आल-इमरान · 112/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوا إِلَّا بِحَبْلٍ مِّنَ اللَّهِ وَحَبْلٍ مِّنَ النَّاسِ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِّنَ اللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الْمَسْكَنَةُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ الْأَنبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ ۝١١٢
Duribat `alaihimuz zillatu aina maa suqifooo illaa bihablim minal laahi wa hablim minan naasi wa baaa`oo bighadabim minallaahi wa duribat `alaihimul maskanah; zaalika bi-annahum kaanoo yakfuroona bi Aayaatil laahi wa yaqtuloonal Ambiyaaa`a bighairi haqq; zaalika bimaa `asaw wa kaanoo ya`tadoon
📖 हिंदी अर्थ
और जहॉ कहीं हत्ते चढ़े उनपर रूसवाई की मार पड़ी मगर ख़ुदा के एहद (या) और लोगों के एहद के ज़रिये से (उनको कहीं पनाह मिल गयी) और फिर हेरफेर के खुदा के गज़ब में पड़ गए और उनपर मोहताजी की मार (अलग) पड़ी ये (क्यों) इस सबब से कि वह ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करते थे ये सज़ा उसकी है कि उन्होंने नाफ़रमानी की और हद से गुज़र गए थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ: उन पर अपमान और ज़िल्लत थोप दी गई।
  • أَيْنَ مَا ثُقِفُوا: जहाँ कहीं भी वे पाए जाएँ।
  • بِحَبْلٍ مِّنَ اللَّهِ: अल्लाह की ओर से अमन और सुरक्षा का वादा (इस्लाम या ज़िम्मा)।
  • وَبَاءُوا: वे लौटे (अर्थात उन्होंने कमाया)।
  • الْمَسْكَنَةُ: दरिद्रता, फ़क़ीरी और बेचारगी।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने बनी इसराईल (यहूदियों) की हालत बयान करते हुए फ़रमाया कि उन पर ज़िल्लत और रुसवाई का सिलसिला ऐसा लगा दिया गया कि वे जहाँ भी मिलें, वहीं अपमानित और दबे-कुचले हों। उनके पास कोई इज़्ज़त और ताक़त नहीं, सिवाय उस हालत के जब वे अल्लाह के वादे (इस्लाम क़बूल करने) या लोगों (मुसलमानों) की ओर से दी गई अमान (जज़िया या सुरक्षा) के सहारे किसी तरह से जीने की इजाज़त पा लें। यानी उनकी सुरक्षा का एकमात्र ज़रिया यही है कि वे मुसलमानों के संरक्षण में आ जाएँ, वरना उनकी कोई हैसियत नहीं।

इसके अलावा, वे अल्लाह के ग़ज़ब के भी हक़दार बने और उन पर मुसीबत और दरिद्रता भी मुसल्लत कर दी गई। यह सब कुछ उनके अपने कर्मों का नतीजा था, क्योंकि वे अल्लाह की आयतों (निशानियों और किताबों) का इनकार करते रहे और नबियों को नाहक़ क़त्ल करते रहे। यह सब उनकी नाफ़रमानी और हद से गुज़रने की वजह से हुआ। उन्होंने छोटे-छोटे गुनाहों पर अड़े रहकर बड़े जुर्म किए, यहाँ तक कि अल्लाह के प्यारे नबियों के क़त्ल तक पहुँच गए।


दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हमें सिखाती है कि इज़्ज़त और सरबुलंदी सिर्फ़ अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) में है। जो लोग अल्लाह के हुक्मों से मुँह मोड़ते हैं और उसकी निशानियों का मज़ाक उड़ाते हैं, वे दुनिया में भी ज़िल्लत उठाते हैं और आख़िरत में भी रुसवा होंगे। इसके विपरीत, जो लोग अल्लाह के धागे (क़ुरआन और सुन्नत) को मज़बूती से थाम लेते हैं, अल्लाह उन्हें इज़्ज़त देता है, चाहे दुनिया उनके ख़िलाफ़ ही क्यों न हो। प्यारे भाइयो! आज हम देखते हैं कि जो उम्मतें क़ुरआन से दूर हुईं, उन पर ज़िल्लत और मुसीबतें आईं। हमें चाहिए कि हम इस सबक़ से सीखें, अपने गुनाहों से तौबा करें, और अल्लाह की रस्सी (इस्लाम) को मज़बूती से पकड़ें। अल्लाह का वादा है कि जो लोग उसकी राह में एक-दूसरे के साथ जुड़े रहेंगे, वे कभी ज़िल्लत का शिकार नहीं होंगे। यही हमारी कामयाबी की कुंजी है।



📜 आयत 110-114 — आल-इमरान

110كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ ۗ وَلَوْ آمَنَ أَهْلُ الْكِتَابِ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُم ۚ مِّنْهُمُ الْمُؤْمِنُونَ وَأَكْثَرُهُمُ الْفَاسِقُونَ
तुम क्या अच्छे गिरोह हो कि (लोगों की) हिदायत के वास्ते पैदा किये गए हो तुम (लोगों को) अच्छे काम का हुक्म करते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो और अगर अहले किताब भी (इसी तरह) ईमान लाते तो उनके हक़ में बहुत अच्छा होता उनमें से कुछ ही तो ईमानदार हैं और अक्सर बदकार
111لَن يَضُرُّوكُمْ إِلَّا أَذًى ۖ وَإِن يُقَاتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
(मुसलमानों) ये लोग मामूली अज़ीयत के सिवा तुम्हें हरगिज़ ज़रर नहीं पहुंचा सकते और अगर तुमसे लड़ेंगे तो उन्हें तुम्हारी तरफ़ पीठ ही करनी होगी और फिर उनकी कहीं से मदद भी नहीं पहुंचेगी
112ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوا إِلَّا بِحَبْلٍ مِّنَ اللَّهِ وَحَبْلٍ مِّنَ النَّاسِ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِّنَ اللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الْمَسْكَنَةُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ الْأَنبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ
और जहॉ कहीं हत्ते चढ़े उनपर रूसवाई की मार पड़ी मगर ख़ुदा के एहद (या) और लोगों के एहद के ज़रिये से (उनको कहीं पनाह मिल गयी) और फिर हेरफेर के खुदा के गज़ब में पड़ गए और उनपर मोहताजी की मार (अलग) पड़ी ये (क्यों) इस सबब से कि वह ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करते थे ये सज़ा उसकी है कि उन्होंने नाफ़रमानी की और हद से गुज़र गए थे
113۞ لَيْسُوا سَوَاءً ۗ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ أُمَّةٌ قَائِمَةٌ يَتْلُونَ آيَاتِ اللَّهِ آنَاءَ اللَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ
और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि) अहले किताब से कुछ लोग तो ऐसे हैं कि (ख़ुदा के दीन पर) इस तरह साबित क़दम हैं कि रातों को ख़ुदा की आयतें पढ़ा करते हैं और वह बराबर सजदे किया करते हैं
114يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَأُولَٰئِكَ مِنَ الصَّالِحِينَ
खुदा और रोज़े आख़ेरत पर ईमान रखते हैं और अच्छे काम का तो हुक्म करते हैं और बुरे कामों से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ पड़ते हैं और यही लोग तो नेक बन्दों से हैं
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अनुवाद — आल-इमरान 112

सूरा आल-इमरान आयत 112 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जहॉ कहीं हत्ते चढ़े उनपर रूसवाई की मार पड़ी…

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Tuesday, August 18, 2026

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