هَاجَرُوا (हाजरू): अपने घर-बार और वतन को छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की खातिर हिजरत (प्रवास) करने वाले।
جَاهَدُوا (जाहदू): अल्लाह के मार्ग में अपनी जान, माल और वचन से संघर्ष किया, विशेषकर कुफ्फार के विरुद्ध जिहाद किया।
يَرْجُونَ (यरजूना): आशा रखते हैं, उम्मीद करते हैं।
رَحْمَتَ (रहमत): अल्लाह की दया, कृपा और क्षमा।
तफसीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों का ज़िक्र कर रहा है जिन्होंने ईमान लाकर सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को माना और अपने अमल को उसके हुक्म के मुताबिक ढाला। फिर उन लोगों का ज़िक्र है जिन्होंने अल्लाह की राह में अपने वतन, अपने घर-बार, अपने रिश्तेदारों और अपनी ज़मीन-जायदाद को छोड़ दिया—यानी हिजरत की—और इसके बाद उन्होंने अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया, यानी दुश्मनों से लड़े ताकि अल्लाह का कलिमा (शब्द) बुलंद हो और दीन का निज़ाम क़ायम हो।
ऐसे लोगों के बारे में अल्लाह फ़रमाता है कि वे अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखते हैं। यह उम्मीद कोई खोखली आशा नहीं, बल्कि वह अमल पर आधारित है—ईमान, हिजरत और जिहाद। वे जानते हैं कि उनके अमल अकेले नजात के लिए काफी नहीं, बल्कि उन्हें अल्लाह की रहमत और मगफिरत की सख्त ज़रूरत है। इसलिए वे अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखते हैं, और अल्लाह ने उन्हें यकीन दिलाया कि वह ग़फूर (बहुत क्षमा करने वाला) और रहीम (बहुत दयालु) है। वह अपने बंदों की गलतियों को माफ करता है और उन्हें भरपूर अज्र (इनाम) अता करता है।
फ़ायदे (उपदेश):
ईमान के साथ अमल ज़रूरी है: सिर्फ ज़ुबान से ईमान काफी नहीं, बल्कि अमल और कुर्बानी से उसे साबित करना होता है। हिजरत और जिहाद इसी की मिसाल हैं।
अल्लाह की रहमत की उम्मीद: मुसलमान को अपने अमल पर घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए। यह उम्मीद उसे अच्छे अमल की तरफ ले जाती है।
कुर्बानी की अहमियत: अपने वतन, घर और आराम को छोड़कर अल्लाह की राह में निकलना बड़ी कुर्बानी है, और अल्लाह ऐसी कुर्बानी को कभी बेकार नहीं जाने देता।
अल्लाह की मगफिरत की विशालता: अल्लाह ग़फूर और रहीम है—वह अपने बंदों की कमजोरियों और गलतियों को माफ करता है, बशर्ते वे सच्चे दिल से उसकी तरफ रुजू करें।
जिहाद का मक़सद: जिहाद का असली मक़सद अल्लाह का कलिमा बुलंद करना है, न कि ज़मीन हासिल करना या दुनियावी मक़ाम। यही वह रास्ता है जो अल्लाह की रहमत तक पहुंचाता है।
(मुसलमानों) तुम पर जिहाद फर्ज क़िया गया अगरचे तुम पर शाक़ ज़रुर है और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ (जिहाद) को नापसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ को पसन्द करो हालॉकि वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो और ख़ुदा (तो) जानता ही है मगर तुम नही जानते हो
(ऐ रसूल) तुमसे लोग हुरमत वाले महीनों की निस्बत पूछते हैं कि (आया) जिहाद उनमें जायज़ है तो तुम उन्हें जवाब दो कि इन महीनों में जेहाद बड़ा गुनाह है और ये भी याद रहे कि ख़ुदा की राह से रोकना और ख़ुदा से इन्कार और मस्जिदुल हराम (काबा) से रोकना और जो उस के अहल है उनका मस्जिद से निकाल बाहर करना (ये सब) ख़ुदा के नज़दीक इस से भी बढ़कर गुनाह है और फ़ितना परदाज़ी कुश्ती ख़़ून से भी बढ़ कर है और ये कुफ्फ़ार हमेशा तुम से लड़ते ही चले जाएँगें यहाँ तक कि अगर उन का बस चले तो तुम को तुम्हारे दीन से फिरा दे और तुम में जो शख्स अपने दीन से फिरा और कुफ़्र की हालत में मर गया तो ऐसों ही का किया कराया सब कुछ दुनिया और आखेरत (दोनों) में अकारत है और यही लोग जहन्नुमी हैं (और) वह उसी में हमेशा रहेंगें
(ऐ रसूल) तुमसे लोग शराब और जुए के बारे में पूछते हैं तो तुम उन से कह दो कि इन दोनो में बड़ा गुनाह है और कुछ फायदे भी हैं और उन के फायदे से उन का गुनाह बढ़ के है और तुम से लोग पूछते हैं कि ख़ुदा की राह में क्या ख़र्च करे तुम उनसे कह दो कि जो तुम्हारे ज़रुरत से बचे यूँ ख़ुदा अपने एहकाम तुम से साफ़ साफ़ बयान करता है
ताकि तुम दुनिया और आख़िरत (के मामलात) में ग़ौर करो और तुम से लोग यतीमों के बारे में पूछते हैं तुम (उन से) कह दो कि उनकी (इसलाह दुरुस्ती) बेहतर है और अगर तुम उन से मिलजुल कर रहो तो (कुछ हर्ज) नहीं आख़िर वह तुम्हारें भाई ही तो हैं और ख़ुदा फ़सादी को ख़ैर ख्वाह से (अलग ख़ूब) जानता है और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम को मुसीबत में डाल देता बेशक ख़ुदा ज़बरदस्त हिक़मत वाला है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।