अल-माइदा · 97/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
۞ جَعَلَ اللَّهُ الْكَعْبَةَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ قِيَامًا لِّلنَّاسِ وَالشَّهْرَ الْحَرَامَ وَالْهَدْيَ وَالْقَلَائِدَ ۚ ذَٰلِكَ لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَأَنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ۝٩٧
Ja`alal laahul Ka`batal Baital Haraama qiyaamal linnaasi wash Shahral Haraama walhadya walqalaaa`id; zaalika lita`lamooo annal laaha ya`lamu maa fis samaawaati wa maa fil ardi wa annal laaha bikulli shai`in `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा ने काबा को जो (उसका) मोहतरम घर है और हुरमत दार महीनों को और कुरबानी को और उस जानवर को जिसके गले में (क़ुरबानी के वास्ते) पट्टे डाल दिए गए हों लोगों के अमन क़ायम रखने का सबब क़रार दिया यह इसलिए कि तुम जान लो कि ख़ुदा जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है यक़ीनन (सब) जानता है और ये भी (समझ लो) कि बेशक ख़ुदा हर चीज़ से वाक़िफ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • काबा: वह पवित्र घर जो मक्का में है, जिसे अल्लाह ने इबादत के लिए निर्धारित किया।
  • क़ियाम: लोगों के लिए स्थिरता, सुरक्षा और व्यवस्था का आधार।
  • अश्हुरुल हुरुम (पवित्र महीने): ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम और रजब।
  • हद्य: वह जानवर (ऊँट, गाय, बकरी) जिसे हज या उमरा के लिए हरम (काबा) की तरफ भेजा जाए।
  • क़लाइद: वे जानवर जिनके गले में निशान के तौर पर पट्टी या चमड़े का हार डाला जाए ताकि लोग जानें कि यह हरम के लिए है।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी बड़ी रहमत और एहसान का ज़िक्र किया है। उसने काबा को, जो बैतुल-हराम है, लोगों के लिए क़ियाम (आधार और स्थिरता) बनाया। यानी इस पवित्र घर की बदौलत लोगों के दीन और दुनिया दोनों की भलाई क़ायम होती है। दीन की भलाई इसलिए कि यहाँ नमाज़, हज और उमरा जैसी इबादतें अदा की जाती हैं, और दुनिया की भलाई इसलिए कि यहाँ आने वाले लोगों को अमन और सुरक्षा मिलती है। यहाँ तक कि जो लोग दूर-दराज़ से आते हैं, वे भी इसकी वजह से महफूज़ रहते हैं।

इसी तरह अल्लाह ने पवित्र महीनों (ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम और रजब) को भी लोगों की भलाई के लिए बनाया, ताकि इन महीनों में लड़ाई-झगड़ा बंद हो और लोग अमन के साथ हज और उमरा कर सकें। साथ ही उसने हद्य (कुर्बानी के जानवर) और क़लाइद (गले में निशान वाले जानवर) को भी सुरक्षा का ज़रिया बनाया, ताकि जो लोग इन्हें हरम की तरफ ले जाएं, उन्हें कोई नुकसान न पहुंचाए।

यह सब कुछ अल्लाह ने इसलिए किया ताकि तुम लोग जान लो कि अल्लाह उन सब चीज़ों को जानता है जो आसमानों में हैं और जो ज़मीन में हैं। वह हर चीज़ का पूरा इल्म रखता है। उसकी यह व्यवस्था और ये हिदायतें इस बात का सबूत हैं कि वह अपने बंदों की भलाई को अच्छी तरह जानता है और उनके लिए वही चीज़ें मुक़र्रर करता है जो उनके लिए बेहतर होती हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की हर व्यवस्था में बंदों के लिए भलाई और रहमत छिपी है। जब हम काबा की तरफ रुख करते हैं, हज और उमरा करते हैं, और अल्लाह के बताए हुए पवित्र महीनों का सम्मान करते हैं, तो हमें यकीन होना चाहिए कि यह सब हमारे लिए ही बेहतर है। अल्लाह हमारी हर ज़रूरत को जानता है और अपनी रहमत से हमें सही रास्ता दिखाता है। इसलिए हमें उसकी हर बात को दिल से कबूल करना चाहिए और उसकी इबादत में अपनी ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए।



