Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- تُجَادِلُوا: विवाद करना, झगड़ना, बहस करना।
- بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ: सबसे अच्छे तरीके से, सबसे उत्तम शैली से।
- ظَلَمُوا: अत्याचार किया, सीमा का उल्लंघन किया, हठधर्मिता और जिद की।
- مُسْلِمُونَ: आज्ञाकारी, समर्पण करने वाले।
तफसीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से बातचीत और विचार-विमर्श का सुंदर तरीका सिखा रहा है। वह फरमाता है: "हे मोमिनों! यहूदियों और ईसाइयों से विवाद मत करो, सिवाय उस तरीके के जो सबसे अच्छा और सबसे उत्तम हो।" यानी उनसे बहस करते समय नरमी, अदब, हिकमत (बुद्धिमत्ता) और अच्छी नसीहत का रास्ता अपनाओ। उन्हें सच्चाई की ओर बुलाने के लिए सबसे आसान और प्रभावी तरीका इस्तेमाल करो, ताकि उनके दिल नरम हों और वे सत्य को समझ सकें। लेकिन जो लोग उनमें से ज़ुल्म करें — यानी हठधर्मिता, जिद और विरोध पर अड़ जाएं, और तुमसे लड़ाई-झगड़ा करें, या सच्चाई को दबाने की कोशिश करें — तो उनके साथ नरमी नहीं, बल्कि सख्ती से पेश आओ। उनसे जिहाद करो, यहां तक कि वे इस्लाम कबूल कर लें या जज़िया (सुरक्षा कर) देकर मुस्लिम राज्य के संरक्षण में आ जाएं।
फिर अल्लाह तआला मोमिनों को सिखाता है कि अहले-किताब से कहो: "हम ईमान लाए हैं उस (कुरआन) पर जो हमारी तरफ उतारा गया, और उस (तौरात और इंजील) पर भी जो तुम्हारी तरफ उतारा गया।" यानी हम किसी भी अल्लाही किताब का इनकार नहीं करते, बल्कि हर उस चीज़ पर ईमान रखते हैं जो अल्लाह ने अपने नबियों पर उतारी। और यह भी कहो: "हमारा इलाह और तुम्हारा इलाह एक ही है — वह अल्लाह, जिसका कोई शरीक नहीं, न उसकी ज़ात में, न उसके गुणों में, न उसके अधिकारों में। और हम उसी के आज्ञाकारी और समर्पण करने वाले हैं।" यानी हम उसी की इबादत करते हैं, उसी के हुक्म के सामने सिर झुकाते हैं, और उसी की रज़ा के ताबेदार हैं।
यह आयत हमें सिखाती है कि अहले-किताब से बातचीत का सही तरीका यह है कि हम उनके साथ न्याय और भलाई से पेश आएं, उनकी किताबों का सम्मान करें, और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं — बल्कि एक ही ईश्वर के बंदे हैं। हमारा उद्देश्य उन्हें जीतना नहीं, बल्कि सच्चाई की राह दिखाना है। और जब वे सच्चाई को समझ लें, तो यह हमारे लिए खुशी की बात है, क्योंकि हम सब अल्लाह के बंदे हैं और उसी की इबादत के लिए पैदा हुए हैं।
यह आयत मुसलमानों के लिए एक प्यारा पैगाम है कि इस्लाम दूसरों से नफरत नहीं सिखाता, बल्कि अच्छे संवाद, नरमी और हिकमत से सच्चाई तक पहुंचाने का तरीका सिखाता है। अल्लाह तआला चाहता है कि हम दुनिया में अमन और भाईचारे का पैगाम फैलाएं, और लोगों को अपनी अच्छी सीरत और सुंदर बातों से इस्लाम की रौशनी की ओर बुलाएं। याद रखें, जो लोग सच्चाई के दुश्मन हैं और ज़ुल्म पर अड़े हैं, उनके लिए अल्लाह ने मुसलमानों को ताकत और इजाज़त दी है कि वे उनका मुकाबला करें — लेकिन इंसाफ के साथ, क्योंकि अल्लाह इंसाफ करने वालों से मुहब्बत करता है।
📜 आयत 44-48 — सूरा अल-अंकबूत
अनुवाद — अल-अंकबूत 46
सूरा अल-अंकबूत आयत 46 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और (ऐ ईमानदारों) अहले किताब से मनाज़िरा न किया करो…सूरा आयत 46/69 — सूरा अल-अंकबूत العنكبوت (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अंकबूत सुनें, सूरा अल-अंकबूत अनुवाद, सूरा अल-अंकबूत mp3, सूरा अल-अंकबूत pdf. आयत 44–48. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-अंकबूत
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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