Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- وَصَّيْنَا: हमने आदेश दिया / नसीहत की
- بِوَالِدَيْهِ: अपने माता-पिता के साथ
- حُسْنًا: अच्छा व्यवहार करने का
- جَاهَدَاكَ: वे दोनों (माता-पिता) ज़ोर डालें / कोशिश करें
- لِتُشْرِكَ بِي: कि तू मेरे साथ शिर्क करे
- فَلَا تُطِعْهُمَا: तो तू उन दोनों की बात मत मान
- مَرْجِعُكُمْ: तुम सबकी वापसी
- فَأُنَبِّئُكُم: तो मैं तुम्हें बताऊँगा / सूचित करूँगा
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला ने इंसान को अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने की सख्त वसीयत (आदेश) की है। यानी हर इंसान पर यह फ़र्ज़ है कि वह अपने माता-पिता के साथ नेकी, इज़्ज़त, मुहब्बत और सेवा का बर्ताव करे — उनसे प्यार से बोले, उनकी खिदमत करे, उनकी ज़रूरतों का ख्याल रखे और उनके दिल को खुश रखे। यह अल्लाह का सीधा हुक्म है और इस्लाम में माता-पिता के साथ नेकी को बहुत बड़ा दर्जा दिया गया है।
लेकिन अल्लाह तआला एक ज़रूरी शर्त भी बयान कर रहा है — अगर माता-पिता तुझ पर ज़ोर डालें कि तू अल्लाह के साथ किसी और को शरीक करे (शिर्क करे), या किसी ऐसी चीज़ को पूजे जिसका कोई सबूत नहीं, तो उनकी इस बात को हरगिज़ मत मानना। क्योंकि अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी मख़लूक़ की इताअत (आज्ञा) जायज़ नहीं है — चाहे वह मख़लूक़ माँ-बाप ही क्यों न हों। यह बात सिर्फ़ शिर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि हर गुनाह के मामले में यही नियम है कि अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी की बात नहीं मानी जा सकती।
फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: तुम सबको मेरी ही तरफ लौटकर आना है — क़यामत के दिन। उस दिन मैं तुम्हें बता दूँगा कि तुम दुनिया में क्या-क्या अच्छे और बुरे काम करते रहे, और फिर हर एक को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला दूँगा। नेकी का बदला नेकी से और बुराई का बदला बुराई से।
दावत-ओ-तरग़ीब (प्रेरणा):
प्यारे भाइयों और बहनों! देखिए इस आयत में अल्लाह ने कितनी खूबसूरत तालीम दी है — एक तरफ माँ-बाप के साथ नेकी का हुक्म, तो दूसरी तरफ अल्लाह की इबादत की पाकीज़गी। यानी इंसान का दिल माँ-बाप की मुहब्बत से भरा हो, लेकिन उसकी सबसे बड़ी मुहब्बत और इताअत अल्लाह के लिए हो। अगर माँ-बाप भी अल्लाह की राह से हटाकर किसी और राह पर ले जाना चाहें, तो उनकी बात न मानना ही अल्लाह के करीब होने का ज़रिया है।
याद रखिए! माँ-बाप की सेवा और उनके साथ अच्छा व्यवहार जन्नत की चाबी है, लेकिन अल्लाह की रज़ा सबसे ऊपर है। जो इंसान अल्लाह की राह पर चलते हुए माँ-बाप की खिदमत करता है, अल्लाह उसे दुनिया में भी इज़्ज़त देता है और आख़िरत में भी। आइए हम सब अपने माँ-बाप से मुहब्बत करें, उनकी खिदमत करें, लेकिन कभी भी उनकी खातिर अल्लाह की नाफ़रमानी न करें। यही कामयाबी की राह है।
📜 आयत 6-10 — सूरा अल-अंकबूत
अनुवाद — अल-अंकबूत 8
सूरा अल-अंकबूत आयत 8 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और हमने इन्सान को अपने माँ बाप से अच्छा बरताव…सूरा आयत 8/69 — सूरा अल-अंकबूत العنكبوت (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अंकबूत सुनें, सूरा अल-अंकबूत अनुवाद, सूरा अल-अंकबूत mp3, सूरा अल-अंकबूत pdf. आयत 6–10. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-अंकबूत
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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