अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- وَدُّوا: उन्होंने चाहा / कामना की
- تَكْفُرُونَ: तुम कुफ्र करो (इनकार करो)
- سَوَاءً: बराबर / एक समान
- أَوْلِيَاءَ: मित्र / सहायक / संरक्षक
- يُهَاجِرُوا: हिजरत करें (प्रवास करें)
- تَوَلَّوْا: मुँह मोड़ें / विमुख हों
- فَخُذُوهُمْ: उन्हें पकड़ लो
- وَلِيًّا: मित्र / संरक्षक
- نَصِيرًا: सहायक / मददगार
तफसीर:
यह आयत मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है, जो दिल में कुफ्र रखते हैं और ज़ुबान से ईमान का दावा करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये मुनाफ़िक़ीन दिल से चाहते हैं कि तुम भी उनकी तरह कुफ्र करो और ईमान से इनकार करो, ताकि तुम सब कुफ्र में बराबर हो जाओ। यानी उन्हें यह बुरा लगता है कि तुम ईमान वाले हो और वे कुफ्र पर हैं, इसलिए वे चाहते हैं कि तुम भी उनके रास्ते पर चलो।
अल्लाह तआला मुसलमानों को साफ़ हिदायत देता है कि ऐसे लोगों को अपना मित्र और सहायक न बनाओ, जब तक कि वे अल्लाह के रास्ते में हिजरत न करें। हिजरत उनके ईमान की सच्चाई की निशानी है — यानी वे अपने घर-बार, रिश्तेदारों और वतन को छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तरफ न आएँ। अगर वे ऐसा करते हैं, तो यह उनके ईमान का सबूत है।
लेकिन अगर वे इस हिदायत से मुँह मोड़ते हैं और अपने कुफ्र और दुश्मनी पर क़ायम रहते हैं, तो अल्लाह तआला हुक्म देता है कि उन्हें जहाँ कहीं भी पाओ, पकड़ लो और क़त्ल कर दो। यह उन लोगों के बारे में है जो मुसलमानों के खिलाफ़ जंग करते हैं और उन्हें नुक़्सान पहुँचाते हैं। और अल्लाह तआला साफ़ फ़रमाता है कि ऐसे लोगों में से किसी को भी अपना मित्र या मददगार न बनाओ।
यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि ईमान की मुहब्बत और कुफ्र से बेज़ारी (बराअत) ही असली ईमान की निशानी है। एक मुसलमान उन लोगों से मुहब्बत नहीं रख सकता जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के दुश्मन हैं। यह दीन की वफ़ादारी और सच्चे ईमान का तक़ाज़ा है।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान की राह साफ़ और सीधी है — अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुहब्बत, और उनके दुश्मनों से बेज़ारी। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ आते हैं, उनके लिए जन्नत और खुशियाँ हैं। अल्लाह तआला हमें सिखाता है कि हम अपने दीन पर क़ायम रहें, किसी भी हालत में कुफ्र और बुराई की तरफ न झुकें। यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह अपने बंदों से मुहब्बत करता है और उन्हें सही रास्ता दिखाता है। जो लोग अल्लाह की राह में हिजरत करते हैं — चाहे वह शारीरिक हिजरत हो या दिल की हिजरत (बुराई से अच्छाई की तरफ) — उनके लिए अल्लाह की रहमत और मग़फिरत है। हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को अल्लाह की मुहब्बत से भरें और उसके दुश्मनों से दूर रहें, ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।
📜 आयत 87-91 — अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 89
सूरा अन-निसा आयत 89 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : उन लोगों की ख्वाहिश तो ये है कि जिस तरह…सूरा आयत 89/176 — अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-निसा सुनें, अन-निसा अनुवाद, अन-निसा mp3, अन-निसा pdf. आयत 87–91. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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