अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الْمَلَأُ: क़ौम के रईस और सरदार।
- أَرَاذِلُنَا: हमारे नीच लोग, कमज़ोर और ग़रीब लोग।
- بَادِيَ الرَّأْيِ: बिना सोचे-समझे, सतही नज़र से, जल्दबाज़ी में।
तफ़सीर:
जब हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को ईमान की दावत दी और उन्हें अल्लाह की तौहीद की तरफ़ बुलाया, तो उनकी क़ौम के जो सरदार और बुज़ुर्ग काफ़िर थे, उन्होंने जवाब में कहा: “हम तो तुम्हें सिर्फ़ अपने जैसा एक इंसान ही देखते हैं। तुम में कोई ऐसी ख़ासियत नहीं जो तुम्हें हमसे बेहतर बनाए। हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारी पैरवी करने वाले सिर्फ़ हमारे नीच और कमज़ोर लोग हैं, जो बिना किसी ग़ौर-ओ-फ़िक्र के सिर्फ़ जल्दबाज़ी में तुम्हारे पीछे हो लिए हैं। हमें तुममें और तुम्हारे साथियों में अपने मुक़ाबले कोई बड़ाई या फ़ज़ीलत नज़र नहीं आती — न माल में, न इज़्ज़त में, न रुत्बे में। बल्कि हम तो यक़ीन करते हैं कि तुम सब झूठे हो और जो कुछ तुम कहते हो वह सब बातिल है।”
यानी उन काफ़िर सरदारों ने अपने घमंड और अकड़ की वजह से हक़ को क़बूल करने से इनकार कर दिया। उन्होंने हज़रत नूह की दावत को इसलिए रद्द कर दिया कि वह उनके जैसा इंसान है, उसके साथी कमज़ोर और ग़रीब लोग हैं, और उन्हें अपने ऊपर कोई बड़ाई हासिल नहीं। उनकी यह दलीलें सिर्फ़ बहाने थीं, क्योंकि हक़ की क़द्र उसके पेश करने वाले की सूरत या साथियों की हैसियत से नहीं होती, बल्कि उसकी अपनी सच्चाई से होती है।
फ़ायदे:
- हक़ की दावत को क़बूल करने के लिए दावत देने वाले का अमीर या रईस होना ज़रूरी नहीं। अल्लाह के नबी भी इंसान ही होते हैं, और उनकी सच्चाई उनके मुअजिज़ों और उनकी पाक ज़िंदगी से साबित होती है।
- ईमान लाने वालों की कसरत या उनकी दुनियावी हैसियत हक़ की कसौटी नहीं। अक्सर सच्चे ईमान वाले कमज़ोर और ग़रीब लोग होते हैं, जबकि बड़े लोग घमंड की वजह से हक़ से दूर रहते हैं।
- यह आयत हमें सिखाती है कि किसी इंसान की इज़्ज़त अल्लाह के नज़दीक उसके तक़वा और अमल से है, न कि उसके माल और रुत्बे से। इसलिए हमें लोगों की सूरत देखकर उनकी क़द्र नहीं करनी चाहिए।
- काफ़िरों की पुरानी आदत है कि वह नबियों की दावत को नीच लोगों की पैरवी कहकर बदनाम करते थे, ताकि लोग उनसे दूर रहें। यह एक ऐतराज़ है जो हर ज़माने में हक़ के दुश्मन करते आए हैं, लेकिन अल्लाह की मदद हमेशा सच्चे लोगों के साथ होती है।
- इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि हम अपने घमंड और बड़प्पन के जाल में न फंसें, बल्कि हक़ को क़बूल करने के लिए हमेशा तैयार रहें, चाहे वह किसी भी हैसियत के इंसान की तरफ़ से आए।
📜 आयत 25-29 — हूद
अनुवाद — हूद 27
सूरा हूद आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम…सूरा आयत 27/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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