अल-हज · 41/78
अनुवाद उच्चारण — अल-हज
الَّذِينَ إِن مَّكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنكَرِ ۗ وَلِلَّهِ عَاقِبَةُ الْأُمُورِ ۝٤١
Allazeena im makkan naahum fil ardi aqaamus Salaata wa aatawuz Zakaata wa amaroo bilma`roofi wa nahaw `anil munkar; wa lillaahi `aaqibatul umoor
📖 हिंदी अर्थ
ये वह लोग हैं कि अगर हम इन्हें रूए ज़मीन पर क़ाबू दे दे तो भी यह लोग पाबन्दी से नमाजे अदा करेंगे और ज़कात देंगे और अच्छे-अच्छे काम का हुक्म करेंगे और बुरी बातों से (लोगों को) रोकेंगे और (यूँ तो) सब कामों का अन्जाम खुदा ही के एख्तेयार में है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَكَّنَّاهُمْ (मक्कन्नाहुम): हमने उन्हें शक्ति और अधिकार दिया।
  • أَقَامُوا الصَّلَاةَ (अक़ामुस्सलात): नमाज़ को पूरी पाबंदी से अदा किया।
  • آتَوُا الزَّكَاةَ (आतवुज़्ज़कात): ज़कात दी।
  • بِالْمَعْرُوفِ (बिल्म'रूफ़): भलाई का काम।
  • عَنِ الْمُنكَرِ (अनिल्मुन्कर): बुराई से।
  • عَاقِبَةُ الْأُمُورِ (आक़िबतुल उमूर): सभी मामलों का अंजाम।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मोमिनों की पहचान बयान करती है जिन्हें अल्लाह तआला ने ज़मीन पर हुकूमत और ताक़त का वादा दिया है। ये वे लोग हैं जिन्हें जब अल्लाह ज़मीन में क़ुदरत और इख़्तियार देता है, दुश्मनों पर फ़तह नसीब करता है, तो वे इस ताक़त का ग़लत इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उसे अल्लाह की राह में लगाते हैं।

सबसे पहले वे नमाज़ क़ायम करते हैं — यानी सिर्फ़ नमाज़ पढ़ते ही नहीं, बल्कि उसे पूरी पाबंदी, ख़ुशू-ख़ुज़ू और उसके आदाब के साथ अदा करते हैं, और अपने परिवार और समाज को भी नमाज़ की पाबंदी की तालीम देते हैं। नमाज़ ही वह रीढ़ है जो इंसान को बुराइयों से रोकती है और उसे अल्लाह से जोड़ती है।

फिर वे ज़कात अदा करते हैं — यानी अपने माल में से अल्लाह का हक़ निकालकर उसे हक़दारों तक पहुँचाते हैं। ज़कात से समाज में बराबरी आती है, ग़रीबों की मदद होती है और माल में बरकत होती है। यह उनकी हुकूमत का सबूत है कि वे अपनी ताक़त और दौलत को सिर्फ़ अपने लिए नहीं रखते, बल्कि दूसरों के साथ बाँटते हैं।

इसके बाद वे भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं — यानी वे समाज में अच्छाई को फैलाने का हर मुमकिन ज़रिया इख्तियार करते हैं। अच्छाई यानी हर वह काम जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को पसंद है — सच्चाई, ईमानदारी, इंसाफ़, रहमदिली, अमानत और नेकी। और बुराई यानी हर वह काम जो अल्लाह ने मना किया है — झूठ, धोखा, ज़ुल्म, रिश्वत, बदइमानी और फ़साद। वे न सिर्फ़ ख़ुद बुराई से बचते हैं, बल्कि समाज को भी उससे बचाने की कोशिश करते हैं।

