Illal lazeena yasiloona ilaa qawmim binakum wa bainahum meesaaqun aw jaaa`ookum hasirat sudooruhum ai yuqaatilookum aw yuqaatiloo qawmahum, wa law shaaa`al laahu lasallatahum `alaikum falaqaatalookum; fa ini` tazalookum falam yuqaatilookum wa alqaw ilaikumus salama famaa ja`alal laahu lakum `alaihim sabeelaa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें (सुलह का) एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों (तो उन्हें आज़ार न पहुंचाओ) और अगर ख़ुदा चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते पस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुंचाने की ख़ुदा ने कोई सबील नहीं निकाली
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
مگر جو لوگ ایسے لوگوں سے جا ملے ہوں جن میں اور تم میں (صلح کا) عہد ہو یا اس حال میں کہ ان کے دل تمہارے ساتھ یا اپنی قوم کے ساتھ لڑنے سے رک گئے ہوں تمہارے پاس آجائیں (تو احتراز ضروری نہیں) اور اگر خدا چاہتا تو ان کو تم پر غالب کردیتا تو وہ تم سے ضرور لڑتے پھر اگر وہ تم سے (جنگ کرنے سے) کنارہ کشی کریں اور لڑیں نہیں اور تمہاری طرف صلح (کا پیغام) بھیجیں تو خدا نے تمہارے لئے ان پر (زبردستی کرنے کی) کوئی سبیل مقرر نہیں کی
मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें (सुलह का) एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों (तो उन्हें आज़ार न पहुंचाओ) और अगर ख़ुदा चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते पस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुंचाने की ख़ुदा ने कोई सबील नहीं निकाली
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
يَصِلُونَ: जुड़ने वाले, संबंध बनाने वाले या शरण लेने वाले।
مِيثَاقٌ: संधि, समझौता, अहद।
حَصِرَتْ صُدُورُهُمْ: उनके सीने तंग हो गए, यानी उनके दिलों में किसी से लड़ने की इच्छा नहीं रही।
السَّلَمَ: सुलह, आत्मसमर्पण, शांति।
سَبِيلًا: रास्ता, कोई मार्ग (यहाँ अर्थ: लड़ने या पकड़ने का कोई अधिकार या रास्ता)।
तफसीर:
इस आयत में अल्लाह तआला ने उन लोगों को माफ़ी और छूट दी है जो कुछ खास हालात में मुसलमानों से लड़ने वालों में शामिल नहीं हैं। पहली श्रेणी उन लोगों की है जो किसी ऐसे क़बीले या गिरोह से जुड़ जाएं या उनकी पनाह ले लें, जिनके और मुसलमानों के बीच संधि या अहद हो। ऐसे लोगों से लड़ना जायज़ नहीं, क्योंकि वे उस संधि के दायरे में आ गए हैं।
दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जो मुसलमानों के पास इस हालत में आएं कि उनके दिल तंग हो गए हों — यानी वे न तो मुसलमानों से लड़ना चाहते हैं और न ही अपनी क़ौम (काफ़िरों) के साथ मिलकर लड़ना चाहते हैं। वे बिल्कुल तटस्थ (निष्पक्ष) होकर आए हों। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर अल्लाह चाहता तो उन्हें तुम पर हावी कर देता और वे तुमसे लड़ते, लेकिन अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उन्हें तुमसे रोक दिया। इसलिए जब वे तुमसे अलग रहें, तुमसे न लड़ें और तुम्हारी तरफ सुलह और आत्मसमर्पण का हाथ बढ़ाएं, तो अल्लाह ने तुम्हें उनके खिलाफ कोई रास्ता (लड़ने या पकड़ने का अधिकार) नहीं दिया है।
फ़ायदे:
इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम शांति और सुलह को बहुत अहमियत देता है। जब तक दुश्मन लड़ने पर आमादा न हो, मुसलमानों को जंग छेड़ने की इजाज़त नहीं।
