Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الشَّهْرِ الْحَرَامِ: वह पवित्र महीना जिसमें युद्ध वर्जित है — यानी ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम और रजब।
- صَدٌّ: रोकना, बाधा डालना।
- الْفِتْنَةُ: यहाँ इसका अर्थ शिर्क (बहुदेववाद) और लोगों को ईमान से भटकाना है।
- حَبِطَتْ: नष्ट हो गए, बेकार हो गए।
- يَرْتَدِدْ: अपने धर्म से फिर जाए (धर्मत्यागी हो जाए)।
व्याख्या:
हे प्यारे नबी! लोग आपसे पूछते हैं कि पवित्र महीनों (हराम महीनों) में युद्ध करने का क्या हुक्म है? तो आप उन्हें स्पष्ट उत्तर दें कि इन महीनों में युद्ध करना अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ा गुनाह है, क्योंकि इन महीनों की पवित्रता का सम्मान करना अनिवार्य है। लेकिन यह बात ध्यान देने योग्य है कि मक्का के काफिरों के अपराध इससे भी कहीं बड़े हैं। वे लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकते हैं, अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने से रोकते हैं, मुसलमानों को मस्जिद-ए-हराम (काबा) में आने से रोकते हैं, और काबा के असली अधिकारियों — यानी नबी और उनके साथियों — को उनके घर से निकाल देते हैं। ये सारे अपराध अल्लाह के यहाँ पवित्र महीने में युद्ध करने से कहीं अधिक गंभीर और भारी हैं।
और याद रखो, शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार ठहराना) और लोगों को ईमान से भटकाना, किसी इंसान की जान लेने से भी बड़ा अपराध है। क्योंकि जान तो एक शरीर की मौत है, लेकिन शिर्क और फितना इंसान की आत्मा और उसकी आख़िरत को तबाह कर देता है।
ये काफिर अपनी इन बुराइयों से बाज़ नहीं आएंगे। वे लगातार तुमसे लड़ते रहेंगे, जब तक कि वे तुम्हें तुम्हारे धर्म (इस्लाम) से फेर न दें — अगर वे ऐसा कर सकें। लेकिन अल्लाह की मेहरबानी से वे ऐसा नहीं कर पाएंगे।
अब उन लोगों के लिए चेतावनी है जो ईमान लाने के बाद धर्मत्यागी हो जाते हैं और कुफ्र की हालत में मर जाते हैं — उनके सारे अच्छे काम (नेकियाँ) इस दुनिया और आख़िरत दोनों में बेकार हो जाएंगे। उनके नमाज़, रोज़े, ज़कात — सब कुछ रद्द हो जाएगा। और उनका ठिकाना जहन्नम की आग होगी, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। यह उनका हिस्सा है — कोई रिहाई नहीं।
दावत और नसीहत:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में हिंसा और खून-खराबा पसंदीदा चीज़ नहीं है, बल्कि शांति और अमन इस्लाम की पहचान है। लेकिन जब दुश्मन खुद हमले करें, धर्म को मिटाने की कोशिश करें, और लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकें, तो उस समय अपने धर्म और अपनी इज़्ज़त की हिफाज़त करना भी ज़रूरी हो जाता है। इस्लाम ने हमेशा इंसानियत की भलाई और अमन को तरजीह दी है। अल्लाह हमें अपने धर्म पर साबित क़दम रहने की तौफ़ीक़ दे, और हमें उन लोगों में शामिल करे जो ईमान पर जीते हैं और ईमान पर ही मरते हैं। आमीन।
📜 आयत 215-219 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 217
सूरा अल-बकरा आयत 217 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) तुमसे लोग हुरमत वाले महीनों की निस्बत पूछते…सूरा आयत 217/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 215–219. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, September 29, 2026
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