हूद · 28/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَآتَانِي رَحْمَةً مِّنْ عِندِهِ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنتُمْ لَهَا كَارِهُونَ ۝٢٨
Qaala yaa qawmi ara`aitum in kuntu `alaa baiyinatim mir Rabbee wa aataanee rahmatam min `indihee fa`um miyat `alaikum anulzimuku moohaa wa antum lahaa kaarihoon
📖 हिंदी अर्थ
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • بَيِّنَةٍ: स्पष्ट प्रमाण, खुला हुआ सबूत।
  • رَحْمَةً: यहाँ अर्थ है नबुव्वत (पैग़म्बरी) और रिसालत (सन्देश)।
  • فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ: वह चीज़ तुम पर छिपी रह गई, यानी तुम उसे समझ न सके।
  • أَنُلْزِمُكُمُوهَا: क्या हम उसे तुम पर ज़बरदस्ती थोप दें?
  • كَارِهُونَ: नापसन्द करने वाले, विरोधी।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को सम्बोधित करते हुए कहा: "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा मुझे बताओ—अगर मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण (बय्यिना) पर हूँ, जो मेरे दावे की सच्चाई की गवाही देता है, और उसने मुझे अपनी ओर से रहमत (नबुव्वत और रिसालत) प्रदान की है, लेकिन यह रहमत तुम्हारी समझ से ओझल रह गई है—तो क्या यह उचित है कि हम इस (सत्य) को तुम पर ज़बरदस्ती थोप दें, जबकि तुम इसे नापसन्द करते हो?"

यह एक अर्थपूर्ण प्रश्न है जो इन्कार (नकारात्मक उत्तर) के लिए है। यानी नूह (अलैहिस्सलाम) यह समझा रहे हैं कि ईमान और हिदायत कोई ज़बरदस्ती की चीज़ नहीं है। हमारा काम केवल सत्य को स्पष्ट रूप से पहुँचाना है। जिसे अल्लाह हिदायत देना चाहेगा, वही इसे क़बूल करेगा। हम तुम्हें ज़बरदस्ती मुसलमान नहीं बना सकते, क्योंकि ईमान दिल का मामला है, और दिल को ज़बरदस्ती नहीं बदला जा सकता। हमारा काम केवल सच्चाई को बयान करना है, और फ़ैसला अल्लाह के हाथ में है।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. दावत में नर्मी और हिकमत: इस आयत से सीख मिलती है कि सत्य की ओर बुलाने का तरीक़ा नर्मी, समझाने-बुझाने और तर्क पर आधारित होना चाहिए, न कि ज़बरदस्ती पर। इस्लाम में ईमान ज़बरदस्ती से नहीं लाया जाता।
  2. स्पष्ट प्रमाण की अहमियत: एक दावा करने वाले के पास स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के पास अपने रब की ओर से स्पष्ट बय्यिना थी, और यही उनकी ताक़त थी।
  3. अल्लाह की रहमत की क़द्र: नबुव्वत और रिसालत अल्लाह की बहुत बड़ी रहमत है। जो लोग इस रहमत को नहीं पहचानते, वे वास्तव में बड़े घाटे में हैं।
  4. ज़बरदस्ती से ईमान नहीं आता: ईमान दिल की गहराई से निकलने वाली चीज़ है। इसे ज़बरदस्ती नहीं थोपा जा सकता। यह अल्लाह की तौफ़ीक़ से ही आता है।
  5. अल्लाह पर भरोसा: दावत देने वाले को अपने काम से फ़ारिग़ होकर अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है, हमारा काम केवल पहुँचाना है।


📜 आयत 26-30 — हूद

26أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ
(और) ये (समझता हूँ) कि तुम ख़ुदा के सिवा किसी की परसतिश न करो मैं तुम पर एक दर्दनाक दिन (क़यामत) के अज़ाब से डराता हूँ
27فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا نَرَاكَ إِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَاكَ اتَّبَعَكَ إِلَّا الَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِبِينَ
तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम तो तुम्हें अपना ही सा एक आदमी समझते हैं और हम तो देखते हैं कि तुम्हारे पैरोकार हुए भी हैं तो बस सिर्फ हमारे चन्द रज़ील (नीच) लोग (और वह भी बे सोचे समझे सरसरी नज़र में) और हम तो अपने ऊपर तुम लोगों की कोई फज़ीलत नहीं देखते बल्कि तुम को झूठा समझते हैं
28قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَآتَانِي رَحْمَةً مِّنْ عِندِهِ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنتُمْ لَهَا كَارِهُونَ
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
29وَيَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۚ وَمَا أَنَا بِطَارِدِ الَّذِينَ آمَنُوا ۚ إِنَّهُم مُّلَاقُو رَبِّهِمْ وَلَٰكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ
और तुम हो कि उसको नापसन्द किए जाते हो और ऐ मेरी क़ौम मैं तो तुमसे इसके सिले में कुछ माल का तालिब नहीं मेरी मज़दूरी तो सिर्फ ख़ुदा के ज़िम्मे है और मै तो तुम्हारे कहने से उन लोगों को जो ईमान ला चुके हैं निकाल नहीं सकता (क्योंकि) ये लोग भी ज़रुर अपने परवरदिगार के हुज़ूर में हाज़िर होगें मगर मै तो देखता हूँ कि कुछ तुम ही लोग (नाहक़) जिहालत करते हो
30وَيَا قَوْمِ مَن يَنصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِن طَرَدتُّهُمْ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
और मेरी क़ौम अगर मै इन (बेचारे ग़रीब) (ईमानदारों) को निकाल दूँ तो ख़ुदा (के अज़ाब) से (बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा तो क्या तुम इतना भी ग़ौर नहीं करते
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सूरा आयत 28/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 26–30. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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