अल्लाह तआला की रहमत का यह तरीक़ा है कि वह बंदों के बीच लड़ाई-झगड़े के रास्ते बंद करता है और सुलह के ज़रिए उन्हें एक-दूसरे के करीब लाता है।
मुसलमानों को सिखाया गया है कि जो लोग तटस्थ रहें या सुलह की पेशकश करें, उनके साथ नरमी और इंसाफ़ से पेश आना चाहिए, न कि उन्हें नुकसान पहुंचाना चाहिए।
यह आयत हमें सिखाती है कि हालात के हिसाब से फ़ैसले लेने चाहिए — कुछ लोग दुश्मन होते हैं, कुछ बेज़ार होते हैं, और कुछ सुलह चाहते हैं। हर हालात में उचित रवैया अपनाना चाहिए।
अल्लाह की क़ुदरत का एहसास होता है कि वह दिलों को बदलने और दुश्मनों को दोस्त बनाने पर पूरी ताक़त रखता है। इसलिए मुसलमान को हमेशा अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
(मुसलमानों) फिर तुमको क्या हो गया है कि तुम मुनाफ़िक़ों के बारे में दो फ़रीक़ हो गए हो (एक मुवाफ़िक़ एक मुख़ालिफ़) हालॉकि ख़ुद ख़ुदा ने उनके करतूतों की बदौलत उनकी अक्लों को उलट पुलट दिया है क्या तुम ये चाहते हो कि जिसको ख़ुदा ने गुमराही में छोड़ दिया है तुम उसे राहे रास्त पर ले आओ हालॉकि ख़ुदा ने जिसको गुमराही में छोड़ दिया है उसके लिए तुममें से कोई शख्स रास्ता निकाल ही नहीं सकता
उन लोगों की ख्वाहिश तो ये है कि जिस तरह वह काफ़िर हो गए तुम भी काफ़िर हो जाओ ताकि तुम उनके बराबर हो जाओ पस जब तक वह ख़ुदा की राह में हिजरत न करें तो उनमें से किसी को दोस्त न बनाओ फिर अगर वह उससे भी मुंह मोड़ें तो उन्हें गिरफ्तार करो और जहॉ पाओ उनको क़त्ल करो और उनमें से किसी को न अपना दोस्त बनाओ न मददगार
मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें (सुलह का) एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों (तो उन्हें आज़ार न पहुंचाओ) और अगर ख़ुदा चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते पस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुंचाने की ख़ुदा ने कोई सबील नहीं निकाली
अनक़रीब तुम कुछ ऐसे और लोगों को भी पाओगे जो चाहते हैं कि तुमसे भी अमन में रहें और अपनी क़ौम से भी अमन में रहें (मगर) जब कभी झगड़े की तरफ़ बुलाए गए तो उसमें औंधे मुंह के बल गिर पड़े पस अगर वह तुमसे न किनारा कशी करें और न तुम्हें सुलह का पैग़ाम दें और न लड़ाई से अपने हाथ रोकें पस उनको पकड़ों और जहॉ पाओ उनको क़त्ल करो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें सरीही ग़लबा अता फ़रमाया
और किसी ईमानदार को ये जायज़ नहीं कि किसी मोमिन को जान से मार डाले मगर धोखे से (क़त्ल किया हो तो दूसरी बात है) और जो शख्स किसी मोमिन को धोखे से (भी) मार डाले तो (उसपर) एक ईमानदार गुलाम का आज़ाद करना और मक़तूल के क़राबतदारों को खूंन बहा देना (लाज़िम) है मगर जब वह लोग माफ़ करें फिर अगर मक़तूल उन लोगों में से हो वह जो तुम्हारे दुशमन (काफ़िर हरबी) हैं और ख़ुद क़ातिल मोमिन है तो (सिर्फ) एक मुसलमान ग़ुलाम का आज़ाद करना और अगर मक़तूल उन (काफ़िर) लोगों में का हो जिनसे तुम से एहद व पैमान हो चुका है तो (क़ातिल पर) वारिसे मक़तूल को ख़ून बहा देना और एक बन्दए मोमिन का आज़ाद करना (वाजिब) है फ़िर जो शख्स (ग़ुलाम आज़ाद करने को) न पाये तो उसका कुफ्फ़ारा ख़ुदा की तरफ़ से लगातार दो महीने के रोज़े हैं और ख़ुदा ख़ूब वाकिफ़कार (और) हिकमत वाला है
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