अल-अंकबूत · 46/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
۞ وَلَا تُجَادِلُوا أَهْلَ الْكِتَابِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ ۖ وَقُولُوا آمَنَّا بِالَّذِي أُنزِلَ إِلَيْنَا وَأُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ ۝٤٦
Wa laa tujaadilooo Ahlal Kitaabi illaa billatee hiya ahsanu illal lazeena zalamoo minhum wa qoolooo aamannaa billazeee unzila ilainaa wa unzila ilaikum wa illaahunna wa illahukum waahidunw-wa nahnu lahoo muslimoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ ईमानदारों) अहले किताब से मनाज़िरा न किया करो मगर उमदा और शाएस्ता अलफाज़ व उनवान से लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया (उनके साथ रिआयत न करो) और साफ साफ कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताब तुम पर नाज़िल हुई है हम तो सब पर ईमान ला चुके और हमारा माबूद और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फरमाबरदार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُجَادِلُوا: विवाद करना, झगड़ना, बहस करना।
  • بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ: सबसे अच्छे तरीके से, सबसे उत्तम शैली से।
  • ظَلَمُوا: अत्याचार किया, सीमा का उल्लंघन किया, हठधर्मिता और जिद की।
  • مُسْلِمُونَ: आज्ञाकारी, समर्पण करने वाले।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से बातचीत और विचार-विमर्श का सुंदर तरीका सिखा रहा है। वह फरमाता है: "हे मोमिनों! यहूदियों और ईसाइयों से विवाद मत करो, सिवाय उस तरीके के जो सबसे अच्छा और सबसे उत्तम हो।" यानी उनसे बहस करते समय नरमी, अदब, हिकमत (बुद्धिमत्ता) और अच्छी नसीहत का रास्ता अपनाओ। उन्हें सच्चाई की ओर बुलाने के लिए सबसे आसान और प्रभावी तरीका इस्तेमाल करो, ताकि उनके दिल नरम हों और वे सत्य को समझ सकें। लेकिन जो लोग उनमें से ज़ुल्म करें — यानी हठधर्मिता, जिद और विरोध पर अड़ जाएं, और तुमसे लड़ाई-झगड़ा करें, या सच्चाई को दबाने की कोशिश करें — तो उनके साथ नरमी नहीं, बल्कि सख्ती से पेश आओ। उनसे जिहाद करो, यहां तक कि वे इस्लाम कबूल कर लें या जज़िया (सुरक्षा कर) देकर मुस्लिम राज्य के संरक्षण में आ जाएं।

फिर अल्लाह तआला मोमिनों को सिखाता है कि अहले-किताब से कहो: "हम ईमान लाए हैं उस (कुरआन) पर जो हमारी तरफ उतारा गया, और उस (तौरात और इंजील) पर भी जो तुम्हारी तरफ उतारा गया।" यानी हम किसी भी अल्लाही किताब का इनकार नहीं करते, बल्कि हर उस चीज़ पर ईमान रखते हैं जो अल्लाह ने अपने नबियों पर उतारी। और यह भी कहो: "हमारा इलाह और तुम्हारा इलाह एक ही है — वह अल्लाह, जिसका कोई शरीक नहीं, न उसकी ज़ात में, न उसके गुणों में, न उसके अधिकारों में। और हम उसी के आज्ञाकारी और समर्पण करने वाले हैं।" यानी हम उसी की इबादत करते हैं, उसी के हुक्म के सामने सिर झुकाते हैं, और उसी की रज़ा के ताबेदार हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अहले-किताब से बातचीत का सही तरीका यह है कि हम उनके साथ न्याय और भलाई से पेश आएं, उनकी किताबों का सम्मान करें, और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं — बल्कि एक ही ईश्वर के बंदे हैं। हमारा उद्देश्य उन्हें जीतना नहीं, बल्कि सच्चाई की राह दिखाना है। और जब वे सच्चाई को समझ लें, तो यह हमारे लिए खुशी की बात है, क्योंकि हम सब अल्लाह के बंदे हैं और उसी की इबादत के लिए पैदा हुए हैं।

यह आयत मुसलमानों के लिए एक प्यारा पैगाम है कि इस्लाम दूसरों से नफरत नहीं सिखाता, बल्कि अच्छे संवाद, नरमी और हिकमत से सच्चाई तक पहुंचाने का तरीका सिखाता है। अल्लाह तआला चाहता है कि हम दुनिया में अमन और भाईचारे का पैगाम फैलाएं, और लोगों को अपनी अच्छी सीरत और सुंदर बातों से इस्लाम की रौशनी की ओर बुलाएं। याद रखें, जो लोग सच्चाई के दुश्मन हैं और ज़ुल्म पर अड़े हैं, उनके लिए अल्लाह ने मुसलमानों को ताकत और इजाज़त दी है कि वे उनका मुकाबला करें — लेकिन इंसाफ के साथ, क्योंकि अल्लाह इंसाफ करने वालों से मुहब्बत करता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 44-48 — अल-अंकबूत

44خَلَقَ اللَّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ
ख़ुदा ने सारे आसमान और ज़मीन को बिल्कुल ठीक पैदा किया इसमें शक नहीं कि उसमें ईमानदारों के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) यक़ीनी बड़ी निशानी है
45اتْلُ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِنَ الْكِتَابِ وَأَقِمِ الصَّلَاةَ ۖ إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ ۗ وَلَذِكْرُ اللَّهِ أَكْبَرُ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَصْنَعُونَ
(ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे पास नाज़िल की गयी है उसकी तिलावत करो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो बेशक नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से बाज़ रखती है और ख़ुदा की याद यक़ीनी बड़ा मरतबा रखती है और तुम लोग जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे वाक़िफ है
46۞ وَلَا تُجَادِلُوا أَهْلَ الْكِتَابِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ ۖ وَقُولُوا آمَنَّا بِالَّذِي أُنزِلَ إِلَيْنَا وَأُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ
और (ऐ ईमानदारों) अहले किताब से मनाज़िरा न किया करो मगर उमदा और शाएस्ता अलफाज़ व उनवान से लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया (उनके साथ रिआयत न करो) और साफ साफ कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताब तुम पर नाज़िल हुई है हम तो सब पर ईमान ला चुके और हमारा माबूद और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फरमाबरदार है
47وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ ۚ فَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۖ وَمِنْ هَٰؤُلَاءِ مَن يُؤْمِنُ بِهِ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِآيَاتِنَا إِلَّا الْكَافِرُونَ
और (ऐ रसूल जिस तरह अगले पैग़म्बरों पर किताबें उतारी) उसी तरह हमने तुम्हारे पास किताब नाज़िल की तो जिन लोगों को हमने (पहले) किताब अता की है वह उस पर भी ईमान रखते हैं और (अरबो) में से बाज़ वह हैं जो उस पर ईमान रखते हैं और हमारी आयतों के तो बस पक्के कट्टर काफिर ही मुनकिर है
48وَمَا كُنتَ تَتْلُو مِن قَبْلِهِ مِن كِتَابٍ وَلَا تَخُطُّهُ بِيَمِينِكَ ۖ إِذًا لَّارْتَابَ الْمُبْطِلُونَ
और (ऐ रसूल) क़ुरान से पहले न तो तुम कोई किताब ही पढ़ते थे और न अपने हाथ से तुम लिखा करते थे ऐसा होता तो ये झूठे ज़रुर (तुम्हारी नबुवत में) शक करते
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीRevelation
46आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 46

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Tuesday, August 18, 2026

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