Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الْجِزْيَةَ (जिज़्या): वह कर या टैक्स जो इस्लामी राज्य में रहने वाले गैर-मुस्लिम नागरिकों से उनकी सुरक्षा और राज्य की सेवाओं के बदले लिया जाता है।
- عَن يَدٍ (अन यदिन): अपने हाथ से, अधीनता और समर्पण की स्थिति में।
- صَاغِرُونَ (साग़िरून): अपमानित, अधीन, दबे हुए।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत मुसलमानों को उन अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से लड़ने का आदेश देती है जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते, आख़िरत (प्रलय के दिन) पर विश्वास नहीं करते, उन चीज़ों को हराम नहीं मानते जिन्हें अल्लाह और उसके रसूल ने हराम किया है, और न ही सच्चे धर्म (इस्लाम) को अपनाते हैं।
इस आयत का मतलब यह नहीं है कि सभी यहूदियों और ईसाइयों से बिना शर्त लड़ा जाए, बल्कि यह उन लोगों के बारे में है जो इस्लामी राज्य के अधीन रहते हुए भी अपनी जिद और विद्रोह पर अड़े रहें। जब तक वे अपनी इच्छा से जिज़्या (सुरक्षा कर) न दें, जो उनकी अधीनता और राज्य के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह जिज़्या उनकी सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के बदले में ली जाती है, और यह उन पर बोझ नहीं बल्कि उनके लिए सुरक्षा की गारंटी है।
यह आदेश उस समय के संदर्भ में है जब मुसलमानों को अपने धर्म और राज्य की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। यह आयत युद्ध की स्थिति में एक स्पष्ट नीति निर्धारित करती है कि दुश्मन से निपटने का तरीका क्या होगा, और यह भी बताती है कि अहले-किताब के साथ व्यवहार में न्याय और सहिष्णुता का सिद्धांत अपनाया जाए।
फ़ायदे (लाभ और शिक्षाएँ):
- इस्लाम में न्याय और व्यवस्था: यह आयत बताती है कि इस्लाम में गैर-मुस्लिमों के साथ व्यवहार का एक स्पष्ट और न्यायपूर्ण नियम है। जिज़्या उन पर अत्याचार नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी है।
- धार्मिक सहिष्णुता: इस्लाम किसी को ज़बरदस्ती धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं करता। यह आयत उन्हें अपने धर्म पर बने रहने की अनुमति देती है, बशर्ते वे राज्य के प्रति वफादार रहें और कर अदा करें।
- ईमान की पहचान: आयत में उन लोगों की विशेषताएँ बताई गई हैं जो सच्चे ईमान से वंचित हैं — अल्लाह पर ईमान नहीं, आख़िरत पर विश्वास नहीं, हलाल-हराम की परवाह नहीं। यह हमें सिखाता है कि सच्चा ईमान सिर्फ ज़ुबानी नहीं, बल्कि अमल और अच्छे आचरण से होता है।
- इस्लामी राज्य की सुरक्षा: यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि अपने धर्म, अपनी भूमि और अपनी व्यवस्था की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए, और दुश्मनों के सामने कमज़ोरी नहीं दिखानी चाहिए।
- समर्पण और विनम्रता का पाठ: जिज़्या देने वालों की स्थिति "अपने हाथ से, अधीन होकर" बताई गई है, जो इस बात का प्रतीक है कि इस्लामी राज्य में गैर-मुस्लिमों को अपनी स्थिति के अनुसार रहना होता है, और यह उनके लिए बेहतर है कि वे शांति से रहें।
📜 आयत 27-31 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 29
सूरा अत-तौबा आयत 29 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : अहले किताब में से जो लोग न तो (दिल से)…सूरा आयत 29/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 27–31. हिंदी अर्थ: اردو.
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Monday, September 28, 2026
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