अर-राद · 15/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَظِلَالُهُم بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ ۩ ۝١٥
Wa lillaahi yasjudu man fis samaawaati wal ardi taw `anw wa karhanw wa zilaaluhum bilghuduwwi wal aasaal
📖 हिंदी अर्थ
और आसमानों और ज़मीन में (मख़लूक़ात से) जो कोई भी है खुशी से या ज़बरदस्ती सब (अल्लाह के आगे सर बसजूद हैं और (इसी तरह) उनके साए भी सुबह व शाम (सजदा करते हैं) (15) (सजदा)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • طَوْعًا: स्वेच्छा से, अपनी इच्छा और खुशी से।
  • كَرْهًا: विवश होकर, अनिच्छा से, मजबूरी में।
  • ظِلَالُهُم: उनकी परछाइयाँ (जो हर चीज़ की होती हैं)।
  • الْغُدُوِّ: सुबह का समय, प्रातःकाल।
  • الْآصَالِ: शाम का समय, सूर्यास्त से पहले का वक्त (अस्र के बाद से सूर्यास्त तक)।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत अल्लाह तआला की महानता और उसकी सर्वोच्च सत्ता का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है। अल्लाह ही वह हस्ती है जिसके आगे आसमानों और ज़मीन में मौजूद हर चीज़ सजदा करती है—चाहे वह कोई भी हो। यह सजदा दो तरह का है:

पहला, स्वेच्छा से (तौअन) — यह मोमिनों का सजदा है, जो अल्लाह की इबादत को अपनी खुशी, मुहब्बत और पूरे दिल से करते हैं। उनका सजदा उनके ईमान, शुक्र और अल्लाह के प्रति प्रेम का इज़हार होता है।

दूसरा, विवशता से (करहन) — यह काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों का हाल है। वे भले ही ज़बान से इनकार करें, लेकिन उनकी फ़ितरत (स्वभाव) और उनका अस्तित्व अल्लाह के आगे झुका हुआ है। उनकी रूह, उनका दिल और उनकी पूरी कायनात अल्लाह की कुदरत के सामने विवश है। वे चाहें जितना भी घमंड करें, उनकी पैदाइश, उनकी साँसें, उनका जीवन—सब कुछ अल्लाह के इशारे पर चल रहा है। यहाँ तक कि उनकी परछाइयाँ भी सुबह और शाम अल्लाह के हुक्म से झुकती और फैलती हैं, जो उनके विवश होने की गवाही देती हैं।

तीसरा, परछाइयों का सजदा — यह एक अद्भुत दृश्य है। हर मख़लूक़ (प्राणी) की परछाई—चाहे वह पहाड़ हो, पेड़ हो, जानवर हो या इंसान—सुबह और शाम के समय अल्लाह के हुक्म से झुकती है। यह परछाइयों का सजदा अल्लाह की कुदरत का एक स्पष्ट प्रमाण है कि पूरी कायनात अपने रब के आगे नतमस्तक है।

दावती पहलू (शिक्षाप्रद संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि इस विशाल ब्रह्मांड की हर चीज़—चाहे वह आसमान हो, ज़मीन हो, पहाड़ हों, पेड़ हों या हमारी अपनी परछाइयाँ—अल्लाह की महानता के सामने झुकी हुई हैं। फिर हम इंसान, जिन्हें अल्लाह ने अक्ल और समझ दी है, उसे क्यों नहीं सजदा करते? अगर हमारी परछाई भी अल्लाह के हुक्म से झुकती है, तो हमें अपने रब के आगे सिर झुकाने में क्या हिचकिचाहट होनी चाहिए?

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की इबादत करना कोई बोझ नहीं, बल्कि एक सौभाग्य है। जो लोग स्वेच्छा से अल्लाह के आगे झुकते हैं, वे सच्ची शांति और सुकून पाते हैं। और जो लोग घमंड करते हैं, वे अंततः विवश होकर उसी के आगे झुकेंगे—चाहे दुनिया में नहीं, तो आख़िरत में ज़रूर। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने रब के आगे प्यार और इख़लास (शुद्ध नियत) के साथ सजदा करें, क्योंकि यही हमारी फ़ितरत है और यही हमारी कामयाबी का रास्ता है।



