अत-तौबा · 10/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
لَا يَرْقُبُونَ فِي مُؤْمِنٍ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُعْتَدُونَ ۝١٠
Laa yarquboona fee mu`minin illanw wa laa zimmah wa ulaaa `ika humulmu `tadoon
📖 हिंदी अर्थ
ये लोग किसी मोमिन के बारे में न तो रिश्ता नाता ही कर लिहाज़ करते हैं और न क़ौल का क़रार का और (वाक़ई) यही लोग ज्यादती करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَرْقُبُونَ – वे ध्यान नहीं रखते, नहीं देखते, परवाह नहीं करते।
  • إِلًّا – रिश्तेदारी, नातेदारी, या कोई सम्बन्ध।
  • ذِمَّةً – वचन, अहद, सुरक्षा का वादा, या कोई संधि।
  • الْمُعْتَدُونَ – हद से बढ़ने वाले, अत्याचारी, जो सीमा का उल्लंघन करते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के चरित्र को उजागर करती है जिन्होंने मुसलमानों से की गई संधियों और वादों को तोड़ दिया था। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये लोग किसी भी मोमिन (ईमानवाले) के मामले में न तो किसी रिश्तेदारी का लिहाज़ करते हैं और न ही किसी वचन या अहद का। उनके दिलों में ईमानवालों के प्रति सख्त दुश्मनी और बैर भरा हुआ है।

जब उन्हें किसी मोमिन पर काबू पाने का मौका मिलता है, तो वे न तो अल्लाह का ख़ौफ़ खाते हैं, न रिश्तेदारी का ख्याल करते हैं, और न ही किसी संधि या वादे की परवाह करते हैं। वे अपने स्वार्थ और दुश्मनी की वजह से हर हद से गुज़र जाते हैं। यही लोग असली हद से बढ़ने वाले और अत्याचारी हैं, क्योंकि वे अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, दूसरों के हक़ों को रौंदते हैं, और अपने वादों को तोड़ने में कोई झिझक महसूस नहीं करते।

इस आयत में मोमिनों को यह सबक़ दिया गया है कि जब ये लोग खुद किसी रिश्ते या वचन की कद्र नहीं करते, तो उनके साथ नरमी और रियायत का कोई मतलब नहीं। मोमिनों को चाहिए कि वे अपने धर्म और अपनी सुरक्षा के लिए सख्ती से पेश आएँ, क्योंकि दुश्मन पर दया करना उसके अत्याचार को बढ़ावा देना है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. वचन और रिश्तों की अहमियत: इस्लाम में वादे को पूरा करना और रिश्तेदारी का ख्याल रखना बहुत बड़ी नेकी है, लेकिन जब दूसरा पक्ष इन्हें तोड़ता है और अत्याचार करता है, तो उसके साथ सख्ती करना भी ज़रूरी हो जाता है।
  2. हद से बढ़ने वालों की पहचान: अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि असली अत्याचारी वही हैं जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं और दूसरों के हक़ों को नष्ट करते हैं। यह पहचान हमें सही रास्ते पर चलने में मदद देती है।
  3. मोमिन की इज़्ज़त: यह आयत बताती है कि एक मोमिन की इज़्ज़त और सुरक्षा इस्लाम में कितनी अहम है। जो लोग मोमिनों के साथ बुरा सलूक करते हैं, वे अल्लाह की नज़र में सख्त गुनाहगार हैं।
  4. हिकमत (समझदारी) से काम लेना: इस्लाम सिखाता है कि हर हाल में नरमी नहीं बरतनी चाहिए; कभी-कभी सख्ती ही सही रास्ता होती है, खासकर जब दुश्मन अपनी दुश्मनी पर अड़ा हो। यह हमें ज़िंदगी के हर मामले में समझदारी से फ़ैसला करने की तालीम देता है।
  5. अल्लाह पर भरोसा: जब हम देखते हैं कि दुश्मन हर हद से गुज़र रहा है, तो हमें अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए कि वही अत्याचारियों को सज़ा देने वाला है, और हमें अपने फ़र्ज़ पर क़ायम रहना चाहिए।


📜 आयत 8-12 — सूरा अत-तौबा

8كَيْفَ وَإِن يَظْهَرُوا عَلَيْكُمْ لَا يَرْقُبُوا فِيكُمْ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً ۚ يُرْضُونَكُم بِأَفْوَاهِهِمْ وَتَأْبَىٰ قُلُوبُهُمْ وَأَكْثَرُهُمْ فَاسِقُونَ
(उनका एहद) क्योंकर (रह सकता है) जब (उनकी ये हालत है) कि अगर तुम पर ग़लबा पा जाएं तो तुम्हारे में न तो रिश्ते नाते ही का लिहाज़ करेगें और न अपने क़ौल व क़रार का ये लोग तुम्हें अपनी ज़बानी (जमा खर्च में) खुश कर देते हैं हालॉकि उनके दिल नहीं मानते और उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं
9اشْتَرَوْا بِآيَاتِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَصَدُّوا عَن سَبِيلِهِ ۚ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनियावी फायदे) हासिल करके (लोगों को) उसकी राह से रोक दिया बेशक ये लोग जो कुछ करते हैं ये बहुत ही बुरा है
10لَا يَرْقُبُونَ فِي مُؤْمِنٍ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُعْتَدُونَ
ये लोग किसी मोमिन के बारे में न तो रिश्ता नाता ही कर लिहाज़ करते हैं और न क़ौल का क़रार का और (वाक़ई) यही लोग ज्यादती करते हैं
11فَإِن تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ ۗ وَنُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
तो अगर (अभी मुशरिक से) तौबा करें और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी भाई हैं और हम अपनी आयतों को वाक़िफकार लोगों के वास्ते तफ़सीलन बयान करते हैं
12وَإِن نَّكَثُوا أَيْمَانَهُم مِّن بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا فِي دِينِكُمْ فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ ۙ إِنَّهُمْ لَا أَيْمَانَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنتَهُونَ
और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के सरवर आवारा लोगों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें का हरगिज़ कोई एतबार नहीं ताकि ये लोग (अपनी शरारत से) बाज़ आएँ
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
10आयत

अनुवाद — अत-तौबा 10

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Wednesday, September 30, 2026

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