आयत के अंत में अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और अल्लाह ही के पास सब मामलों का अंजाम है।" यानी सारे कामों की आख़िरी मंज़िल अल्लाह की तरफ़ है। हुकूमत हो या दौलत, ताक़त हो या इख़्तियार — सब कुछ फ़ना होने वाला है, और सबका आख़िरी फ़ैसला अल्लाह के पास है। इसलिए अक़्लमंद वही है जो इस दुनिया की ताक़त को आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया बनाए।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि एक पूरा निज़ाम-ए-हयात है। जब अल्लाह किसी को ताक़त देता है, तो वह इम्तिहान होता है — कि वह उस ताक़त का इस्तेमाल कैसे करता है। जो लोग इस इम्तिहान में कामयाब होते हैं, वे नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं, भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं। यही वह रास्ता है जो दुनिया में सुकून और आख़िरत में कामयाबी देता है। आज हमें भी इसी रास्ते पर चलने की ज़रूरत है — चाहे हमारे पास ताक़त हो या न हो, हम अपनी जगह से नेकी फैलाने और बुराई रोकने की कोशिश करते रहें। अल्लाह का वादा है कि जो लोग इस रास्ते पर चलेंगे, उन्हें दुनिया में भी इज़्ज़त मिलेगी और आख़िरत में भी। और सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि हमारा अंजाम अल्लाह की रज़ा और जन्नत हो।

🎧 सुनें

📜 आयत 39-43 — अल-हज

39أُذِنَ لِلَّذِينَ يُقَاتَلُونَ بِأَنَّهُمْ ظُلِمُوا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ نَصْرِهِمْ لَقَدِيرٌ
जिन (मुसलमानों) से (कुफ्फ़ार) लड़ते थे चूँकि वह (बहुत) सताए गए उस वजह से उन्हें भी (जिहाद) की इजाज़त दे दी गई और खुदा तो उन लोगों की मदद पर यक़ीनन क़ादिर (वत वाना) है
40الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِم بِغَيْرِ حَقٍّ إِلَّا أَن يَقُولُوا رَبُّنَا اللَّهُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ اللَّهِ النَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍ لَّهُدِّمَتْ صَوَامِعُ وَبِيَعٌ وَصَلَوَاتٌ وَمَسَاجِدُ يُذْكَرُ فِيهَا اسْمُ اللَّهِ كَثِيرًا ۗ وَلَيَنصُرَنَّ اللَّهُ مَن يَنصُرُهُ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَقَوِيٌّ عَزِيزٌ
ये वह (मज़लूम हैं जो बेचारे) सिर्फ इतनी बात कहने पर कि हमारा परवरदिगार खुदा है (नाहक़) अपने-अपने घरों से निकाल दिए गये और अगर खुदा लोगों को एक दूसरे से दूर दफा न करता रहता तो गिरजे और यहूदियों के इबादत ख़ाने और मजूस के इबादतख़ाने और मस्जिद जिनमें कसरत से खुदा का नाम लिया जाता है कब के कब ढहा दिए गए होते और जो शख्स खुदा की मदद करेगा खुदा भी अलबत्ता उसकी मदद ज़रूर करेगा बेशक खुदा ज़रूर ज़बरदस्त ग़ालिब है
41الَّذِينَ إِن مَّكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ أَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ وَأَمَرُوا بِالْمَعْرُوفِ وَنَهَوْا عَنِ الْمُنكَرِ ۗ وَلِلَّهِ عَاقِبَةُ الْأُمُورِ
ये वह लोग हैं कि अगर हम इन्हें रूए ज़मीन पर क़ाबू दे दे तो भी यह लोग पाबन्दी से नमाजे अदा करेंगे और ज़कात देंगे और अच्छे-अच्छे काम का हुक्म करेंगे और बुरी बातों से (लोगों को) रोकेंगे और (यूँ तो) सब कामों का अन्जाम खुदा ही के एख्तेयार में है
42وَإِن يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَعَادٌ وَثَمُودُ
और (ऐ रसूल) अगर ये (कुफ्फ़ार) तुमको झुठलाते हैं तो कोइ ताज्जुब की बात नहीं उनसे पहले नूह की क़ौम और (क़ौमे आद और समूद)
43وَقَوْمُ إِبْرَاهِيمَ وَقَوْمُ لُوطٍ
और इबराहीम की क़ौम और लूत की क़ौम
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीRevelation
41आयत

अनुवाद — अल-हज 41

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Tuesday, August 18, 2026

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