अल-फतह · 16/29
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फतह
قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا ۝١٦
Qul lilmukhallafeena minal A`raabi satud`awna ilaa qawmin ulee baasin shadeedin tuqaati loonahum aw yuslimoona fa in tutee`oo yu`tikumul laahu ajran hasananw wa in tatawallaw kamaa tawallaitum min qablu yu`azzibkum `azaaban aleemaa
📖 हिंदी अर्थ
कि जो गवॉर पीछे रह गए थे उनसे कह दो कि अनक़रीब ही तुम सख्त जंगजू क़ौम के (साथ लड़ने के लिए) बुलाए जाओगे कि तुम (या तो) उनसे लड़ते ही रहोगे या मुसलमान ही हो जाएँगे पस अगर तुम (ख़ुदा का) हुक्म मानोगे तो ख़ुदा तुमको अच्छा बदला देगा और अगर तुमने जिस तरह पहली दफा सरताबी की थी अब भी सरताबी करोगे तो वह तुमको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अल-मुख़ल्लफ़ीन – पीछे छूट जाने वाले (जो जिहाद में शामिल नहीं हुए)
  • अल-आ'राब – बद्दू (ग्रामीण अरब)
  • उलू बा'सिन शदीद – अत्यधिक युद्ध-शक्ति वाले लोग
  • युस्लिमून – इस्लाम में प्रवेश कर लें (आत्मसमर्पण कर दें)
  • अजरन हसना – उत्तम प्रतिफल (स्वर्ग)
  • अज़ाबन अलीमा – दर्दनाक यातना

व्याख्या:

ऐ नबी! आप उन बद्दूओं से कह दीजिए जो (हुदैबिया के समय) आपके साथ चलने से पीछे रह गए थे कि अब तुम्हें एक ऐसी क़ौम की ओर बुलाया जाएगा जो युद्ध में अत्यंत शक्तिशाली और सख्त होगी। तुम्हें उनसे लड़ना होगा या वे इस्लाम में प्रवेश कर लेंगे। यह कोई विकल्प नहीं है—दोनों में से एक ही रास्ता होगा: या तो तुम उनसे युद्ध करोगे, या वे बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण करके मुसलमान बन जाएँगे।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यदि तुम उस आदेश की पालना करोगे जो अल्लाह तुम्हें देगा, तो वह तुम्हें उत्तम प्रतिफल प्रदान करेगा—दुनिया में ग़नीमत (युद्ध-लूट) और आख़िरत में जन्नत। लेकिन यदि तुम उसी तरह मुँह मोड़ोगे जैसे तुमने पहले (हुदैबिया के समय) मुँह मोड़ा था, तो अल्लाह तुम्हें दर्दनाक यातना में डाल देगा।


दावती पहलू:

यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि अल्लाह की आज्ञा का पालन करने में ही भलाई है। जो लोग अल्लाह के रास्ते में कष्ट उठाने से कतराते हैं, वे दुनिया और आख़िरत दोनों में नुक़सान उठाते हैं। लेकिन जो अल्लाह पर भरोसा करके उसके आदेशों का पालन करते हैं, अल्लाह उन्हें कभी निराश नहीं करता। यह आयत हमें सिखाती है कि कठिनाइयों के बाद ही आसानी आती है, और अल्लाह की राह में किया गया हर कष्ट अकारण नहीं जाता। अल्लाह अपने वादे में सच्चा है—वह आज्ञाकारियों को उत्तम प्रतिफल देगा और अवज्ञाकारियों को उचित दंड। यह हमारे लिए एक चेतावनी भी है और एक प्रोत्साहन भी कि हम हमेशा अल्लाह की राह में डटे रहें, क्योंकि अल्लाह की मदद उन्हीं के साथ होती है जो उसके आदेशों का पालन करते हैं।



📜 आयत 14-18 — सूरा अल-फतह

14وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
और सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत ख़ुदा ही की है जिसे चाहे बख्श दे और जिसे चाहे सज़ा दे और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
15سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(मुसलमानों) अब जो तुम (ख़ैबर की) ग़नीमतों के लेने को जाने लगोगे तो जो लोग (हुदैबिया से) पीछे रह गये थे तुम से कहेंगे कि हमें भी अपने साथ चलने दो ये चाहते हैं कि ख़ुदा के क़ौल को बदल दें तुम (साफ) कह दो कि तुम हरगिज़ हमारे साथ नहीं चलने पाओगे ख़ुदा ने पहले ही से ऐसा फ़रमा दिया है तो ये लोग कहेंगे कि तुम लोग तो हमसे हसद रखते हो (ख़ुदा ऐसा क्या कहेगा) बात ये है कि ये लोग बहुत ही कम समझते हैं
16قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
कि जो गवॉर पीछे रह गए थे उनसे कह दो कि अनक़रीब ही तुम सख्त जंगजू क़ौम के (साथ लड़ने के लिए) बुलाए जाओगे कि तुम (या तो) उनसे लड़ते ही रहोगे या मुसलमान ही हो जाएँगे पस अगर तुम (ख़ुदा का) हुक्म मानोगे तो ख़ुदा तुमको अच्छा बदला देगा और अगर तुमने जिस तरह पहली दफा सरताबी की थी अब भी सरताबी करोगे तो वह तुमको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
17لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا
(जेहाद से पीछे रह जाने का) न तो अन्धे ही पर कुछ गुनाह है और न लँगड़े पर गुनाह है और न बीमार पर गुनाह है और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म मानेगा तो वह उसको (बेहिश्त के) उन सदाबहार बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी और जो सरताबी करेगा वह उसको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
18۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की
अल-फतहकुरान सूची
29आयत
मदनीअवतरण स्थान
16आयत

अनुवाद — अल-फतह 16

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Sunday, October 11, 2026

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