हूद · 27/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا نَرَاكَ إِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَاكَ اتَّبَعَكَ إِلَّا الَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِبِينَ ۝٢٧
Faqaalal mala ul lazeena kafaroo min qawmihee ma naraaka illaa basharam mislanaa wa maa naraakat taba`aka illal lazeena hum araazilunaa baadiyar raayi wa maa naraa lakum `alainaa min fadlim bal nazunnukum kaazibeen
📖 हिंदी अर्थ
तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम तो तुम्हें अपना ही सा एक आदमी समझते हैं और हम तो देखते हैं कि तुम्हारे पैरोकार हुए भी हैं तो बस सिर्फ हमारे चन्द रज़ील (नीच) लोग (और वह भी बे सोचे समझे सरसरी नज़र में) और हम तो अपने ऊपर तुम लोगों की कोई फज़ीलत नहीं देखते बल्कि तुम को झूठा समझते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْمَلَأُ: क़ौम के रईस और सरदार।
  • أَرَاذِلُنَا: हमारे नीच लोग, कमज़ोर और ग़रीब लोग।
  • بَادِيَ الرَّأْيِ: बिना सोचे-समझे, सतही नज़र से, जल्दबाज़ी में।

तफ़सीर:

जब हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को ईमान की दावत दी और उन्हें अल्लाह की तौहीद की तरफ़ बुलाया, तो उनकी क़ौम के जो सरदार और बुज़ुर्ग काफ़िर थे, उन्होंने जवाब में कहा: “हम तो तुम्हें सिर्फ़ अपने जैसा एक इंसान ही देखते हैं। तुम में कोई ऐसी ख़ासियत नहीं जो तुम्हें हमसे बेहतर बनाए। हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारी पैरवी करने वाले सिर्फ़ हमारे नीच और कमज़ोर लोग हैं, जो बिना किसी ग़ौर-ओ-फ़िक्र के सिर्फ़ जल्दबाज़ी में तुम्हारे पीछे हो लिए हैं। हमें तुममें और तुम्हारे साथियों में अपने मुक़ाबले कोई बड़ाई या फ़ज़ीलत नज़र नहीं आती — न माल में, न इज़्ज़त में, न रुत्बे में। बल्कि हम तो यक़ीन करते हैं कि तुम सब झूठे हो और जो कुछ तुम कहते हो वह सब बातिल है।”

यानी उन काफ़िर सरदारों ने अपने घमंड और अकड़ की वजह से हक़ को क़बूल करने से इनकार कर दिया। उन्होंने हज़रत नूह की दावत को इसलिए रद्द कर दिया कि वह उनके जैसा इंसान है, उसके साथी कमज़ोर और ग़रीब लोग हैं, और उन्हें अपने ऊपर कोई बड़ाई हासिल नहीं। उनकी यह दलीलें सिर्फ़ बहाने थीं, क्योंकि हक़ की क़द्र उसके पेश करने वाले की सूरत या साथियों की हैसियत से नहीं होती, बल्कि उसकी अपनी सच्चाई से होती है।

फ़ायदे:

  1. हक़ की दावत को क़बूल करने के लिए दावत देने वाले का अमीर या रईस होना ज़रूरी नहीं। अल्लाह के नबी भी इंसान ही होते हैं, और उनकी सच्चाई उनके मुअजिज़ों और उनकी पाक ज़िंदगी से साबित होती है।
  2. ईमान लाने वालों की कसरत या उनकी दुनियावी हैसियत हक़ की कसौटी नहीं। अक्सर सच्चे ईमान वाले कमज़ोर और ग़रीब लोग होते हैं, जबकि बड़े लोग घमंड की वजह से हक़ से दूर रहते हैं।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि किसी इंसान की इज़्ज़त अल्लाह के नज़दीक उसके तक़वा और अमल से है, न कि उसके माल और रुत्बे से। इसलिए हमें लोगों की सूरत देखकर उनकी क़द्र नहीं करनी चाहिए।
  4. काफ़िरों की पुरानी आदत है कि वह नबियों की दावत को नीच लोगों की पैरवी कहकर बदनाम करते थे, ताकि लोग उनसे दूर रहें। यह एक ऐतराज़ है जो हर ज़माने में हक़ के दुश्मन करते आए हैं, लेकिन अल्लाह की मदद हमेशा सच्चे लोगों के साथ होती है।
  5. इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि हम अपने घमंड और बड़प्पन के जाल में न फंसें, बल्कि हक़ को क़बूल करने के लिए हमेशा तैयार रहें, चाहे वह किसी भी हैसियत के इंसान की तरफ़ से आए।
🎧 सुनें

📜 आयत 25-29 — हूद

25وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
(और उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि) मैं तो तुम्हारा (अज़ाबे ख़ुदा से) सरीही धमकाने वाला हूँ
26أَن لَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ
(और) ये (समझता हूँ) कि तुम ख़ुदा के सिवा किसी की परसतिश न करो मैं तुम पर एक दर्दनाक दिन (क़यामत) के अज़ाब से डराता हूँ
27فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا نَرَاكَ إِلَّا بَشَرًا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَاكَ اتَّبَعَكَ إِلَّا الَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِبِينَ
तो उनके सरदार जो काफ़िर थे कहने लगे कि हम तो तुम्हें अपना ही सा एक आदमी समझते हैं और हम तो देखते हैं कि तुम्हारे पैरोकार हुए भी हैं तो बस सिर्फ हमारे चन्द रज़ील (नीच) लोग (और वह भी बे सोचे समझे सरसरी नज़र में) और हम तो अपने ऊपर तुम लोगों की कोई फज़ीलत नहीं देखते बल्कि तुम को झूठा समझते हैं
28قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَآتَانِي رَحْمَةً مِّنْ عِندِهِ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنتُمْ لَهَا كَارِهُونَ
(नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
29وَيَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۚ وَمَا أَنَا بِطَارِدِ الَّذِينَ آمَنُوا ۚ إِنَّهُم مُّلَاقُو رَبِّهِمْ وَلَٰكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ
और तुम हो कि उसको नापसन्द किए जाते हो और ऐ मेरी क़ौम मैं तो तुमसे इसके सिले में कुछ माल का तालिब नहीं मेरी मज़दूरी तो सिर्फ ख़ुदा के ज़िम्मे है और मै तो तुम्हारे कहने से उन लोगों को जो ईमान ला चुके हैं निकाल नहीं सकता (क्योंकि) ये लोग भी ज़रुर अपने परवरदिगार के हुज़ूर में हाज़िर होगें मगर मै तो देखता हूँ कि कुछ तुम ही लोग (नाहक़) जिहालत करते हो
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Tuesday, August 18, 2026

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