Kaanan naasu ummatanw waahidatan fab`asal laahun Nabiyyeena mubashshireena wa munzireena wa anzala ma`ahumul kitaaba bilhaqqi liyahkuma bainan naasi feemakh talafoo feeh; wa makh talafa feehi `illallazeena ootoohu mim ba`di maa jaaa`athumul baiyinaatu baghyam bainahm fahadal laahul lazeena aamanoo limakh talafoo feehi minal haqqi bi iznih; wallaahu yahdee mai yashaaa`u ilaa Siraatim Mustaqeem
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
(پہلے تو سب) لوگوں کا ایک ہی مذہب تھا (لیکن وہ آپس میں اختلاف کرنے لگے) تو خدا نے (ان کی طرف) بشارت دینے والے اور ڈر سنانے والے پیغمبر بھیجے اور ان پر سچائی کے ساتھ کتابیں نازل کیں تاکہ جن امور میں لوگ اختلاف کرتے تھے ان کا ان میں فیصلہ کردے۔ اور اس میں اختلاف بھی انہیں لوگوں نے کیا جن کو کتاب دی گئی تھی باوجود یہ کہ ان کے پاس کھلے ہوئے احکام آچکے تھے (اور یہ اختلاف انہوں نے صرف) آپس کی ضد سے (کیا) تو جس امر حق میں وہ اختلاف کرتے تھے خدا نے اپنی مہربانی سے مومنوں کو اس کی راہ دکھا دی۔ اور خدا جس کو چاہتا ہے سیدھا رستہ دکھا دیتا ہے
أُمَّةً وَاحِدَةً: एक ही धर्म (इस्लाम) पर सहमत एक समुदाय।
مُبَشِّرِينَ: जन्नत की खुशखबरी देने वाले।
مُنذِرِينَ: अल्लाह के अज़ाब से डराने वाले।
بَغْيًا: ज़ुल्म और ईर्ष्या (हसद) की वजह से।
الْبَيِّنَاتُ: स्पष्ट प्रमाण और दलीलें।
صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ: सीधा रास्ता (इस्लाम)।
तफ़सीर (व्याख्या):
सारे लोग शुरू में एक ही उम्मत (समुदाय) थे, यानी हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) तक सब एक ही धर्म—इस्लाम और ईमान—पर थे। फिर शैतानों ने उन्हें गुमराह किया और लोग आपस में मतभेद करने लगे—कोई मोमिन बना, कोई काफ़िर। इसी वजह से अल्लाह ने नबियों को भेजा, जो नेक और आज्ञाकारी लोगों को जन्नत की खुशखबरी देते थे और काफ़िरों को उसके अज़ाब से डराते थे। उन्हीं के साथ अल्लाह ने सच्ची किताबें (तौरात, ज़बूर, इंजील, कुरआन) उतारीं, ताकि वे लोगों के आपसी मतभेदों का फ़ैसला उसी किताब के अनुसार करें।
लेकिन जिन लोगों को किताब (तौरात) दी गई—यानी यहूदी—उन्होंने स्पष्ट प्रमाण आने के बाद भी, सिर्फ़ ज़ुल्म और ईर्ष्या की वजह से, उस किताब में मतभेद किया। उन्होंने हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की निशानियाँ छिपाईं और सच्चाई को नहीं माना। फिर अल्लाह ने अपनी कृपा से मोमिनों को हिदायत दी कि वे उस सच्चाई को पहचान लें जिसमें दूसरों ने मतभेद किया था। और अल्लाह जिसे चाहता है, अपनी इच्छा से सीधे रास्ते (इस्लाम) की ओर मार्गदर्शन करता है।
फ़ायदे (उपदेश):
अल्लाह की रहमत का तक़ाज़ा है कि वह इंसानों को गुमराही में न छोड़े, बल्कि उनके पास नबी और किताबें भेजे—यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है।
नबियों का काम सिर्फ़ डराना नहीं, बल्कि खुशखबरी देना भी है—इससे पता चलता है कि इस्लाम में उम्मीद और रहमत का पहलू बहुत मज़बूत है।
मतभेद और झगड़े की जड़ अक्सर ज़ुल्म और ईर्ष्या होती है—इसलिए मुसलमान को इन बुराइयों से बचना चाहिए।
अल्लाह की हिदायत उसकी इच्छा और कृपा से मिलती है, इसलिए हमें हमेशा उससे सीधे रास्ते की दुआ माँगनी चाहिए।
सच्चाई सामने आने के बाद भी अगर इंसान हठ और हसद की वजह से उसे न माने, तो यह उसकी बड़ी नाकामी है—जबकि मोमिन का काम सच्चाई को कबूल करना है, चाहे वह किसी से आए।
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है
(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेशक़ ख़ुदा सख्त अज़ाब वाला है
जिन लोगों ने कुफ्र इख्तेयार किया उन के लिये दुनिया की ज़रा सी ज़िन्दगी ख़ूब अच्छी दिखायी गयी है और ईमानदारों से मसखरापन करते हैं हालॉकि क़यामत के दिन परहेज़गारों का दरजा उनसे (कहीं) बढ़ चढ़ के होगा और ख़ुदा जिस को चाहता है बे हिसाब रोज़ी अता फरमाता है
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुश ख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाज़िल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख्तेलाफ डाल रखा था और ख़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है
क्या तुम ये ख्याल करते हो कि बेहश्त में पहुँच ही जाओगे हालॉकि अभी तक तुम्हे अगले ज़माने वालों की सी हालत नहीं पेश आयी कि उन्हें तरह तरह की तक़लीफों (फाक़ा कशी मोहताजी) और बीमारी ने घेर लिया था और ज़लज़ले में इस क़दर झिंझोडे ग़ए कि आख़िर (आज़िज़ हो के) पैग़म्बर और ईमान वाले जो उन के साथ थे कहने लगे देखिए ख़ुदा की मदद कब (होती) है देखो (घबराओ नहीं) ख़ुदा की मदद यक़ीनन बहुत क़रीब है
(ऐ रसूल) तुमसे लोग पूछते हैं कि हम ख़ुदा की राह में क्या खर्च करें (तो तुम उन्हें) जवाब दो कि तुम अपनी नेक कमाई से जो कुछ खर्च करो तो (वह तुम्हारे माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों का हक़ है और तुम कोई नेक सा काम करो ख़ुदा उसको ज़रुर जानता है
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