अल-मुमतहिना · 3/13
अनुवाद उच्चारण — अल-मुमतहिना
لَن تَنفَعَكُمْ أَرْحَامُكُمْ وَلَا أَوْلَادُكُمْ ۚ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ۝٣
Lan tanfa`akum arhaamukum wa laaa awlaadukum; yawmal qiyaamati yafsilu bainakum; wallaahu bimaa ta`maloon baseer
📖 हिंदी अर्थ
क़यामत के दिन न तुम्हारे रिश्ते नाते ही कुछ काम आएँगे न तुम्हारी औलाद (उस दिन) तो वही फ़ैसला कर देगा और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अरहामुकुम — तुम्हारे रिश्तेदारियाँ (खून के रिश्ते)
  • यफ़सिलु — अलग करेगा, फ़ैसला करेगा
  • बसीर — सब कुछ देखने वाला, पूर्ण ज्ञान रखने वाला

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में साफ़ फ़रमा रहे हैं कि क़यामत के दिन न तो तुम्हारे रिश्तेदारियाँ तुम्हारे काम आएँगी और न ही तुम्हारी औलाद। यानी जो लोग अपने रिश्तेदारों और बच्चों की ख़ातिर कुफ़्फ़ार से मोहब्बत और वफ़ादारी का रिश्ता रखते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि ये रिश्ते उन्हें अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकते।

क़यामत का दिन वो दिन होगा जब अल्लाह तआला हर इंसान का फ़ैसला उसके ईमान और अमल के आधार पर करेगा। उस दिन अल्लाह अपने फ़रमाँबरदार बंदों को जन्नत में दाख़िल करेगा और नाफ़रमानों को जहन्नम में डाल देगा। वहाँ न कोई रिश्ता काम आएगा, न कोई सिफ़ारिश। माँ-बाप अपने बच्चों से अलग होंगे, भाई अपने भाई से जुदा होंगे — हर शख्स अपने ही अमल के सामने खड़ा होगा।

अल्लाह तआला इस आयत के आख़िर में फ़रमाते हैं कि वो हर उस अमल को देख रहा है जो तुम करते हो। कोई भी नेकी या बदी उससे छिपी नहीं है। चाहे वो ज़ुबान से कहा गया कलिमा हो, चाहे दिल में छिपा इरादा हो, चाहे हाथ-पैर से किया गया काम हो — सब कुछ अल्लाह के इल्म में है और उसका पूरा-पूरा बदला उस दिन मिलेगा।

दावती पहलू:

ये आयत हम मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। आज हम में से कई लोग अपने रिश्तेदारों या बच्चों की मोहब्बत में दीन के मामले में ढील दे देते हैं — किसी ग़ैर-मुस्लिम रिश्तेदार की ख़ातिर अपने ईमान से समझौता कर लेते हैं, या दुनियावी मोहब्बत में अल्लाह के हुक्म को भूल जाते हैं। ये आयत हमें जगाती है कि सबसे बड़ा रिश्ता अल्लाह से है। अगर हम अल्लाह के हुक्मों पर चलेंगे, तो अल्लाह हमें जन्नत में अपने करीब बुलाएगा — और वहीं असली कामयाबी है। रिश्तेदार और औलाद तो इस दुनिया की ज़ीनत हैं, लेकिन उनकी मोहब्बत हमें अल्लाह की नाफ़रमानी की तरफ़ नहीं ले जानी चाहिए। अल्लाह से डरो, उसकी राह पर चलो, और यक़ीन रखो कि जो अल्लाह के पास है वही बेहतर और बाक़ी रहने वाला है।