📜 आयत 13-17 — अर-राद

13وَيُسَبِّحُ الرَّعْدُ بِحَمْدِهِ وَالْمَلَائِكَةُ مِنْ خِيفَتِهِ وَيُرْسِلُ الصَّوَاعِقَ فَيُصِيبُ بِهَا مَن يَشَاءُ وَهُمْ يُجَادِلُونَ فِي اللَّهِ وَهُوَ شَدِيدُ الْمِحَالِ
और ग़र्ज और फरिश्ते उसके ख़ौफ से उसकी हम्दो सना की तस्बीह किया करते हैं वही (आसमान से) बिजलियों को भेजता है फिर उसे जिस पर चाहता है गिरा भी देता है और ये लोग ख़ुदा के बारे में (ख्वामाख्वाह) झगड़े करते हैं हालॉकि वह बड़ा सख्त क़ूवत वाला है
14لَهُ دَعْوَةُ الْحَقِّ ۖ وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَجِيبُونَ لَهُم بِشَيْءٍ إِلَّا كَبَاسِطِ كَفَّيْهِ إِلَى الْمَاءِ لِيَبْلُغَ فَاهُ وَمَا هُوَ بِبَالِغِهِ ۚ وَمَا دُعَاءُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ
(मुसीबत के वक्त) उसी का (पुकारना) ठीक पुकारना है और जो लोग उसे छोड़कर (दूसरों को) पुकारते हैं वह तो उनकी कुछ सुनते तक नहीं मगर जिस तरह कोई शख़्श (बग़ैर उंगलियां मिलाए) अपनी दोनों हथेलियाँ पानी की तरफ फैलाए ताकि पानी उसके मुँह में पहुँच जाए हालॉकि वह किसी तरह पहुँचने वाला नहीं और (इसी तरह) काफिरों की दुआ गुमराही में (पड़ी बहकी फिरा करती है)
15وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَظِلَالُهُم بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ ۩
और आसमानों और ज़मीन में (मख़लूक़ात से) जो कोई भी है खुशी से या ज़बरदस्ती सब (अल्लाह के आगे सर बसजूद हैं और (इसी तरह) उनके साए भी सुबह व शाम (सजदा करते हैं) (15) (सजदा)
16قُلْ مَن رَّبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ قُلِ اللَّهُ ۚ قُلْ أَفَاتَّخَذْتُم مِّن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ لَا يَمْلِكُونَ لِأَنفُسِهِمْ نَفْعًا وَلَا ضَرًّا ۚ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ أَمْ هَلْ تَسْتَوِي الظُّلُمَاتُ وَالنُّورُ ۗ أَمْ جَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ خَلَقُوا كَخَلْقِهِ فَتَشَابَهَ الْخَلْقُ عَلَيْهِمْ ۚ قُلِ اللَّهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
(ऐ रसूल) तुम पूछो कि (आख़िर) आसमान और ज़मीन का परवरदिगार कौन है (ये क्या जवाब देगें) तुम कह दो कि अल्लाह है (ये भी कह दो कि क्या तुमने उसके सिवा दूसरे कारसाज़ बना रखे हैं जो अपने लिए आप न तो नफे पर क़ाबू रखते हैं न ज़रर (नुकसान) पर (ये भी तो) पूछो कि भला (कहीं) अन्धा और ऑंखों वाला बराबर हो सकता है (हरगिज़ नहीं) (या कहीं) अंधेरा और उजाला बराबर हो सकता है (हरगिज़ नहीं) इन लोगों ने ख़ुदा के कुछ शरीक़ ठहरा रखे हैं क्या उन्होनें ख़ुदा ही की सी मख़लूक़ पैदा कर रखी है जिनके सबब मख़लूकात उन पर मुशतबा हो गई है (और उनकी खुदाई के क़ायल हो गए) तुम कह दो कि ख़ुदा ही हर चीज़ का पैदा करने वाला और वही यकता और सिपर (सब पर) ग़ालिब है
17أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَالَتْ أَوْدِيَةٌ بِقَدَرِهَا فَاحْتَمَلَ السَّيْلُ زَبَدًا رَّابِيًا ۚ وَمِمَّا يُوقِدُونَ عَلَيْهِ فِي النَّارِ ابْتِغَاءَ حِلْيَةٍ أَوْ مَتَاعٍ زَبَدٌ مِّثْلُهُ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْحَقَّ وَالْبَاطِلَ ۚ فَأَمَّا الزَّبَدُ فَيَذْهَبُ جُفَاءً ۖ وَأَمَّا مَا يَنفَعُ النَّاسَ فَيَمْكُثُ فِي الْأَرْضِ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ
उसी ने आसमान से पानी बरसाया फिर अपने अपने अन्दाज़े से नाले बह निकले फिर पानी के रेले पर (जोश खाकर) फूला हुआ झाग (फेन) आ गया और उस चीज़ (धातु) से भी जिसे ये लोग ज़ेवर या कोई असबाब बनाने की ग़रज़ से आग में तपाते हैं इसी तरह फेन आ जाता है (फिर अलग हो जाता है) युं ख़ुदा हक़ व बातिल की मसले बयान फरमाता है (कि पानी हक़ की मिसाल और फेन बातिल की) ग़रज़ फेन तो खुश्क होकर ग़ायब हो जाता है जिससे लोगों को नफा पहुँचता है (पानी) वह ज़मीन में ठहरा रहता है युं ख़ुदा (लोगों के समझाने के वास्ते) मसले बयान फरमाता है
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अनुवाद — अर-राद 15

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Tuesday, August 18, 2026

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