आल-इमरान · 113/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
۞ لَيْسُوا سَوَاءً ۗ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ أُمَّةٌ قَائِمَةٌ يَتْلُونَ آيَاتِ اللَّهِ آنَاءَ اللَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ ۝١١٣
Laisoo sawaaa`a; min Ahlil Kitaabi ummatun qaaa`imatuny yatloona Aayaatil laahi aanaaa`al laili wa hum yasjudoon
📖 हिंदी अर्थ
और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि) अहले किताब से कुछ लोग तो ऐसे हैं कि (ख़ुदा के दीन पर) इस तरह साबित क़दम हैं कि रातों को ख़ुदा की आयतें पढ़ा करते हैं और वह बराबर सजदे किया करते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
0:00
0:00
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيْسُوا سَوَاءً: ये सब बराबर नहीं हैं, अर्थात सभी आह्ले-किताब एक जैसे नहीं हैं।
  • أُمَّةٌ قَائِمَةٌ: एक सीधी (स्थिर) जमात, जो दीन पर क़ायम है।
  • يَتْلُونَ: पढ़ते हैं (तिलावत करते हैं)।
  • آنَاءَ اللَّيْلِ: रात के घंटों में (रात की सभी सاعات)।
  • يَسْجُدُونَ: सजदा करते हैं, यानी नमाज़ पढ़ते हैं।

तफ़सीर:

ये सारे आह्ले-किताब (यहूदी और ईसाई) एक जैसे नहीं हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो सीधे रास्ते पर हैं, अल्लाह के दीन पर क़ायम हैं, और उसके आदेशों का पालन करते हैं। ये लोग रात के घंटों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं, उसके कलाम पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं, और सजदे में झुककर अल्लाह की इबादत करते हैं। ये वो लोग थे जो अपने दीन पर सच्चे दिल से क़ायम थे, और जब उन्हें नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैग़म्बरी की ख़बर मिली, तो उन्होंने ईमान लाकर इस्लाम क़बूल कर लिया। उनमें अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी जैसे लोग शामिल थे, जिन्होंने सच्चाई को पहचाना और उस पर अमल किया। ये वो लोग हैं जो अल्लाह की रात की इबादत, तिलावत और सजदों की वजह से दूसरों से अलग और बेहतर हैं।

फ़ायदे:

  1. ये आयत हमें सिखाती है कि किसी भी क़ौम या गिरोह के सभी लोग एक जैसे नहीं होते; हर गिरोह में नेक और बुरे लोग होते हैं। इसलिए हमें किसी भी गिरोह के बारे में सामान्यीकरण (generalization) नहीं करना चाहिए, बल्कि हर इंसान का मूल्यांकन उसके अमल और ईमान के आधार पर करना चाहिए।
  2. रात की इबादत और तिलावत-ए-क़ुरआन की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है। रात के सन्नाटे में अल्लाह से जुड़ना, उसकी आयतें पढ़ना और नमाज़ पढ़ना दिल को सुकून देता है और ईमान को मज़बूत करता है।
  3. सच्चाई को क़बूल करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। जिन आह्ले-किताब ने सच्चाई पहचानी, उन्होंने फ़ौरन ईस्लाम क़बूल किया और अल्लाह ने उनकी तारीफ़ की। ये हमारे लिए सबक़ है कि हक़ (सच्चाई) को मानने में देर न करें।
  4. ये आयत हमें ये भी सिखाती है कि अल्लाह के हुक्म पर क़ायम रहना और उसकी इबादत में मशग़ूल रहना ही असली कामयाबी है, चाहे इंसान किसी भी क़ौम या मज़हब से ताल्लुक़ रखता हो।


📜 आयत 111-115 — सूरा आल-इमरान

111لَن يَضُرُّوكُمْ إِلَّا أَذًى ۖ وَإِن يُقَاتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
(मुसलमानों) ये लोग मामूली अज़ीयत के सिवा तुम्हें हरगिज़ ज़रर नहीं पहुंचा सकते और अगर तुमसे लड़ेंगे तो उन्हें तुम्हारी तरफ़ पीठ ही करनी होगी और फिर उनकी कहीं से मदद भी नहीं पहुंचेगी
112ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوا إِلَّا بِحَبْلٍ مِّنَ اللَّهِ وَحَبْلٍ مِّنَ النَّاسِ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِّنَ اللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الْمَسْكَنَةُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ الْأَنبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ
और जहॉ कहीं हत्ते चढ़े उनपर रूसवाई की मार पड़ी मगर ख़ुदा के एहद (या) और लोगों के एहद के ज़रिये से (उनको कहीं पनाह मिल गयी) और फिर हेरफेर के खुदा के गज़ब में पड़ गए और उनपर मोहताजी की मार (अलग) पड़ी ये (क्यों) इस सबब से कि वह ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक़ क़त्ल करते थे ये सज़ा उसकी है कि उन्होंने नाफ़रमानी की और हद से गुज़र गए थे
113۞ لَيْسُوا سَوَاءً ۗ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ أُمَّةٌ قَائِمَةٌ يَتْلُونَ آيَاتِ اللَّهِ آنَاءَ اللَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ
और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि) अहले किताब से कुछ लोग तो ऐसे हैं कि (ख़ुदा के दीन पर) इस तरह साबित क़दम हैं कि रातों को ख़ुदा की आयतें पढ़ा करते हैं और वह बराबर सजदे किया करते हैं
114يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَأُولَٰئِكَ مِنَ الصَّالِحِينَ
खुदा और रोज़े आख़ेरत पर ईमान रखते हैं और अच्छे काम का तो हुक्म करते हैं और बुरे कामों से रोकते हैं और नेक कामों में दौड़ पड़ते हैं और यही लोग तो नेक बन्दों से हैं
115وَمَا يَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَلَن يُكْفَرُوهُ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ
और वह जो कुछ नेकी करेंगे उसकी हरगिज़ नाक़द्री न की जाएगी और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ़ है
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीअवतरण स्थान
113आयत

अनुवाद — आल-इमरान 113

सूरा आल-इमरान आयत 113 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और ये लोग भी सबके सब यकसॉ नहीं हैं (बल्कि)…

सूरा आयत 113/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 111–115. हिंदी अर्थ: اردو.





पवित्र क़ुरआन


Monday, September 28, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए