अल-हश्र · 8/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
لِلْفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا وَيَنصُرُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ ۝٨
Lilfuqaraaa`il Muhaaji reenal lazeena ukhrijoo min diyaarihim wa amwaalihim yabtaghoona fadlam minal laahi wa ridwaananw wa yansuroonal laaha wa Rasoolah; ulaaa`ika humus saadiqoon
📖 हिंदी अर्थ
(इस माल में) उन मुफलिस मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले (और अलग किए) गए (और) ख़ुदा के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और ख़ुदा की और उसके रसूल की मदद करते हैं यही लोग सच्चे ईमानदार हैं और (उनका भी हिस्सा है)
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْمُهَاجِرِينَ (अल-मुहाजिरीन): वे लोग जिन्होंने अल्लाह के लिए अपना घर-बार छोड़ दिया।
  • أُخْرِجُوا (उख़रिजू): निकाले गए, बेदखल किए गए।
  • يَبْتَغُونَ (यब्तग़ून): तलाश करते हैं, चाहते हैं।
  • فَضْلًا (फ़ज़्लन): अल्लाह की देन, रिज़्क़ और कृपा।
  • رِضْوَانًا (रिज़्वानन): अल्लाह की खुशी और प्रसन्नता।
  • الصَّادِقُونَ (अस-सादिक़ून): सच्चे लोग, जिनका दावा और अमल एक जैसा हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस माल (फ़े) के वितरण के बारे में बताती है जो अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ को बिना जंग के दिया था। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इस माल में से एक हिस्सा उन ग़रीब मुहाजिरों का भी है, जिन्होंने अल्लाह के दीन की खातिर अपने घर, अपनी ज़मीन, अपनी जायदाद और अपने रिश्तेदारों को छोड़ दिया। मक्का के काफ़िरों ने उन्हें ज़ुल्म के साथ उनके घरों से निकाला और उनका सारा माल-दौलत हड़प लिया। वे दुनिया में अल्लाह का फ़ज़्ल (रिज़्क़) तलाश कर रहे हैं और आख़िरत में उसकी रज़ा और खुशी के चाहने वाले हैं। वे अपनी जान और माल से अल्लाह और उसके रसूल की मदद करते हैं, यानी जिहाद और दीन की खिदमत में अपना सब कुछ लगा देते हैं। अल्लाह फ़रमाता है कि यही लोग सच्चे हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ईमान के दावे को अपने अमल से साबित कर दिया। उनकी क़ुर्बानियाँ और सब्र इस बात की गवाही देते हैं कि वे सच्चे मुसलमान हैं।

दावत और प्यार भरा पैग़ाम:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में क़ुर्बानी देने वालों का दर्जा कितना ऊँचा है। ये मुहाजिर सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम हमारे लिए मशाल-ए-राह हैं। उन्होंने दिखा दिया कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल और अमल से होता है। जब हम अपने जीवन में अल्लाह की राह में कुछ भी क़ुर्बान करते हैं – चाहे वह समय हो, धन हो या आराम – तो अल्लाह हमें कभी निराश नहीं करता। वह बदले में दुनिया में भी रिज़्क़ देता है और आख़िरत में अपनी रज़ा और जन्नत अता करता है। याद रखिए, अल्लाह की खुशी ही सबसे बड़ी कामयाबी है। जो लोग दुनिया की खातिर आख़िरत बेचते हैं वे घाटे में हैं, लेकिन जो अल्लाह की खातिर दुनिया की चीज़ें छोड़ देते हैं, अल्लाह उन्हें दोनों जहान की भलाई देता है। आइए, हम भी अपने अंदर यही जज़्बा पैदा करें कि हमारा प्यार, हमारी मेहनत और हमारी क़ुर्बानियाँ सिर्फ़ अल्लाह के लिए हों।

🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — अल-हश्र

6وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(तो) जो माल ख़ुदा ने अपने रसूल को उन लोगों से बे लड़े दिलवा दिया उसमें तुम्हार हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फरमाता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
7مَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنكُمْ ۚ وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
तो जो माल ख़ुदा ने अपने रसूल को देहात वालों से बे लड़े दिलवाया है वह ख़ास ख़ुदा और उसके रसूल और (रसूल के) क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और परदेसियों का है ताकि जो लोग तुममें से दौलतमन्द हैं हिर फिर कर दौलत उन्हीं में न रहे, हाँ जो तुमको रसूल दें दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा सख्त अज़ाब देने वाला है
8لِلْفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا وَيَنصُرُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ
(इस माल में) उन मुफलिस मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले (और अलग किए) गए (और) ख़ुदा के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और ख़ुदा की और उसके रसूल की मदद करते हैं यही लोग सच्चे ईमानदार हैं और (उनका भी हिस्सा है)
9وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالْإِيمَانَ مِن قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ إِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ فِي صُدُورِهِمْ حَاجَةً مِّمَّا أُوتُوا وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ ۚ وَمَن يُوقَ شُحَّ نَفْسِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
जो लोग मोहाजेरीन से पहले (हिजरत के) घर (मदीना) में मुक़ीम हैं और ईमान में (मुसतक़िल) रहे और जो लोग हिजरत करके उनके पास आए उनसे मोहब्बत करते हैं और जो कुछ उनको मिला उसके लिए अपने दिलों में कुछ ग़रज़ नहीं पाते और अगरचे अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो दूसरों को अपने नफ्स पर तरजीह देते हैं और जो शख़्श अपने नफ्स की हिर्स से बचा लिया गया तो ऐसे ही लोग अपनी दिली मुरादें पाएँगे
10وَالَّذِينَ جَاءُوا مِن بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِي قُلُوبِنَا غِلًّا لِّلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
और उनका भी हिस्सा है और जो लोग उन (मोहाजेरीन) के बाद आए (और) दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हमारी और उन लोगों की जो हमसे पहले ईमान ला चुके मग़फेरत कर और मोमिनों की तरफ से हमारे दिलों में किसी तरह का कीना न आने दे परवरदिगार बेशक तू बड़ा शफीक़ निहायत रहम वाला है
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अनुवाद — अल-हश्र 8

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Tuesday, August 18, 2026

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