अल-फतह · 17/29
अनुवाद उच्चारण — अल-फतह
لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا ۝١٧
Laisa `alal a`maa harajunw wa laa `alal a`raji harajunw wa laa `alal mareedi haraj` wa many yutil`il laaha wa Rasoolahoo yudkhilhu jannaatin tajree min tahtihal anhaaru wa many yatawalla yu`azzibhu `azaaban aleemaa
📖 हिंदी अर्थ
(जेहाद से पीछे रह जाने का) न तो अन्धे ही पर कुछ गुनाह है और न लँगड़े पर गुनाह है और न बीमार पर गुनाह है और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म मानेगा तो वह उसको (बेहिश्त के) उन सदाबहार बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी और जो सरताबी करेगा वह उसको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • हरज (حرج): तंगी, संकीर्णता, गुनाह, पाबंदी या कोई बोझ।
  • आ'मा (الأعمى): अंधा व्यक्ति।
  • आ'रज (الأعرج): लंगड़ा व्यक्ति।
  • मरीज़ (المريض): बीमार व्यक्ति।
  • युती'अ (يطيع): आज्ञा का पालन करना।
  • यतवल्ला (يتول): मुँह मोड़ना, आज्ञा से विमुख हो जाना।
  • अज़ाबन अलीमन (عذابًا أليما): दर्दनाक और बहुत पीड़ादायक यातना।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों पर अपनी असीम रहमत और आसानी का पैगाम दे रहा है। वह फ़रमाता है कि अंधे व्यक्ति पर कोई गुनाह नहीं, लंगड़े व्यक्ति पर कोई गुनाह नहीं, और बीमार व्यक्ति पर भी कोई गुनाह नहीं—अगर वे जिहाद (धर्मयुद्ध) या उन कठिन कार्यों में शामिल न हो सकें जिनके लिए तंदुरुस्ती और ताकत की ज़रूरत होती है। यह अल्लाह की ओर से एक विशेष रियायत और सहूलत है, क्योंकि इस्लाम कभी भी किसी पर उसकी हैसियत से बढ़कर बोझ नहीं डालता। अल्लाह हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार ही जिम्मेदारी देता है।

यह आयत उस वक्त नाज़िल हुई जब कुछ कमज़ोर और बीमार साथियों ने पूछा कि अगर हम जिहाद में नहीं जा सकते तो क्या हम पर कोई गुनाह है? तो अल्लाह ने यह आयत उतारी कि नहीं, तुम पर कोई गुनाह नहीं, बशर्ते तुम्हारा दिल नेक और इरादा सच्चा हो।

इसके बाद अल्लाह तआला दो रास्ते साफ़ बयान करता है: पहला, जो अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की आज्ञा का पालन करेगा, उसे अल्लाह ऐसी जन्नतों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं—वहाँ की खुशियाँ, सुकून और नेमतें किसी भी ज़ुबान में बयान नहीं की जा सकतीं। दूसरा, जो इस आज्ञा से मुँह मोड़ेगा और अल्लाह के दीन से विमुख हो जाएगा, उसके लिए दर्दनाक अज़ाब है।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में हर व्यक्ति के लिए उसकी स्थिति के अनुसार रास्ता खुला है। अगर कोई शारीरिक रूप से सक्षम नहीं है, तो उसके लिए दुआ, नेकी, अच्छी सलाह और दूसरे अच्छे कामों के ज़रिए अल्लाह की राह में योगदान करने के दरवाजे हमेशा खुले हैं। अल्लाह ने किसी को भी अपनी रहमत से निराश नहीं किया। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते हैं, उनके लिए जन्नत की नेमतें तैयार हैं, और जो विमुख होते हैं, वे खुद अपने लिए अज़ाब का सामान करते हैं। अल्लाह हमें अपनी आज्ञा का पालन करने और उसकी रहमत पाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 15-19 — अल-फतह

15سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(मुसलमानों) अब जो तुम (ख़ैबर की) ग़नीमतों के लेने को जाने लगोगे तो जो लोग (हुदैबिया से) पीछे रह गये थे तुम से कहेंगे कि हमें भी अपने साथ चलने दो ये चाहते हैं कि ख़ुदा के क़ौल को बदल दें तुम (साफ) कह दो कि तुम हरगिज़ हमारे साथ नहीं चलने पाओगे ख़ुदा ने पहले ही से ऐसा फ़रमा दिया है तो ये लोग कहेंगे कि तुम लोग तो हमसे हसद रखते हो (ख़ुदा ऐसा क्या कहेगा) बात ये है कि ये लोग बहुत ही कम समझते हैं
16قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
कि जो गवॉर पीछे रह गए थे उनसे कह दो कि अनक़रीब ही तुम सख्त जंगजू क़ौम के (साथ लड़ने के लिए) बुलाए जाओगे कि तुम (या तो) उनसे लड़ते ही रहोगे या मुसलमान ही हो जाएँगे पस अगर तुम (ख़ुदा का) हुक्म मानोगे तो ख़ुदा तुमको अच्छा बदला देगा और अगर तुमने जिस तरह पहली दफा सरताबी की थी अब भी सरताबी करोगे तो वह तुमको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
17لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا
(जेहाद से पीछे रह जाने का) न तो अन्धे ही पर कुछ गुनाह है और न लँगड़े पर गुनाह है और न बीमार पर गुनाह है और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म मानेगा तो वह उसको (बेहिश्त के) उन सदाबहार बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी और जो सरताबी करेगा वह उसको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
18۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की
19وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
और (इसके अलावा) बहुत सी ग़नीमतें (भी) जो उन्होने हासिल की (अता फरमाई) और ख़ुदा तो ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
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अनुवाद — अल-फतह 17

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Tuesday, August 18, 2026

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