अल-अंकबूत · 8/69
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंकबूत
وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ حُسْنًا ۖ وَإِن جَاهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِي مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۚ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۝٨
Wa wassainal insaana biwaalidaihi husnanw wa in jaahadaaka litushrika bee maa laisa laka bihee `ilmun falaa tuti`humaa; ilaiya marji`ukum fa unabbi`ukum bimaa kuntum ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
और हमने इन्सान को अपने माँ बाप से अच्छा बरताव करने का हुक्म दिया है और (ये भी कि) अगर तुझे तेरे माँ बाप इस बात पर मजबूर करें कि ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बना जिन (के शरीक होने) का मुझे इल्म तक नहीं तो उनका कहना न मानना तुम सबको (आख़िर एक दिन) मेरी तरफ लौट कर आना है मै जो कुछ तुम लोग (दुनिया में) करते थे बता दूँगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَصَّيْنَا: हमने आदेश दिया / नसीहत की
  • بِوَالِدَيْهِ: अपने माता-पिता के साथ
  • حُسْنًا: अच्छा व्यवहार करने का
  • جَاهَدَاكَ: वे दोनों (माता-पिता) ज़ोर डालें / कोशिश करें
  • لِتُشْرِكَ بِي: कि तू मेरे साथ शिर्क करे
  • فَلَا تُطِعْهُمَا: तो तू उन दोनों की बात मत मान
  • مَرْجِعُكُمْ: तुम सबकी वापसी
  • فَأُنَبِّئُكُم: तो मैं तुम्हें बताऊँगा / सूचित करूँगा

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इंसान को अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने की सख्त वसीयत (आदेश) की है। यानी हर इंसान पर यह फ़र्ज़ है कि वह अपने माता-पिता के साथ नेकी, इज़्ज़त, मुहब्बत और सेवा का बर्ताव करे — उनसे प्यार से बोले, उनकी खिदमत करे, उनकी ज़रूरतों का ख्याल रखे और उनके दिल को खुश रखे। यह अल्लाह का सीधा हुक्म है और इस्लाम में माता-पिता के साथ नेकी को बहुत बड़ा दर्जा दिया गया है।

लेकिन अल्लाह तआला एक ज़रूरी शर्त भी बयान कर रहा है — अगर माता-पिता तुझ पर ज़ोर डालें कि तू अल्लाह के साथ किसी और को शरीक करे (शिर्क करे), या किसी ऐसी चीज़ को पूजे जिसका कोई सबूत नहीं, तो उनकी इस बात को हरगिज़ मत मानना। क्योंकि अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी मख़लूक़ की इताअत (आज्ञा) जायज़ नहीं है — चाहे वह मख़लूक़ माँ-बाप ही क्यों न हों। यह बात सिर्फ़ शिर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि हर गुनाह के मामले में यही नियम है कि अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी की बात नहीं मानी जा सकती।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: तुम सबको मेरी ही तरफ लौटकर आना है — क़यामत के दिन। उस दिन मैं तुम्हें बता दूँगा कि तुम दुनिया में क्या-क्या अच्छे और बुरे काम करते रहे, और फिर हर एक को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला दूँगा। नेकी का बदला नेकी से और बुराई का बदला बुराई से।


दावत-ओ-तरग़ीब (प्रेरणा):

प्यारे भाइयों और बहनों! देखिए इस आयत में अल्लाह ने कितनी खूबसूरत तालीम दी है — एक तरफ माँ-बाप के साथ नेकी का हुक्म, तो दूसरी तरफ अल्लाह की इबादत की पाकीज़गी। यानी इंसान का दिल माँ-बाप की मुहब्बत से भरा हो, लेकिन उसकी सबसे बड़ी मुहब्बत और इताअत अल्लाह के लिए हो। अगर माँ-बाप भी अल्लाह की राह से हटाकर किसी और राह पर ले जाना चाहें, तो उनकी बात न मानना ही अल्लाह के करीब होने का ज़रिया है।

याद रखिए! माँ-बाप की सेवा और उनके साथ अच्छा व्यवहार जन्नत की चाबी है, लेकिन अल्लाह की रज़ा सबसे ऊपर है। जो इंसान अल्लाह की राह पर चलते हुए माँ-बाप की खिदमत करता है, अल्लाह उसे दुनिया में भी इज़्ज़त देता है और आख़िरत में भी। आइए हम सब अपने माँ-बाप से मुहब्बत करें, उनकी खिदमत करें, लेकिन कभी भी उनकी खातिर अल्लाह की नाफ़रमानी न करें। यही कामयाबी की राह है।



📜 आयत 6-10 — सूरा अल-अंकबूत

6وَمَن جَاهَدَ فَإِنَّمَا يُجَاهِدُ لِنَفْسِهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
और जो शख्स (इबादत में) कोशिश करता है तो बस अपने ही वास्ते कोशिश करता है (क्योंकि) इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा सारे जहाँन (की इबादत) से बेनियाज़ है
7وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَحْسَنَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए हम यक़ीनन उनके गुनाहों की तरफ से कफ्फारा क़रार देगें और ये (दुनिया में) जो आमाल करते थे हम उनके आमाल की उन्हें अच्छी से अच्छी जज़ा अता करेंगे
8وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ حُسْنًا ۖ وَإِن جَاهَدَاكَ لِتُشْرِكَ بِي مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ فَلَا تُطِعْهُمَا ۚ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
और हमने इन्सान को अपने माँ बाप से अच्छा बरताव करने का हुक्म दिया है और (ये भी कि) अगर तुझे तेरे माँ बाप इस बात पर मजबूर करें कि ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बना जिन (के शरीक होने) का मुझे इल्म तक नहीं तो उनका कहना न मानना तुम सबको (आख़िर एक दिन) मेरी तरफ लौट कर आना है मै जो कुछ तुम लोग (दुनिया में) करते थे बता दूँगा
9وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُدْخِلَنَّهُمْ فِي الصَّالِحِينَ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए हम उन्हें (क़यामत के दिन) ज़रुर नेको कारों में दाख़िल करेंगे
10وَمِنَ النَّاسِ مَن يَقُولُ آمَنَّا بِاللَّهِ فَإِذَا أُوذِيَ فِي اللَّهِ جَعَلَ فِتْنَةَ النَّاسِ كَعَذَابِ اللَّهِ وَلَئِن جَاءَ نَصْرٌ مِّن رَّبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمْ ۚ أَوَلَيْسَ اللَّهُ بِأَعْلَمَ بِمَا فِي صُدُورِ الْعَالَمِينَ
और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो (ज़बान से तो) कह देते हैं कि हम ख़ुदा पर ईमान लाए फिर जब उनको ख़ुदा के बारे में कुछ तकलीफ़ पहुँची तो वह लोगों की तकलीफ़ देही को अज़ाब के बराबर ठहराते हैं और (ऐ रसूल) अगर तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की मदद आ पहुँची और तुम्हें फतेह हुई तो यही लोग कहने लगते हैं कि हम भी तो तुम्हारे साथ ही साथ थे भला जो कुछ सारे जहाँन के दिलों में है क्या ख़ुदा बख़ूबी वाक़िफ नहीं (ज़रुर है)
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीअवतरण स्थान
8आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 8

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Wednesday, September 30, 2026

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