📜 आयत 1-5 — अल-मुमतहिना

1يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا عَدُوِّي وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَاءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِم بِالْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا بِمَا جَاءَكُم مِّنَ الْحَقِّ يُخْرِجُونَ الرَّسُولَ وَإِيَّاكُمْ ۙ أَن تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ رَبِّكُمْ إِن كُنتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَادًا فِي سَبِيلِي وَابْتِغَاءَ مَرْضَاتِي ۚ تُسِرُّونَ إِلَيْهِم بِالْمَوَدَّةِ وَأَنَا أَعْلَمُ بِمَا أَخْفَيْتُمْ وَمَا أَعْلَنتُمْ ۚ وَمَن يَفْعَلْهُ مِنكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَاءَ السَّبِيلِ
ऐ ईमानदारों अगर तुम मेरी राह में जेहाद करने और मेरी ख़ुशनूदी की तमन्ना में (घर से) निकलते हो तो मेरे और अपने दुशमनों को दोस्त न बनाओ तुम उनके पास दोस्ती का पैग़ाम भेजते हो और जो दीन हक़ तुम्हारे पास आया है उससे वह लोग इनकार करते हैं वह लोग रसूल को और तुमको इस बात पर (घर से) निकालते हैं कि तुम अपने परवरदिगार ख़ुदा पर ईमान ले आए हो (और) तुम हो कि उनके पास छुप छुप के दोस्ती का पैग़ाम भेजते हो हालॉकि तुम कुछ भी छुपा कर या बिल एलान करते हो मैं उससे ख़ूब वाक़िफ़ हूँ और तुममें से जो शख़्श ऐसा करे तो वह सीधी राह से यक़ीनन भटक गया
2إِن يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا لَكُمْ أَعْدَاءً وَيَبْسُطُوا إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ وَأَلْسِنَتَهُم بِالسُّوءِ وَوَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَ
अगर ये लोग तुम पर क़ाबू पा जाएँ तो तुम्हारे दुश्मन हो जाएँ और ईज़ा के लिए तुम्हारी तरफ अपने हाथ भी बढ़ाएँगे और अपनी ज़बाने भी और चाहते हैं कि काश तुम भी काफिर हो जाओ
3لَن تَنفَعَكُمْ أَرْحَامُكُمْ وَلَا أَوْلَادُكُمْ ۚ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
क़यामत के दिन न तुम्हारे रिश्ते नाते ही कुछ काम आएँगे न तुम्हारी औलाद (उस दिन) तो वही फ़ैसला कर देगा और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
4قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِي إِبْرَاهِيمَ وَالَّذِينَ مَعَهُ إِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَآءُ مِنكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَاءُ أَبَدًا حَتَّىٰ تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَحْدَهُ إِلَّا قَوْلَ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ لَأَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَا أَمْلِكُ لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن شَيْءٍ ۖ رَّبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَإِلَيْكَ أَنَبْنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो इबराहीम और उनके साथियों (के क़ौल व फेल का अच्छा नमूना मौजूद है) कि जब उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि हम तुमसे और उन (बुतों) से जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा पूजते हो बेज़ार हैं हम तो तुम्हारे (दीन के) मुनकिर हैं और जब तक तुम यकता ख़ुदा पर ईमान न लाओ हमारे तुम्हारे दरमियान खुल्लम खुल्ला अदावत व दुशमनी क़ायम हो गयी मगर (हाँ) इबराहीम ने अपने (मुँह बोले) बाप से ये (अलबत्ता) कहा कि मैं आपके लिए मग़फ़िरत की दुआ ज़रूर करूँगा और ख़ुदा के सामने तो मैं आपके वास्ते कुछ एख्तेयार नहीं रखता ऐ हमारे पालने वाले (ख़ुदा) हमने तुझी पर भरोसा कर लिया है और तेरी ही तरफ हम रूजू करते हैं
5رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا وَاغْفِرْ لَنَا رَبَّنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
और तेरी तरफ हमें लौट कर जाना है ऐ हमारे पालने वाले तू हम लोगों को काफ़िरों की आज़माइश (का ज़रिया) न क़रार दे और परवरदिगार तू हमें बख्श दे बेशक तू ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
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अनुवाद — अल-मुमतहिना 3

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Tuesday, August 18, 2026

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