का दीन है — जैसे ही कोई शिर्क छोड़कर तौहीद अपनाता है, वह मुसलमानों का भाई बन जाता है, चाहे उसका अतीत कैसा भी रहा हो।
  2. नमाज़ और ज़कात इस्लाम के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं — इनके बिना ईमान का दावा अधूरा है। नमाज़ अल्लाह से रिश्ता जोड़ती है और ज़कात बंदों से।
  3. इस्लाम में इंसान की जान, माल और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त का पूरा इंतज़ाम है — यह एक पवित्र और अमन-पसंद दीन है।
  4. अल्लाह अपनी आयतें उन्हीं के लिए स्पष्ट करता है जो ज्ञान रखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं — यह हमें सीखने और समझने की तरग़ीब देता है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि किसी को भी इस्लाम में शामिल होने का मौक़ा देना चाहिए, और उसके अच्छे कर्मों (नमाज़, ज़कात) को देखकर उसे अपना भाई मानना चाहिए।


📜 आयत 9-13 — सूरा अत-तौबा

9اشْتَرَوْا بِآيَاتِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَصَدُّوا عَن سَبِيلِهِ ۚ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनियावी फायदे) हासिल करके (लोगों को) उसकी राह से रोक दिया बेशक ये लोग जो कुछ करते हैं ये बहुत ही बुरा है
10لَا يَرْقُبُونَ فِي مُؤْمِنٍ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُعْتَدُونَ
ये लोग किसी मोमिन के बारे में न तो रिश्ता नाता ही कर लिहाज़ करते हैं और न क़ौल का क़रार का और (वाक़ई) यही लोग ज्यादती करते हैं
11فَإِن تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ ۗ وَنُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
तो अगर (अभी मुशरिक से) तौबा करें और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी भाई हैं और हम अपनी आयतों को वाक़िफकार लोगों के वास्ते तफ़सीलन बयान करते हैं
12وَإِن نَّكَثُوا أَيْمَانَهُم مِّن بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا فِي دِينِكُمْ فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ ۙ إِنَّهُمْ لَا أَيْمَانَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنتَهُونَ
और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के सरवर आवारा लोगों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें का हरगिज़ कोई एतबार नहीं ताकि ये लोग (अपनी शरारत से) बाज़ आएँ
13أَلَا تُقَاتِلُونَ قَوْمًا نَّكَثُوا أَيْمَانَهُمْ وَهَمُّوا بِإِخْرَاجِ الرَّسُولِ وَهُم بَدَءُوكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۚ أَتَخْشَوْنَهُمْ ۚ فَاللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَوْهُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
(मुसलमानों) भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला और रसूल को निकाल बाहर करना (अपने दिल में) ठान लिया था और तुमसे पहले छेड़ भी उन्होनें ही शुरू की थी क्या तुम उनसे डरते हो तो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा उनसे कहीं बढ़ कर तुम्हारे डरने के क़ाबिल है
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
11आयत

अनुवाद — अत-तौबा 11

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Tuesday, September 29, 2026

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