और मूसा की क़ौम के कुछ लोग ऐसे भी है जो हक़ बात की हिदायत भी करते हैं और हक़ के (मामलात में) इन्साफ़ भी करते हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
أُمَّةٌ: एक समूह या जमात।
يَهْدُونَ: लोगों को मार्गदर्शन करते हैं, सत्य की ओर बुलाते हैं।
بِالْحَقِّ: सत्य के साथ, न्याय और सच्चाई के आधार पर।
يَعْدِلُونَ: न्याय करते हैं, इंसाफ़ करते हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला बता रहे हैं कि मूसा (अलैहिस्सलाम) की क़ौम (बनी इसराइल) में से कुछ लोग ऐसे भी थे जो सत्य पर स्थिर रहे। यह एक ऐसा समूह था जो न केवल खुद सत्य पर चलता था, बल्कि दूसरों को भी सत्य का मार्ग दिखाता था। ये लोग लोगों को हक़ (सत्य) की ओर बुलाते थे और अपने फैसलों में पूरा न्याय करते थे। वे किसी के साथ ज़ुल्म नहीं करते थे, न ही किसी पक्षपात में पड़ते थे। उनका मार्गदर्शन और न्याय दोनों ही सत्य पर आधारित थे। यह उनकी विशेषता थी कि वे हक़ को अपना नेता बनाए हुए थे और उसी के अनुसार चलते और फैसले करते थे। यह आयत बताती है कि बनी इसराइल में भी नेक और सच्चे लोग मौजूद थे, जो अल्लाह के दीन पर क़ायम रहे।
फ़ायदे (सबक):
यह आयत हमें सिखाती है कि किसी भी क़ौम या समुदाय में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं। हमें अच्छे लोगों की पहचान करनी चाहिए और उनसे सीखना चाहिए।
सत्य पर स्थिर रहना और उसके अनुसार दूसरों को मार्गदर्शन देना बहुत बड़ा गुण है। यही वह रास्ता है जो अल्लाह को पसंद है।
न्याय और इंसाफ़ करना इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं में से है। चाहे कोई भी हो, हमें हमेशा हक़ और इंसाफ़ के साथ फैसला करना चाहिए।
यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की रहमत और हिदायत किसी विशेष क़ौम के साथ ख़त्म नहीं होती। जो भी सत्य पर चलेगा, अल्लाह उसे हिदायत देगा और उसे कामयाबी देगा।
हमें भी चाहिए कि हम अपने समाज में सत्य और न्याय के प्रचारक बनें, ताकि हम अल्लाह के पसंदीदा बंदों में शामिल हो सकें।
(यानि) जो लोग हमारे बनी उल उम्मी पैग़म्बर के क़दम बा क़दम चलते हैं जिस (की बशारत) को अपने हॉ तौरैत और इन्जील में लिखा हुआ पाते है (वह नबी) जो अच्छे काम का हुक्म देता है और बुरे काम से रोकता है और जो पाक व पाकीज़ा चीजे तो उन पर हलाल और नापाक गन्दी चीजे उन पर हराम कर देता है और (सख्त एहकाम का) बोझ जो उनकी गर्दन पर था और वह फन्दे जो उन पर (पड़े हुए) थे उनसे हटा देता है पस (याद रखो कि) जो लोग (नबी मोहम्मद) पर ईमान लाए और उसकी इज्ज़त की और उसकी मदद की और उस नूर (क़ुरान) की पैरवी की जो उसके साथ नाज़िल हुआ है तो यही लोग अपनी दिली मुरादे पाएंगें
(ऐ रसूल) तुम (उन लोगों से) कह दो कि लोगों में तुम सब लोगों के पास उस ख़ुदा का भेजा हुआ (पैग़म्बर) हूँ जिसके लिए ख़ास सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत (हुकूमत) है उसके सिवा और कोई माबूद नहीं वही ज़िन्दा करता है वही मार डालता है पस (लोगों) ख़ुदा और उसके रसूल नबी उल उम्मी पर ईमान लाओ जो (ख़ुद भी) ख़ुदा पर और उसकी बातों पर (दिल से) ईमान रखता है और उसी के क़दम बा क़दम चलो ताकि तुम हिदायत पाओ
और हमने बनी ईसराइल के एक एक दादा की औलाद को जुदा जुदा बारह गिरोह बना दिए और जब मूसा की क़ौम ने उनसे पानी मॉगा तो हमने उनके पास वही भेजी कि तुम अपनी छड़ी पत्थर पर मारो (छड़ी मारना था) कि उस पत्थर से पानी के बारह चश्मे फूट निकले और ऐसे साफ साफ अलग अलग कि हर क़बीले ने अपना अपना घाट मालूम कर लिया और हमने बनी ईसराइल पर अब्र (बादल) का साया किया और उन पर मन व सलवा (सी नेअमत) नाज़िल की (लोगों) जो पाक (पाकीज़ा) चीज़े तुम्हें दी हैं उन्हें (शौक़ से खाओ पियो) और उन लोगों ने (नाफरमानी करके) कुछ हमारा नहीं बिगाड़ा बल्कि अपना आप ही बिगाड़ते हैं
और जब उनसे कहा गया कि उस गाँव में जाकर रहो सहो और उसके मेवों से जहाँ तुम्हारा जी चाहे (शौक़ से) खाओ (पियो) और मुँह से हुतमा कहते और सजदा करते हुए दरवाजे में दाखिल हो तो हम तुम्हारी ख़ताए बख्श देगें और नेकी करने वालों को हम कुछ ज्यादा ही देगें
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