अन-नूर · 52/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ ۝٥٢
Wa mai yuti`il laaha wa Rasoolahoo wa yakhshal laaha wa yattaqhi fa ulaaa`ika humul faaa`izoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख्स ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म माने और ख़ुदा से डरे और उस (की नाफरमानी) से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُطِعِ: आज्ञा का पालन करे
  • وَيَخْشَ: डरे
  • وَيَتَّقْهِ: उससे बचे (अल्लाह के अज़ाब से सुरक्षित रहे)
  • الْفَائِزُونَ: सफलता पाने वाले, कामयाब लोग

तफ़सीर:

यह आयत मोमिनों को उस सर्वोच्च सफलता की ओर मार्गदर्शन करती है जो हर इंसान की असली चाहत होती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की आज्ञा का पालन करता है—यानी जो कुछ अल्लाह और उसके नबी ने हुक्म दिया है उसे मानता है और जिससे रोका है उससे रुक जाता है—और साथ ही वह अल्लाह से डरता है, अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होता है और उसके अज़ाब से सहमा रहता है, और अपनी बाकी ज़िंदगी में गुनाहों से बचता हुआ तक़वा अपनाता है, तो ऐसे लोग ही असली कामयाब हैं।

यहाँ "फ़व्ज़" (सफलता) का मतलब सिर्फ़ दुनिया की कामयाबी नहीं, बल्कि दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई है। यह वह सफलता है जो जन्नत की नेमतों, अल्लाह की रज़ा और उसकी रहमत तक पहुँचाती है। यह वही सफलता है जिसके लिए हर नेक इंसान कोशिश करता है और जिसके बिना दुनिया की हर दौलत बेकार है।

प्यारे भाइयो और बहनो! इस आयत में अल्लाह ने तीन चीज़ों को सफलता की शर्त बताया है: पहली—अल्लाह और रसूल की इताअत (आज्ञापालन), दूसरी—अल्लाह का ख़ौफ़ (डर), और तीसरी—तक़वा (परहेज़गारी)। यानी सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान काफ़ी नहीं, बल्कि अमल, दिल का डर और गुनाहों से बचाव—यह तीनों मिलकर इंसान को असली कामयाब बनाते हैं।

अल्लाह ने यहाँ "هُمُ الْفَائِزُونَ" (वही लोग सफल हैं) कहकर सिर्फ़ इन्हीं लोगों को सफल ठहराया है, यानी सफलता उन्हीं के लिए ख़ास है। यह एक बड़ी ख़ुशख़बरी है कि अल्लाह ने अपने बंदों के लिए सफलता का रास्ता साफ़ कर दिया है—बस ज़रूरत है उस पर चलने की। जो इन तीन गुणों को अपना ले, वह समझ ले कि उसकी मंज़िल जन्नत है, और यही सबसे बड़ी कामयाबी है।

आओ, हम सब अपनी ज़िंदगी को इस नुक़्ते पर ढालें—अल्लाह और रसूल की इताअत को अपना निशाना बनाएँ, अपने दिलों में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा करें, और हर उस चीज़ से बचें जो अल्लाह को नापसंद है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया की बेचैनियों से निकालकर आख़िरत की सुकून भरी ज़िंदगी तक पहुँचाएगा। अल्लाह हम सबको इस तौफ़ीक़ अता करे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 50-54 — अन-नूर

50أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ارْتَابُوا أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُ ۚ بَلْ أُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि (मुबादा) ख़ुदा और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- (ये सब कुछ नहीं) बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
51إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
ईमानदारों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको ख़ुदा और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने (हुक्म) सुना और (दिल से) मान लिया और यही लोग (आख़िरत में) कामयाब होने वाले हैं
52وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ
और जो शख्स ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म माने और ख़ुदा से डरे और उस (की नाफरमानी) से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
53۞ وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا ۖ طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
और (ऐ रसूल) उन (मुनाफेक़ीन) ने तुम्हारी इताअत की ख़ुदा की सख्त से सख्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र (घर बार छोड़कर) निकल खडे हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत (इससे बेहतर) और बेशक तुम जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
54قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا ۚ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज है
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अनुवाद — अन-नूर 52

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Tuesday, August 18, 2026

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