Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- مَكَّنَّاهُمْ (मक्कन्नाहुम): हमने उन्हें शक्ति और अधिकार दिया।
- أَقَامُوا الصَّلَاةَ (अक़ामुस्सलात): नमाज़ को पूरी पाबंदी से अदा किया।
- آتَوُا الزَّكَاةَ (आतवुज़्ज़कात): ज़कात दी।
- بِالْمَعْرُوفِ (बिल्म'रूफ़): भलाई का काम।
- عَنِ الْمُنكَرِ (अनिल्मुन्कर): बुराई से।
- عَاقِبَةُ الْأُمُورِ (आक़िबतुल उमूर): सभी मामलों का अंजाम।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन मोमिनों की पहचान बयान करती है जिन्हें अल्लाह तआला ने ज़मीन पर हुकूमत और ताक़त का वादा दिया है। ये वे लोग हैं जिन्हें जब अल्लाह ज़मीन में क़ुदरत और इख़्तियार देता है, दुश्मनों पर फ़तह नसीब करता है, तो वे इस ताक़त का ग़लत इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उसे अल्लाह की राह में लगाते हैं।
सबसे पहले वे नमाज़ क़ायम करते हैं — यानी सिर्फ़ नमाज़ पढ़ते ही नहीं, बल्कि उसे पूरी पाबंदी, ख़ुशू-ख़ुज़ू और उसके आदाब के साथ अदा करते हैं, और अपने परिवार और समाज को भी नमाज़ की पाबंदी की तालीम देते हैं। नमाज़ ही वह रीढ़ है जो इंसान को बुराइयों से रोकती है और उसे अल्लाह से जोड़ती है।
फिर वे ज़कात अदा करते हैं — यानी अपने माल में से अल्लाह का हक़ निकालकर उसे हक़दारों तक पहुँचाते हैं। ज़कात से समाज में बराबरी आती है, ग़रीबों की मदद होती है और माल में बरकत होती है। यह उनकी हुकूमत का सबूत है कि वे अपनी ताक़त और दौलत को सिर्फ़ अपने लिए नहीं रखते, बल्कि दूसरों के साथ बाँटते हैं।
इसके बाद वे भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं — यानी वे समाज में अच्छाई को फैलाने का हर मुमकिन ज़रिया इख्तियार करते हैं। अच्छाई यानी हर वह काम जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को पसंद है — सच्चाई, ईमानदारी, इंसाफ़, रहमदिली, अमानत और नेकी। और बुराई यानी हर वह काम जो अल्लाह ने मना किया है — झूठ, धोखा, ज़ुल्म, रिश्वत, बदइमानी और फ़साद। वे न सिर्फ़ ख़ुद बुराई से बचते हैं, बल्कि समाज को भी उससे बचाने की कोशिश करते हैं।
आयत के अंत में अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और अल्लाह ही के पास सब मामलों का अंजाम है।" यानी सारे कामों की आख़िरी मंज़िल अल्लाह की तरफ़ है। हुकूमत हो या दौलत, ताक़त हो या इख़्तियार — सब कुछ फ़ना होने वाला है, और सबका आख़िरी फ़ैसला अल्लाह के पास है। इसलिए अक़्लमंद वही है जो इस दुनिया की ताक़त को आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया बनाए।
दावती पहलू:
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि एक पूरा निज़ाम-ए-हयात है। जब अल्लाह किसी को ताक़त देता है, तो वह इम्तिहान होता है — कि वह उस ताक़त का इस्तेमाल कैसे करता है। जो लोग इस इम्तिहान में कामयाब होते हैं, वे नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं, भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं। यही वह रास्ता है जो दुनिया में सुकून और आख़िरत में कामयाबी देता है। आज हमें भी इसी रास्ते पर चलने की ज़रूरत है — चाहे हमारे पास ताक़त हो या न हो, हम अपनी जगह से नेकी फैलाने और बुराई रोकने की कोशिश करते रहें। अल्लाह का वादा है कि जो लोग इस रास्ते पर चलेंगे, उन्हें दुनिया में भी इज़्ज़त मिलेगी और आख़िरत में भी। और सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि हमारा अंजाम अल्लाह की रज़ा और जन्नत हो।
📜 आयत 39-43 — सूरा अल-हज
अनुवाद — अल-हज 41
सूरा अल-हज आयत 41 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ये वह लोग हैं कि अगर हम इन्हें रूए ज़मीन…सूरा आयत 41/78 — सूरा अल-हज الحج (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-हज सुनें, सूरा अल-हज अनुवाद, सूरा अल-हज mp3, सूरा अल-हज pdf. आयत 39–43. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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