अन-नूर · 53/64
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नूर
۞ وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا ۖ طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ ۝٥٣
Wa aqsamoo billaahi jahda aimaanihim la`in amartahum la yakhrujunna qul laa tuqsimoo taa`atum ma`roofah innal laaha khabeerum bimaa ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) उन (मुनाफेक़ीन) ने तुम्हारी इताअत की ख़ुदा की सख्त से सख्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र (घर बार छोड़कर) निकल खडे हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत (इससे बेहतर) और बेशक तुम जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ (जहद अयमानिहिम): अपनी क़समों में पूरी कोशिश और सख्ती करना, यानी बड़ी-बड़ी क़समें खाना।
  • لَيَخْرُجُنَّ (लयखरुजुन्न): वे अवश्य निकलेंगे (जिहाद के लिए)।
  • طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ (ताअतुन मारूफ़ा): अच्छी और जानी-पहचानी आज्ञाकारिता, यानी सच्ची और खरी आज्ञाकारिता।

तफसीर:

यह आयत मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के उस रवैये का पर्दाफाश करती है जो वे रसूलुल्लाह ﷺ के सामने अपनाते थे। वे लोग बड़ी-बड़ी क़समें खाकर कहते थे कि अगर आप हमें जिहाद का हुक्म देंगे तो हम ज़रूर निकल पड़ेंगे और आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगे। लेकिन अल्लाह तआला ने उनकी इस झूठी बात का पोस्टमार्टम करते हुए फ़रमाया कि ऐ रसूल! इनसे कह दो कि तुम क़समें खाना बंद करो, क्योंकि तुम्हारी आज्ञाकारिता तो सिर्फ़ ज़ुबानी है, दिल से उसमें कोई सच्चाई नहीं। तुम्हारी असली आज्ञाकारिता तो वह है जो अच्छे और सच्चे इरादे से हो, न कि वह जो सिर्फ़ दिखावे के लिए ज़ुबान से निकाली जाए।

अल्लाह तआला ने उन्हें आगाह किया कि वह हर उस चीज़ से पूरी तरह वाक़िफ़ है जो तुम करते हो, चाहे तुम उसे छिपाओ या दिखाओ। तुम्हारी नीयतें, तुम्हारे दिल के राज़, तुम्हारे अंदर की खोट — सब कुछ उसके इल्म में है। वह तुम्हारे अमल का पूरा-पूरा हिसाब लेगा और तुम्हें तुम्हारे किए का बदला देगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का इक़रार नहीं, बल्कि दिल की गवाही और अमल की सच्चाई है। अल्लाह तआला उस बंदे को पसंद करता है जो सच्चे दिल से उसकी इताअत करे, चाहे उसकी ज़ुबान पर क़समों की बहार न भी हो। याद रखिए, अल्लाह के नाम की क़समें उस वक़्त बेकार हैं जब दिल में झूठ और दिखावा हो। सच्ची इताअत ही वह चीज़ है जो इंसान को अल्लाह के करीब लाती है और उसकी रहमत का हक़दार बनाती है। आइए, हम अपने अमल को सच्चाई और ख़ुलूस से भरें, क्योंकि अल्लाह हर छोटे-बड़े अमल से बाख़बर है और वह अपने सच्चे बंदों को इस दुनिया और आख़िरत में कामयाबी से नवाज़ेगा।



📜 आयत 51-55 — सूरा अन-नूर

51إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
ईमानदारों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको ख़ुदा और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने (हुक्म) सुना और (दिल से) मान लिया और यही लोग (आख़िरत में) कामयाब होने वाले हैं
52وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ
और जो शख्स ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म माने और ख़ुदा से डरे और उस (की नाफरमानी) से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
53۞ وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا ۖ طَاعَةٌ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
और (ऐ रसूल) उन (मुनाफेक़ीन) ने तुम्हारी इताअत की ख़ुदा की सख्त से सख्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र (घर बार छोड़कर) निकल खडे हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत (इससे बेहतर) और बेशक तुम जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
54قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا ۚ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज है
55وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِي الْأَرْضِ كَمَا اسْتَخْلَفَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ الَّذِي ارْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّن بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًا ۚ يَعْبُدُونَنِي لَا يُشْرِكُونَ بِي شَيْئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम में से जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से ख़ुदा ने वायदा किया कि उन को (एक न एक) दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर (अपना) नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है (इस्लाम) उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद (उनकी हर आस को) अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह (इत्मेनान से) मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो शख्स इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीअवतरण स्थान
53आयत

अनुवाद — अन-नूर 53

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Thursday, October 1, 2026

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