Qaala yaa qawmi ara`aitum in kuntu `alaa baiyinatim mir Rabbee wa aataanee rahmatam min `indihee fa`um miyat `alaikum anulzimuku moohaa wa antum lahaa kaarihoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
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انہوں نے کہا کہ اے قوم! دیکھو تو اگر میں اپنے پروردگار کی طرف سے دلیل (روشن) رکھتا ہوں اور اس نے مجھے اپنے ہاں سے رحمت بخشی ہو جس کی حقیقت تم سے پوشیدہ رکھی گئی ہے۔ تو کیا ہم اس کے لیے تمہیں مجبور کرسکتے ہیں اور تم ہو کہ اس سے ناخوش ہو رہے ہو
رَحْمَةً: यहाँ अर्थ है नबुव्वत (पैग़म्बरी) और रिसालत (सन्देश)।
فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ: वह चीज़ तुम पर छिपी रह गई, यानी तुम उसे समझ न सके।
أَنُلْزِمُكُمُوهَا: क्या हम उसे तुम पर ज़बरदस्ती थोप दें?
كَارِهُونَ: नापसन्द करने वाले, विरोधी।
तफ़सीर (व्याख्या):
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को सम्बोधित करते हुए कहा: "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा मुझे बताओ—अगर मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण (बय्यिना) पर हूँ, जो मेरे दावे की सच्चाई की गवाही देता है, और उसने मुझे अपनी ओर से रहमत (नबुव्वत और रिसालत) प्रदान की है, लेकिन यह रहमत तुम्हारी समझ से ओझल रह गई है—तो क्या यह उचित है कि हम इस (सत्य) को तुम पर ज़बरदस्ती थोप दें, जबकि तुम इसे नापसन्द करते हो?"
यह एक अर्थपूर्ण प्रश्न है जो इन्कार (नकारात्मक उत्तर) के लिए है। यानी नूह (अलैहिस्सलाम) यह समझा रहे हैं कि ईमान और हिदायत कोई ज़बरदस्ती की चीज़ नहीं है। हमारा काम केवल सत्य को स्पष्ट रूप से पहुँचाना है। जिसे अल्लाह हिदायत देना चाहेगा, वही इसे क़बूल करेगा। हम तुम्हें ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं बना सकते, क्योंकि ईमान दिल का मामला है, और दिल को ज़बरदस्ती नहीं बदला जा सकता। हमारा काम केवल सच्चाई को बयान करना है, और फ़ैसला अल्लाह के हाथ में है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
दावत में नर्मी और हिकमत: इस आयत से सीख मिलती है कि सत्य की ओर बुलाने का तरीक़ा नर्मी, समझाने-बुझाने और तर्क पर आधारित होना चाहिए, न कि ज़बरदस्ती पर। इस्लाम में ईमान ज़बरदस्ती से नहीं लाया जाता।
स्पष्ट प्रमाण की अहमियत: एक दावा करने वाले के पास स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के पास अपने रब की ओर से स्पष्ट बय्यिना थी, और यही उनकी ताक़त थी।
अल्लाह की रहमत की क़द्र: नबुव्वत और रिसालत अल्लाह की बहुत बड़ी रहमत है। जो लोग इस रहमत को नहीं पहचानते, वे वास्तव में बड़े घाटे में हैं।
ज़बरदस्ती से ईमान नहीं आता: ईमान दिल की गहराई से निकलने वाली चीज़ है। इसे ज़बरदस्ती नहीं थोपा जा सकता। यह अल्लाह की तौफ़ीक़ से ही आता है।
अल्लाह पर भरोसा: दावत देने वाले को अपने काम से फ़ारिग़ होकर अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है, हमारा काम केवल पहुँचाना है।
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम तो तुम्हें अपना ही सा एक आदमी समझते हैं और हम तो देखते हैं कि तुम्हारे पैरोकार हुए भी हैं तो बस सिर्फ हमारे चन्द रज़ील (नीच) लोग (और वह भी बे सोचे समझे सरसरी नज़र में) और हम तो अपने ऊपर तुम लोगों की कोई फज़ीलत नहीं देखते बल्कि तुम को झूठा समझते हैं
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
और तुम हो कि उसको नापसन्द किए जाते हो और ऐ मेरी क़ौम मैं तो तुमसे इसके सिले में कुछ माल का तालिब नहीं मेरी मज़दूरी तो सिर्फ ख़ुदा के ज़िम्मे है और मै तो तुम्हारे कहने से उन लोगों को जो ईमान ला चुके हैं निकाल नहीं सकता (क्योंकि) ये लोग भी ज़रुर अपने परवरदिगार के हुज़ूर में हाज़िर होगें मगर मै तो देखता हूँ कि कुछ तुम ही लोग (नाहक़) जिहालत करते हो
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