📜 आयत 95-99 — अल-माइदा

95يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَقْتُلُوا الصَّيْدَ وَأَنتُمْ حُرُمٌ ۚ وَمَن قَتَلَهُ مِنكُم مُّتَعَمِّدًا فَجَزَاءٌ مِّثْلُ مَا قَتَلَ مِنَ النَّعَمِ يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ مِّنكُمْ هَدْيًا بَالِغَ الْكَعْبَةِ أَوْ كَفَّارَةٌ طَعَامُ مَسَاكِينَ أَوْ عَدْلُ ذَٰلِكَ صِيَامًا لِّيَذُوقَ وَبَالَ أَمْرِهِ ۗ عَفَا اللَّهُ عَمَّا سَلَفَ ۚ وَمَنْ عَادَ فَيَنتَقِمُ اللَّهُ مِنْهُ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ ذُو انتِقَامٍ
(ऐ ईमानदारों जब तुम हालते एहराम में हो तो शिकार न मारो और तुममें से जो कोई जान बूझ कर शिकार मारेगा तो जिस (जानवर) को मारा है चौपायों में से उसका मसल तुममें से जो दो मुन्सिफ आदमी तजवीज़ कर दें उसका बदला (देना) होगा (और) काबा तक पहुँचा कर कुर्बानी की जाए या (उसका) जुर्माना (उसकी क़ीमत से) मोहताजों को खाना खिलाना या उसके बराबर रोज़े रखना (यह जुर्माना इसलिए है) ताकि अपने किए की सज़ा का मज़ा चखो जो हो चुका उससे तो ख़ुदा ने दरग़ुज़र की और जो फिर ऐसी हरकत करेगा तो ख़ुदा उसकी सज़ा देगा और ख़ुदा ज़बरदस्त बदला लेने वाला है
96أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَّكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِ ۖ وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًا ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
तुम्हारे और काफ़िले के वास्ते दरियाई शिकार और उसका खाना तो (हर हालत में) तुम्हारे वास्ते जायज़ कर दिया है मगर खुश्की का शिकार जब तक तुम हालते एहराम में रहो तुम पर हराम है और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसकी तरफ (मरने के बाद) उठाए जाओगे
97۞ جَعَلَ اللَّهُ الْكَعْبَةَ الْبَيْتَ الْحَرَامَ قِيَامًا لِّلنَّاسِ وَالشَّهْرَ الْحَرَامَ وَالْهَدْيَ وَالْقَلَائِدَ ۚ ذَٰلِكَ لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَأَنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा ने काबा को जो (उसका) मोहतरम घर है और हुरमत दार महीनों को और कुरबानी को और उस जानवर को जिसके गले में (क़ुरबानी के वास्ते) पट्टे डाल दिए गए हों लोगों के अमन क़ायम रखने का सबब क़रार दिया यह इसलिए कि तुम जान लो कि ख़ुदा जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है यक़ीनन (सब) जानता है और ये भी (समझ लो) कि बेशक ख़ुदा हर चीज़ से वाक़िफ है
98اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ وَأَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
जान लो कि यक़ीनन ख़ुदा बड़ा अज़ाब वाला है और ये (भी) कि बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
99مَّا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ
(हमारे) रसूल पर पैग़ाम पहुँचा देने के सिवा (और) कुछ (फर्ज़) नहीं और जो कुछ तुम ज़ाहिर बा ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपा कर करते हो ख़ुदा सब जानता है
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अनुवाद — अल-माइदा 97

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Tuesday, August 18, 2026

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