यूनुस · 14/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
ثُمَّ جَعَلْنَاكُمْ خَلَائِفَ فِي الْأَرْضِ مِن بَعْدِهِمْ لِنَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ ۝١٤
Summa ja`alnaakum khalaaa`ifa fil ardi mim ba`dihim linanzura kaifa ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
फिर हमने उनके बाद तुमको ज़मीन में (उनका) जानशीन बनाया ताकि हम (भी) देखें कि तुम किस तरह काम करते हो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَلَائِفَ: (ख़लाइफ़) — यह 'خَلِيفَة' का बहुवचन है, अर्थात उत्तराधिकारी, पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे के स्थान पर आने वाले।
  • مِن بَعْدِهِمْ: उन (पिछली उम्मतों) के बाद।
  • لِنَنظُرَ: ताकि हम देखें — यहाँ 'देखना' का अर्थ परीक्षा लेना और जानना है, क्योंकि अल्लाह तो सब कुछ पहले से ही जानता है, लेकिन यह परीक्षा इसलिए है ताकि उसका फल और दंड न्याय पर आधारित हो।
  • كَيْفَ تَعْمَلُونَ: तुम कैसा कर्म करते हो — अच्छा या बुरा।

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला इस आयत में मानव जाति को उसकी ज़िम्मेदारी का एहसास करा रहा है। पिछली उम्मतें — जैसे आद, समूद, नूह की क़ौम और फ़िरऔन के लोग — जब अल्लाह के रसूलों को झुठलाया और ज़मीन पर फ़साद फैलाया, तो अल्लाह ने उन्हें हलाक कर दिया। अब उनके बाद तुम्हें (ऐ लोगों!) ज़मीन का उत्तराधिकारी बनाया गया है। यह केवल एक सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी परीक्षा है। अल्लाह तुम्हें देख रहा है कि तुम उस शक्ति और अधिकार का उपयोग किस प्रकार करते हो — क्या तुम उसी रास्ते पर चलते हो जिस पर चलकर पिछले लोग हलाक हुए, या तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करके अच्छे कर्म करते हो?

यह आयत एक चेतावनी भी है और एक प्रोत्साहन भी। चेतावनी इस बात की कि जिस प्रकार अल्लाह ने पिछले लोगों को उनके बुरे कर्मों की वजह से पकड़ा, उसी प्रकार वह तुम्हें भी पकड़ सकता है। प्रोत्साहन इस बात का कि यदि तुम अच्छे कर्म करोगे, तो अल्लाह तुम्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में अच्छा बदला देगा। अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन पर इसलिए बसाया है, ताकि वह तुम्हारे कर्मों के अनुसार तुम्हारे साथ व्यवहार करे — अच्छे कर्मों पर अच्छा बदला और बुरे कर्मों पर बुरा दंड।


शिक्षाएँ और लाभ:

  1. ज़िम्मेदारी का एहसास: यह आयत हमें सिखाती है कि ज़मीन पर हमारी मौजूदगी कोई खेल नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर ज़िम्मेदारी है। हमें याद रखना चाहिए कि हमारे हर कर्म पर अल्लाह की नज़र है।
  2. इतिहास से सबक: पिछली उम्मतों का विनाश हमारे लिए सबक है। हमें उनकी गलतियों से सीखना चाहिए और उन रास्तों से बचना चाहिए जिन पर चलकर वे हलाक हुए।
  3. परीक्षा की सच्चाई: दुनिया की ज़िंदगी एक परीक्षा है। अल्लाह हमें देख रहा है कि हम अपनी शक्ति, धन, ज्ञान और अधिकार का उपयोग कैसे करते हैं — अच्छाई के लिए या बुराई के लिए।
  4. न्याय का सिद्धांत: अल्लाह का फैसला पूरी तरह न्याय पर आधारित है। वह हमारे कर्मों के अनुसार ही हमें बदला देगा — कोई अच्छा कर्म बेकार नहीं जाएगा और कोई बुरा कर्म बिना सज़ा के नहीं रहेगा।
  5. उम्मीद और डर: यह आयत हमें अल्लाह की रहमत की उम्मीद भी देती है और उसके अज़ाब का डर भी। यही दोनों चीज़ें इंसान को सीधे रास्ते पर चलने में मदद करती हैं।
  6. उत्तराधिकार की अमानत: ज़मीन पर हमारा उत्तराधिकार अल्लाह की ओर से एक अमानत है। हमें इस अमानत को संभालकर रखना चाहिए और इसमें अल्लाह की मर्ज़ी के अनुसार ही काम करना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 12-16 — यूनुस

12وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ الضُّرُّ دَعَانَا لِجَنبِهِ أَوْ قَاعِدًا أَوْ قَائِمًا فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُ ضُرَّهُ مَرَّ كَأَن لَّمْ يَدْعُنَا إِلَىٰ ضُرٍّ مَّسَّهُ ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْمُسْرِفِينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और इन्सान को जब कोई नुकसान छू भी गया तो अपने पहलू पर (लेटा हो) या बैठा हो या ख़ड़ा (गरज़ हर हालत में) हम को पुकारता है फिर जब हम उससे उसकी तकलीफ को दूर कर देते है तो ऐसा खिसक जाता है जैसे उसने तकलीफ के (दफा करने के) लिए जो उसको पहुँचती थी हमको पुकारा ही न था जो लोग ज्यादती करते हैं उनकी कारस्तानियाँ यूँ ही उन्हें अच्छी कर दिखाई गई हैं
13وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ مِن قَبْلِكُمْ لَمَّا ظَلَمُوا ۙ وَجَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ وَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِمِينَ
और तुमसे पहली उम्मत वालों को जब उन्होंने शरारत की तो हम ने उन्हें ज़रुर हलाक कर डाला हालॉकि उनके (वक्त क़े) रसूल वाजेए व रौशन मोज़िज़ात लेकर आ चुके थे और वह लोग ईमान (न लाना था) न लाए हम गुनेहगार लोगों की यूँ ही सज़ा किया करते हैं
14ثُمَّ جَعَلْنَاكُمْ خَلَائِفَ فِي الْأَرْضِ مِن بَعْدِهِمْ لِنَنظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ
फिर हमने उनके बाद तुमको ज़मीन में (उनका) जानशीन बनाया ताकि हम (भी) देखें कि तुम किस तरह काम करते हो
15وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ ۙ قَالَ الَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَاءَنَا ائْتِ بِقُرْآنٍ غَيْرِ هَٰذَا أَوْ بَدِّلْهُ ۚ قُلْ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أُبَدِّلَهُ مِن تِلْقَاءِ نَفْسِي ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰ إِلَيَّ ۖ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
और जब उन लोगों के सामने हमारी रौशन आयते पढ़ीं जाती हैं तो जिन लोगों को (मरने के बाद) हमारी हुजूरी का खटका नहीं है वह कहते है कि हमारे सामने इसके अलावा कोई दूसरा (कुरान लाओ या उसका रद्दो बदल कर डालो (ऐ रसूल तुम कह दो कि मुझे ये एख्तेयार नहीं कि मै उसे अपने जी से बदल डालूँ मै तो बस उसी का पाबन्द हूँ जो मेरी तरफ वही की गई है मै तो अगर अपने परवरदिगार की नाफरमानी करु तो बड़े (कठिन) दिन के अज़ाब से डरता हूँ
16قُل لَّوْ شَاءَ اللَّهُ مَا تَلَوْتُهُ عَلَيْكُمْ وَلَا أَدْرَاكُم بِهِ ۖ فَقَدْ لَبِثْتُ فِيكُمْ عُمُرًا مِّن قَبْلِهِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा चाहता तो मै न तुम्हारे सामने इसको पढ़ता और न वह तुम्हें इससे आगाह करता क्योंकि मै तो (आख़िर) तुमने इससे पहले मुद्दतों रह चुका हूँ (और कभी 'वही' का नाम भी न लिया)
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अनुवाद — यूनुस 14

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Tuesday, August 18, 2026

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